बिहार : सत्ता संस्कृति के मुखर आलोचक थे खगेन्द्र ठाकुर - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 13 जनवरी 2022

बिहार : सत्ता संस्कृति के मुखर आलोचक थे खगेन्द्र ठाकुर

  • ' बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ' ने किया  खगेन्द्र ठाकुर के दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर किया  'खगेन्द्र ठाकुर के राजनीतिक सरोकार ' विषय पर किया विमर्श का आयोजन

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पटना, 13 जनवरी। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से प्रख्यात  आलोचक खगेन्द्र ठाकुर की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर 'खगेन्द्र ठाकुर के राजनीतिक सरोकार' विषय पर विमर्श का आयोजन 'पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस',जनशक्ति परिसर, किया गया।  पटना शहर के साहित्यकार, प्रोफ़ेसर, रँगकर्मी, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठा हुए। वक्ताओं ने खगेन्द्र ठाकुर के योगदान और उनके सरोकार पर प्रकाश डाला कि किस तरह संगठन की जिम्मेवारियों का निर्वहन करते हुए साहित्य सृजन में रत रहे।  सर्वप्रथम खगेन्द्र ठाकुर की तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया। खगेन्द्र ठाकुर के पुत्र भास्कर ने अपने निजी अनुभवों को साझा करते हुए कहा " दिल्ली के एक लेखक इनके राजनीतिक संबन्धों के लेकर छींटाकशी किया करते थे। लेकिन कभी भी उसका बेजा इस्तेमाल नहीं किया। दूसरे दलों के अपने सम्पर्को का उपयोग लोगों के भले के लिए किया करते थे।' जनशक्ति' के विज्ञापन का पैसा फँसा हुआ था तो उन्होंने कोशिश की। भागवत झा आज़ाद से संबन्ध इन्हीं वजहों से खराब हो गया।"


माकपा के केंद्रीय समिति के नेता अरुण मिश्रा  ने कहा " में उनके काफी नजदीक रहा। उनसे प्रेरणा लेता रहा।  मैं खगेन्द्र ठाकुर को सीपीआई नेता के रूप में जनता था। उनका मूल सरोकार राजनीतिक है था बाकी गतिविधियां पूरक थी। कैसे क्रांतिकारी बदलाव के लिए कैसे काम किया जाए इसे लेकर सचेत रहा करते थे। उनके असहमतियां रहती थी लेकिन वे डेमोक्रेट थे।"  झारखंड संस्कृति मंच के प्रभारी अनिल अंशुमन ने अपने संबोधन में कहा " हमलोग जिस दौर में शामिल हुए उस दौर में हमें खगेन्द्र ठाकुर और महेश्वर से प्रभावित था।  वाम विचारों पर ताउम्र प्रतिबद्ध रहते हुए जनसरोकारों के साथ सक्रिय रहे। झारखंड में वे सीपीआई के साथ प्रभारी बनाये गए तब उनके साथ राजनीतिक सहकर्मी के रूप में काम किया। वे सत्ता संस्कृति के मुखर आलोचक थे।" ए. एन कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर मणिभूषण ने सभा को संबोधन में कहा " खगेन्द्र ठाकुर के दो ही राजैनतिक सरोकार थे। विचारधारा के स्तर पर मार्क्सवाद तथा संगठन के स्तर पर सीपीआई।  जब उनसे पूछ गया कि आप वामपन्थ के लिए क्यों लिखते हैं। तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं दक्षिणपंथ के लिए क्यों लिखूं ? लेकिन वामपन्थ के लिए इसकारण लिखता हूँ कि वाम समाज को आगे ले जाता है। खगेंद्र ठाकुर को किसी भी प्रकार की दुविधा नहीं थी।  ठाकुर जी का व्यक्तित्व योग्यता व सरलता का अद्भुत संगम था। एक बार किसी ने पूछा कि लेखक को क्या कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होना चाहिए तो उन्होंने कहा बिल्कुल होना चाहिए। जब साहित्यकार कांग्रेसी हो सकता है, भाजपाई हो सकता है तो कम्युनिस्ट क्यों नहीं सकता। जब अध्ययन में गहराई हो और समाज आए जुड़ाव हो तो दुविधा नहीं होती है।"


