विशेष : यूपी विधानसभा चुनाव का चौथा चरण - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

विशेष : यूपी विधानसभा चुनाव का चौथा चरण

  • हारेगा आतंकवाद का संरक्षणदाता या बहेगी राष्ट्रवाद की लहर  

तीसरे चरण का मतदान समाप्त होने के बाद राजनीतिक दलों का जोर चौथे चरण पर है। बुंदेलखंड व अवध राजनीतिक दलों के एजेंडे का हिस्सा है और यह संयोग है कि इस बार चौथे चरण में वीरों की भूमि भी मुकाबले में है। देखा जाएं तो गंगा, यमुना, बेतवा, केन और सई जैसी नदियों की परिधि में चौथे चरण का इलाका बसा है। बुंदेलखंड के अलावा रायबरेली, प्रतापगढ़, फतेहपुर, कौशांबी और इलाहाबाद इसके हिस्से हैं। इस रण में अयोध्या समेत अवध की कुछ सीटें बेहद अहम मानी जा रहीं है, जहां से कई दिग्गज मैदान में है। चौथे चरण में 9 जिलों की 60 सीटों पर 23 फरवरी को मतदान होना है। चुनाव कहीं भी हों राम मंदिर भारतीय राजनीति का सदाबहार मुद्दा है। और जब चुनाव अवध का हो तो इस मुद्दे का शोर खास कर तब और बुलंद हो जाता है जब भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया गया है। लेकिन खास बात यह है कि इस चरण में मंदिर के साथ-साथ चुनावी लड़ाई दंगावादी, तमंचावादी के बाद अब आतंकवाद पर आ गई है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या चौथे चरण में आतंकवाद का संरक्षणदाता हारेगा या चलेगी राष्ट्रवाद की लहर? 


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फिरहाल, चौथा चरण आते-आते यूपी की चुनावी लड़ाई दंगावादी, तमंचावादी के बाद अब आतंकवाद पर आ गई है। अहमदाबाद ब्लास्ट से आजमगढ़ का कनेक्शन निकलने के बाद बीजेपी नेताओं द्वारा अखिलेश यादव को सीधे तौर पर आतंकियों का मददगार कहा जा रहा है। हरदोई में पहुंचे पीएम मोदी ने अखिलेश यादव पर उनकी ही पार्टी के सिंबल साइकिल को आतंकवाद से जोड़ते हुए कहा, गुजरात में हुए बम घमाके का मास्टरमाइंड आजमगढ़ का है और फांसी की सजा पाएं शमीम अहमद सहित दर्जनों आतंकियों के मुकदमा वापस लिया था। बता दें, समाजवादियों की साइकिल पर पीएम के वार का आधार ये है कि पीएम के मुताबिक धमाके के लिए साइकिल पर बम रखे गए थे। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री ने साइकिल का आतंकी कनेक्शन बताया तो अखिलेश ने साइकिल को आम हिंदुस्तानी का अपमान बता कर इस गंभीर आरोप से बचने का प्रयास किया। हर वाकए से वाकिब जनता सपा के इस आतंकवादी कनेक्शन का जवाब किस अंदाज में देगी इसका पता तो 10 मार्च को चलेगा, लेकिन पूर्वांचल से लेकर अवध व बुंदेलखंड तक में अब यहीं चुनावी मुद्दा बनता दिख रहा है। मतलब साफ है चौथे, पांचवे, छठे और सातवें चरण के चुनाव में कट्टा-सट्टा, दंगा-फसाद, जाति-धर्म, श्रीराम मंदिर के बीच राष्ट्रवाद की बयार बहेगी। बात अगर चुनावी मैदान की हो तो सपा-भाजपा व बसपा एक-दुसरे को कांटे की टक्कर दे रहे हैं। कांग्रेस ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है।  पिछले चुनाव में बीजेपी ने इस इलाके से बड़ी बाजी मारी थी। चौथे चरण के मतदान में उम्मीदवारों के साथ-साथ केंद्र सरकार के कई मंत्रियों की भी परीक्षा होगी। 


चौथे चरण में सर्वाधिक सुरक्षित सीटें 

इस चरण में रुहेलखंड से लेकर तराई बेल्ट और अवध क्षेत्र के 9 जिलों की 60 सीटों पर 624 उम्मीदवार मैदान में हैं। इसमें लखनऊ, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, फतेहपुर और बांदा जिले शामिल हैं। खास यह है कि इसमें सबसे अधिक 14 सुरक्षित सीटें हैं। इस फेज में लखनऊ और गांधी परिवार के गढ़ माने जानी वाली रायबरेली की सीटें शामिल हैं, जिसके चलते यह चरण सियासी तौर पर काफी अहम माना जा रहा है। अवध इलाके के पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजों देखने पर पता चलता है कि यहां के चुनाव में हवा के रुख का काफी असर रहता है और अवध के आशीर्वाद से सरकार बन जाती है। इस बार किसी भी बड़े राजनीतिक दलों में गठबंधन न होने की वजह से सभी पार्टियां अलग-अलग दमखम दिखा रही हैं। 2 सीटों पर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी चुनावी मैदान में है। जबकि बीजेपी 57 और उसकी सहयोगी अपना दल (एस) तीन सीटों पर चुनावी मैदान में है। 


बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था

चौथे चरण की जिन 60 सीटों पर चुनाव में हो रहे हैं, उसमें 90 फीसदी सीटों पर बीजेपी गठबंधन का कब्जा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इन 60 सीटों में से 51 सीटें बीजेपी ने जीती थी। जबकि एक सीट उसकी सहयोगी अपना दल (एस) को मिली थी। इस तरह से बीजेपी गठबंधन ने 52 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं, सपा को 4 सीटें मिली थी तो कांग्रेस को 2 और बसपा को 2 सीटों पर जीत मिली थी। हालांकि, कांग्रेस से जीते दोनों विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया है और बसपा से जीते दो विधायकों में एक बीजेपी में शामिल हो गए हैं।  


चार जिले में विपक्ष को चुनौती 

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यूपी के चुनाव के चौथे चरण 9 जिलों में से चार जिलों में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था और विपक्ष को एक भी सीट नहीं मिली थी। पीलीभीत की चार सीटों में से चारों सीटें बीजेपी ने जीती, लखीमपुर खीरी की सभी आठों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है। बांदा जिले की कुल 6 सीटें है, जिनमें से चौथे चरण में चार सीटों पर चुनाव हो रहे हैं और ये चारों सीटें बीजेपी के पास है। फतेहपुर में कुल 6 सीटें है, जिनमें से 5 बीजेपी और एक अपना दल (एस) को मिली थी।  अवध क्षेत्र की हरदोई जिले की 8 सीटों में से 7 बीजेपी और एक अपना दल (एस), एक बसपा और एक सपा को मिली थी। राजधानी लखनऊ जिले में कुल 9 सीटों में से 8 बीजेपी और एक सपा के पास है। ऐसे ही उन्नाव जिले की 6 सीट में से 5 बीजेपी और एक बसपा ने जीती थी। वहीं, गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले रायबरेली में कुल 6 सीटें है, जिनमें से 3 बीजेपी, 2 कांग्रेस और एक सपा को मिली थी। 


लखीमपुर खीरी हिंसा का मुद्दा हावी

लखीमपुर खीरी में केंद्रीय मंत्री टेनी मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा पर किसानों को रौंदने के आरोप हैं। आशीष मिश्रा की जमानत के बाद सियासत गर्म है। विपक्ष न सिर्फ बीजेपी की सरकार पर आशीष मिश्रा को बचाने के आरोप लगा रहा है, बल्कि वो बीजेपी को किसान विरोधी भी बता रहा है। ऐसे में अगर विपक्ष अपने इन दावों से किसानों के बीच सेंध लगाने में कामयाब रहा तो तराई के इलाकों की सीटों के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में लखीमपुर खीरी और उसके पड़ोसी जिलों में पीलीभीत, हरदोई, सीतापुर में दमदार प्रदर्शन किया था। पीलीभीत में कुल 4 विधानसभा क्षेत्र हैं, यहां 2017 में बीजेपी को सभी सीटों पर जीत मिली थी। हरदोई में 2017 के चुनाव में बीजेपी ने यहां की 8 में 7 विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाया था। सीतापुर में यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जिले की 9 में से 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में साफ है कि बीजेपी को अगर लखीमपुर खीरी हिंसा मामले से सियासी नुकसान हुआ तो उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ होगा। 