कवि व आलोचक कुमार अनिल ने खगेन्द्र ठाकुर के साथ अपने संस्मरणों को साझा करते हुए कहा " मैं 1980 से परिचित था।  वे मेरे पितातुल्य थे। मेरा काव्य संग्रह 'अलार्म घड़ी' की भूमिका उन्होंने लिखी थी। मेरी आलोचना पुस्तक ' नई कविता में लोकचेतना' के नाम से। इसमें पांच हजार देशज शब्दों का मैंने चयन किया था। खगेन्द्र ठाकुर ने दस-बारह शब्दों   को हटा देने का सुझाव दिया था। साहित्य  और राजनीति  दोनों परिदृश्य पर कोई व्यक्ति काफी सक्रिय हो ऐसे किसी व्यक्ति से सिवा खगेन्द्र ठाकुर के किसी और से नहीं मिला था।" सामाजिक कार्यकर्ता सुनील सिंह ने अपने संबोधन में कहा " मैं अपने जीवन में पहली बार किसी साहित्यकार के राजनीतिक सरोकार पर चर्चा सुन रहा हूँ। खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि नई कहानी आंदोलन जैसी कोई चीज नहीं होती वर्ग विभाजित समाज में उसका मूल्यांकन का आधार वही होगा। कविता लिख रहे थे। कहा जाता है इनकी कविता उच्च कोटि की थी। आलोचना  में इस कारण आये की जनता के दुःख-दर्द से जुड़ जाएं। नेतृत्व की पहचान में उन्होंने चार नेताओं के बारे लिखा।  खगेन्द्र ठाकुर प्रजापति  थे।" एस. यू.सी.आई (कम्युनिस्ट) की ओर से मणिकांत पाठक  ने बताया " मैं साठ वर्षो से उनसे परिचित था। मैं मुरारका कॉलेज, सुलतानगंज में उनका छात्र था। अपनी  दार्शनिक परिपक्वता से वे बहसों में बताते कि समस्या क्या है? समस्या वही है जो प्रगति के रास्ते में बाधक बनती है। वैचारिक रूप से जो उन्नत स्तर उन्होंने हासिल किया था वह दुर्लभ था। उनकीप्रतिबद्धता पीड़ित मानवता  के प्रति थी। "मज़दूर संगठन 'एटक'के राजय अध्यक्ष अजय कुमार ने कहा " बहुत से  साहित्यकार  पुरस्कार व लाभ के चक्कर में रहा करते हैं लेकिन खगेन्द्र ठाकुर हमेशा शोषित जनता के प्रति जुड़े थे।  साहित्यकार होते हुए भी ट्रेड यूनियन  की आगामी खतरों के बारे में सचेत किया करते थे कि आने वाले समय  में ट्रेड यूनियन के तरीको में बदलाव लाना होगा। व्यक्तिगत लाभ के लिए कभी नहीं सोचा। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी स्वीकार्यता थी।