इन नेताओं की साख दांव पर

चौथे चरण में कई दिग्गज नेताओं की साख दांव पर लगी है। गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में एंट्री करने वाले अदिति सिंह रायबरेली सदर सीट से चुनाव में हैं, जिनका मुकाबला सपा के आरपी यादव से है। योगी सरकार के मंत्री और ब्राह्मण चेहरा बृजेश पाठक अपनी पुरानी सीट छोड़कर लखनऊ कैंट सीट से मैदान में है। पुलिस अधिकारी की नौकरी छोड़कर सियासत में कदम रखने वाले राजेश्वर सिंह सरोजनीनगर सीट से बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर चुनावी ताल ठोंक रहे हैं, जिनके मुकाबले सपा के पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा चुनाव लड़ रहे हैं। लखनऊ मध्य सीट से सपा के दिग्गज नेता रविदास मेहरोत्रा किस्मत आजमा रहा है। वहीं, अखिलेश यादव सरकार में मंत्री रहे मनोज पांडेय जीत की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी परंपरागत सीट ऊंचाहार से चुनावी मैदान में उतरे हैं, जिनके खिलाफ बीपी ने अमरनाथ मौर्य को उतार रखा है। हरदोई सीट से नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल इस बार बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ रहे है। उन्नाव सीट से कांग्रेस के टिकट पर आशा सिंह चुनावी मैदान में हैं, जो उन्नाव की रेप पीड़िता की मां हैं। फतेहपुर की अयाह शाह विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर सांसद विशंभर प्रसादनिषाद चुनावी मैदान में हैं।  


चौथे चरण की 60 सीटें पर चुनाव 

पीलीभीत, बरखेड़ा, पूरनपुर (सुरक्षित), बीसलपुर, पलिया, निघासन, गोला गोकरननाथ, श्रीनगर (सुरक्षित), धौरहरा, लखीमपुर, कस्ता (सुरक्षित), मोहम्मदी, महोली, सीतापुर, हरगांव (सुरक्षित), लहरपुर, बिसवां, सेवता, महमूदाबाद, सिधौली (सुरक्षित), मिश्रिख (सुरक्षित), सवायजपुर, शाहाबाद, हरदोई, गोपामऊ (सुरक्षित), सांडी (सुरक्षित), बिलग्राम-मल्लांवा, बालामऊ (सुरक्षित), संडीला, बांगरमऊ, सफीपुर (सुरक्षित), मोमोहान (सुरक्षित), उन्नाव, भगवंतनगर, पुरवा, मलिहाबाद (सुरक्षित), बक्शी का तालाब, सरोजनीनगर, लखनऊ पश्चिम, लखनऊ उत्तर, लखनऊ पूर्व, लखनऊ मध्य, लखनऊ कैंटोनमेंट, मोहनलालगंज (सुरक्षित), बछरांवा (सुरक्षित), हरचंदपुर, रायबरेली, सरेनी, ऊंचाहार, तिंदवारी, बबेरू, नरैनी (सुरक्षित), बांदा, जहानाबाद, बिंदकी, फतेहपुर, अयाहशाह, हुसैनगंज व खागा (सुरक्षित)


अवध के रास्ते लखनऊ का रास्ता

यूपी में केवल अवध प्रांत में कुल 21 जिले हैं, जिसके अंदर 118 सीटें आती हैं। इन सीटों के लिए राजनीतिक दल खासी मशक्कत कर रहे हैं। इन सीटों पर सपा और बसपा पर बीजेपी को पछाड़ कर आगे निकलने की चुनौती है। यहीं वो दो चरण हैं जिनमें भाजपा ने पिछले चुनाव में रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी। भाजपा को इन दोनों चरणों में 99 सीटें मिली थीं। 


दंगा व आतंकवाद की गूंज 

चुनावी सभाओं में पीएम मोदी साइकिल के सहारे अखिलेश को चुनावी चक्रव्यूह में घेर रहे है तो योगी आदित्यनाथ लखीमपुर खीरी में मुस्लिम तुष्टिकरण और दंगों का जिक्र कर रहे है। योगी ने कहा, ’’सपा का हाथ आंतकवादियों के साथ... उनकी संवेदना, माफिया, अपराधी और आंतकवादियों के साथ थी। जबकि 5 साल में यूपी में कोई दंगा नहीं हुआ है। 


आतंकी संरक्षण 

अहमदाबाद ब्लास्ट केस का जो फैसला आया है और सपा के नेताओं के साथ आतंकियों के परिवार की जो तस्वीरें सामने आई हैं. उसके बाद तो बीजेपी को चुनाव के बीच बड़ा मौका मिल गया है। धमाके में शामिल आतंकियों में से 10 यूपी के है, जिनमें 7 तो आजमगढ़ के थे, जो सपा का गढ़ माना जाता है। आतंकियों के सपा से जुड़े होने के आरोप भी लग रहे हैं। बीजेपी ने तो ब्लास्ट केस में दोषी पाए गए सैफ के पिता शादाब अहमद की अखिलेश और अबू आजमी के साथ फोटो भी शेयर की है। फोटो के साथ लिखा गया है, इन तस्वीरों से तुष्टिकरण में अंधे बबुआ का चेहरा बेनकाब हो गया। 


बीएसपी फैक्टर भी कमजोर नहीं

इस बार के विधानसभा चुनाव में जुबानी जंग भले ही सबसे ज्यादा अखिलेश और बीजेपी में छिड़ी हो, लेकिन चौथे फेज में बीएसपी फैक्टर को कमजोर नहीं आंका जा सकता। क्योंकि अवध के इलाके में बीएसपी का एक बड़ा वोट बैंक है। बीएसपी के वोटर को इस बार साइलेंट माना जा रहा है। 


आंतकियों की बेरहमी क्षमा योग्य नहीं 

2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में 38 मुजरिमों को सजा-ए-मौत और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा मिली है। आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार है, जब किसी एक केस में अदालत ने इतनी बड़ी संख्या में मुजरिमों को मौत की सजा सुनाई है। इससे पहले 1998 में राजीव गांधी की हत्या के मामले में 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गयी थी। 14 साल पहले, 26 जुलाई 2008 को सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने 20 से ज्यादा बम ब्लास्ट को अंजाम दिया था जिसमें 56 बेगुनाह लोगों की मौत हो गई थी और 200 से भी ज्यादा लोग घायल हुए थे। स्पेशल जज एआर पटेल ने 7,000 से अधिक पन्नो के अपने फैसले में लिखा, अगर ऐसे लोगों को समाज का हिस्सा बनने दिया जाता है, तो यह मासूम लोगों के बीच आदमखोर तेंदुओं को खुला छोड़ने के बराबर होगा। चूंकि उन्होंने मासूमों पर कोई दया नहीं दिखाई, इसलिए इस अदालत के पास उनके ऊपर दया दिखाने का कोई कारण नहीं है। सजा पाने वाले सभी 49 मुजरिम फिलहाल 6 शहरों जयपुर, अहमदाबाद, गया, तलोजा, भोपाल और बेंगलुरु की जेलों में बंद हैं। अपने फैसले में, स्पेशल जज ने जिहाद और आतंकवाद के बीच अंतर करने के लिए कुरान का हवाला दिया और धार्मिक संगठनों से इन आतंकवादी संगठनों का बहिष्कार करने की अपील की। जज ने कहा कि मुजरिमों का मकसद गोधरा के बाद हुए दंगों के दौरान हुई हत्याओं का बदला लेना था। इसीलिए उन्होंने धमाके करने के लिए अहमदाबाद के हिंदू आबादी वाले इलाकों को चुना। जज ने कहा कि आतंकवादियों ने धमाके करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में प्लानिंग की और ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए। स्पेशल जज ने कहा कि यह मामला इसलिए रेयरेस्ट ऑफ रेयर है क्योंकि मुजरिमों ने न सिर्फ ब्लास्ट किए, बल्कि ब्लास्ट के बाद जो लोग अस्पताल लाए गए, उन्हें भी टारगेट किया क्योंकि आतंकवादियों को पता था कि जख्मी लोग अस्पताल लाए जाएंगे तो उनके परिजन, अधिकारी और मंत्री भी अस्पताल पहुंचेंगे। फैसले में यह भी लिखा कि आतंकवादियों के निसाने पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह और स्थानीय बीजेपी विधायक प्रतापसिंह जाडेजा भी थे। यह तो नरेंद्र मोदी का नसीब था कि वह इन धमाकों का निशाना बनने से बच गए। यानी मुजरिमों का टारगेट आम जनता ही नहीं, राज्य की हुकूमत भी थी। आतंकवादियों का इरादा उपद्रव और अराजकता पैदा करके इस्लामिक राज कायम करने का था। अगर ऐसे लोग देश में रहकर, राष्ट्र विरोधी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं, तो ऐसे लोगों को उम्र कैद की सजा देकर, जेल में रखकर पालने की जरूरत नहीं है, और सजा-ए मौत ही एकलौता रास्ता है।