संजय श्याम के अनुसार " संजय श्याम लघुनपत्रिकाओं को जनपक्षधर पत्रिकाएं कहा करते थे।। असहमति के साहस और असहमति के विवेक की प्रतिमूर्ति  थे खगेन्द्र ठाकुर। जीवन में प्रकाश में जब कमी होती है तब अंधविश्वास बढ़ता है।" इस मौके पर अनिल राजिमवाले द्वारा लिखित बिहार कम्युनिस्ट के इतिहास पर लिखित पुस्तिका का लोकार्पण किया गया । खगेन्द्र ठाकुर के विषय पर बोलते हुए सीपीआई के राज्य सचिव रामनरेश पांडे ने कहा " हमने खगेन्द्र ठाकुर को 1968 में देखा था। कटिहार  के राज्य सम्मेलन में। उसके स्वागत समिति के अध्यक्ष नक्षत्र मालाकार थे। खगेन्द्र ठाकुर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रभारी है। पहली रात कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था। उनका  अंतिम भाषण  मैंने बहरलाखी में आयोजित किया था जिसमें वे गए थे।  मंच पर 2.30 घण्टे तक बोलते रहे। कम्युनिस्ट इतिहास पर। प्रोफ़ेसर की ज़िंदगी पर पार्टी के आदेश पर बने। मरते दम तक बिहार व झारखंड में पार्टी की सेवा की।  वे नेशनल कौन्सिलनके भी सदस्य थे। दर्जनों किताबें के  अनुवाद उन्होंने किये। एक मोटी पुस्तक उनपर निकली  जानी चाहिए। " कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय नारायण मिश्रा के अनुसार  " वे समाजवादी समाज के लिए पक्षधर थे। वे नए इतिहास का निर्माण करना चाहते थे। इसमें जनता की कैसी भूमिका कैसी होनी चाहिए इसका ख्याल करते थे। वैज्ञानिक चेतना आए लैस नहीं करेंगे तब तक नफरत पर आधारित समाज के खिलाफ नहीं लड़ सकते।"


अध्यक्षता करते हुए विश्विद्यालय व महाविद्यालय कर्मचारियों के नेता प्रो अरुण कुमार ने कहा " खगेन्द्र ठाकुर के संपर्क में आने पर रचनाशीलता को बढ़ावा मिलता था। मैनें अपनी आंखों के सामने देखा है कि जेपी आंदोलन के बाद बाबा नागार्जुन को खेद व्यक्त करते हुए देखा है। जो भी मेरे अंदर मर्क्सवादी सोच है वह खगेन्द्र ठाकुर की देन है। बिना विचार के प्रगतिशील होना सम्भव  नहीं है। जब तक मैं पटना में रहा प्रलेस के हर आयोजन में रहा करता था। 'उत्तरशती' का अंक निकलने के लिए खगेन्द्र ठाकुर विज्ञापन जुटाने के लिए जाया करते थे।"  सभा को सफाई कर्मचारियों के नेता जीतेन्द्र कुमार ने कहा" खगेन्द्र ठाकुर बहुआयामी  व्यक्ति थे। जब मैं छात्र फेडरेशन में था तो वे हमारे शिक्षक हुआ करते थे। उनके पुत्र का समकक्ष था पर हमेशा कॉमरेड की तरह पेश आते थे।"  बी .एन विश्वकर्मा, संजीव श्रीवास्तव  ने भी संबोधित किया।  सभा में  बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के  महासचिव रवींद्रनाथ राय और इतिहासकार ओ.पी जायसवाल का संदेश पढ़कर सुनाया गया। खगेन्द्र ठाकुर पर लिखी डॉ श्री राम तिवारी  की कविता क़ा पाठ भी किया गया।  सभा में प्रमुख लोगों में थे  प्रगतिशील लेखक संघ के उपमहासचिव अनीश अंकुर , शिक्षक व सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार शाही, गौतम गुलाल, मीर सैफ अली, महेश रजक, मंगल पासवान, संजीव श्रीवास्तव, पुष्पेंद्र शुक्ला, ललन तिवारी, यशी, विजयेन्द्र केसरी, कृष्णकांत जी, इसक्फ नेता  रवींद्र नाथ राय , किसान नेता अशोक कुमार सिंह, प्रभाकर सिंह,  राहुल कुमार, अशोक गुप्ता,  सीपीआई के लखीसराय जिला सचिव जीतेन्द्र कुमार, जानकी पासवान, विश्वजीत कुमार, प्रमोद प्रभाकर, विकास कुमार आदि मौजूद थे ।

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