आतंकवादियों के सफाए पर  आंसू बहाते सपा और कांग्रेस

पीएम मोदी ने कहा कि, यूपी में एक दो नहीं बल्कि आतंकी हमलों के 14 मुकदमों में समाजवादी सरकार ने बहुत सारे आतंकवादियों से मुकदमे वापस लेने का फरमान सुना दिया था। ये लोग विस्फोट कर रहे थे, धमाके कर रहे थे और समाजवादी पार्टी सरकार इन आतंकवादियों पर मुकदमा तक नहीं चलने दे रही थी। हम सबने मां भारती का नमक खाया है, हिंदुस्तान का नमक खाया है। चुनाव हार रहे घोर-परिवारवादी अब जात-पात के नाम पर जहर फैलाएंगे, आतंकवाद बढ़ता है तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान, गरीब को, मध्यम वर्ग को उठाना पड़ता है। 


जाति समीकरण 

यूपी के चौथे चरण में जिन इलाकों में मतदान होगा, वहां आबादी के लिहाज से अनुसूचित जाति वोट काफी अहम माना जा रहा है। अवध क्षेत्र की बात करें तो सीतापुर में सबसे ज्यादा 32 फीसदी एससी मतदाता है। यही वजह है कि पार्टियां जाति के आधार पर ही अपनी हार-जीत का समीकरण बिठाने में जुटी हैं। हरदोई, उन्नाव, रायबरेली में 30 फीसदी के करीब वोटर हैं। लखनऊ में सबसे कम 21 फीसदी एससी मतदाता हैं। यानी चौथे चरण में अवध के आधे से ज्यादा जिलो में अनुसचित जाती आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है। अवध में एससी आबादी में बड़ी संख्या गैर जाटव वोट की है और साल 2017 के नतीजे बताते हैं कि अनुसूचित जाति वोट भले ही बसपा के पास हों, लेकिन गैर जाटव वोट बंट चुका है। 2017 चुनावों को देखें तो सबसे ज्यादा 43 फीसदी गैर जाटव वोट सपा को मिले हैं। लेकिन 31 फीसदी वोटों के साथ बीजेपी ज्यादा पीछे नहीं है। बीएसपी को गैर जाटव वोट 10 फीसदी के आस पास ही मिले हैं लेकिन जाटव वोट 86 फीसद मिले हैं। इसमें पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई, लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, फतेहपुर और बांदा जिले में शामिल हैं। 




-सुरेश गांधी-

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