विशेष : महिलाओं पर अत्याचार का सिलसिला रुका नहीं है - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 25 मार्च 2022

विशेष : महिलाओं पर अत्याचार का सिलसिला रुका नहीं है

नारी एक ऐसी ईश्वरीय कृति है जिसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है. स्त्री मातृत्व की देवी होने के साथ ही पुरुष की पूरक भी है. समाज की संरचना में उसका योगदान पुरुष से कहीं अधिक माना जाता है. यही कारण है कि ग्रंथों में उसका दर्जा मर्द से ऊपर रखा गया है. जिस स्वर्ग को पाने के लिए ऋषि मुनि तपस्या करते हैं उसे मां रुपी नारी के क़दमों में रख दिया गया है. इतना महत्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद समाज अक्सर स्त्री को वह सम्मान नहीं देता है, जिसकी वह वास्तविक हक़दार होती है. कभी नारी को गुलाम बनाकर रखा जाता है, तो कभी इज़्ज़त और मान मर्यादा के नाम पर उसे घर की चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है. जैसे इज्जत, इज्जत नहीं कोई हौव्वा है और अगर नारी बाहर निकल गई तो इज़्ज़त पर दाग लग जाएगा.


दूसरी ओर समाज की सोच इतनी गंदी है कि उसके लिए स्त्री भोग मात्र वस्तु से अधिक नहीं होती है. आज भी स्त्रियों की हालत इतनी खराब है कि महिलाएं जब घर से बाहर निकलती है तो अपने दिल से इस बात को अलग नहीं कर पाती हैं कि उनकी इज्जत खतरे में हो सकती है. हालांकि लगातार यह संदेश देने का प्रयास किया जाता है कि महिलाएं सशक्त हैं, लेकिन कुछ गिनी-चुनी महिलाओं के सशक्त होने भर से हम नहीं कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण हो रहा है. बात चाहे शहर की हो या गांव की. सभी जगह महिलाएं स्वयं को शत प्रतिशत सुरक्षित नहीं मानती हैं. शहरों में जहां महिला हिंसा का अलग रूप देखने को मिलता है तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक मान्यताओं के नाम पर महिला के साथ हिंसा होती है. कभी यह शारीरिक रूप से तो कभी मानसिक रूप से उसे प्रताड़ित किया जाता है. न्यू इंडिया के इस दौर में भी देश के दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों में महिला हिंसा के विभिन्न स्वरुप देखने को मिलते हैं. पहाड़ी राज्य उत्तराखंड भी ऐसे राज्यों में शुमार किया जाता है, जहां सामाजिक प्रथा के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से महिला हिंसा होती है. हालांकि राज्य के गठन को दो दशक से भी अधिक का समय हो चुका है. मगर पहाड़ी इलाकों की ग्रामीण महिलाओं की स्थिति आज भी पहाड़ जैसी है. जो जल्दी घर आने की उम्मीद में लकड़ियां इकठ्ठी करने जंगलों को निकलती तो हैं, मगर अक्सर ही उन्हें वापस आने में शाम हो जाती है. बारिश के दिनों में सूखी लकड़ियों की खोज में तो कई बार देर रात तक घर लौट पाती हैं. उनकी सारी दिनचर्या ही घर की जिम्मेदारी उठाने में ही निकल जाती है, कभी खाना बनाना तो कभी लकड़ियां ले कर आना अथवा जानवरों के लिए चारा लाना. इन्हीं सब कामों में उनका पूरा दिन चला जाता हैं.   बात गरुड़ ब्लॉक के दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों की करें तो 21वीं सदी के इस डिजिटल युग में भी यहां की ग्रामीण महिलाओं के लिए कुछ नहीं बदला है. गांवों में भले ही कुछ बदलाव आया हो, लेकिन महिलाओं के जीवन में कोई तब्दीली नहीं आई है. उनकी स्थिति आज भी जस की तस है. हालांकि महिलाओं की सुरक्षा व विकास को लेकर कई मंचों से नारे लगाये जाते हैं, तो कहीं महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए सेमिनार का भी आयोजन किया जाता है. इसके बावजूद पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन नाममात्र का देखने को मिलता है. पहाड़ों में कृषीय, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का प्रतिबिम्ब कहीं जाने वाली ग्रामीण महिलाओं की स्थिति बताने के लिये यह दृश्य ही काफी है, जहां हाड़तोड़ मेहनत कर वह घर परिवार की जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करती हैं. इसके बावजूद उसपर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अत्याचार होते है. जिसकी कल्पना किसी सभ्य समाज में नहीं की जा सकती है.


एक तरफ गर्भावस्था दौरान जहां उसे अपवित्र माना जाता है तो वहीं दूसरी ओर किसी मेडिकल कारणों से यदि कोई औरत मातृत्व सुख प्राप्त करने में सक्षम नहीं होती है तो मानसिक रूप से उसे सबसे अधिक प्रताड़ित किया जाता है. ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जब बच्चे को भगवान की देन या भगवान का आशीर्वाद माना जाता है, तो फिर बच्चे को जन्म देने वाली मां अपवित्र कैसे हो जाती है? उसके साथ इतना अत्याचार क्यों किया जाता है? उत्तराखंड के बहुत से पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है, कि जब महिला गर्भवती होती है तो उन्हें गर्भ के तीन महीने बाद से और प्रसव के बाद तक, रसोई घर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता है, और न ही उनके हाथ से बना कोई खाना खाता है. उसे एक प्रकार से अपवित्र माना जाता है. उसे प्रथा और संस्कृति के नाम पर एक ही कमरे में बंद रखा जाता है. जबकि मेडिकल दृष्टिकोण से यही वह समय है जब उसे सबसे अधिक स्नेह और ध्यान रखने की आवश्यकता होती है. उसे अधिक से अधिक पौष्टिक भोजन और खुली हवा की ज़रूरत होती है, ताकि मां और बच्चे दोनों स्वस्थ्य हों.  इस संबंध में एक ग्रामीण महिला सुनीता कहती है कि "हम लोग इस प्रथा से तंग आ चुके हैं. माँ बनना एक महिला के लिए कितनी खुशी की बात होती है और ऐसे में यह प्रथाएं सामने आती है कि मन दुखी हो जाता है. गर्भावस्था के दौरान बहुत कुछ खाने का मन करता है और कमजोरी भी महसूस होती, पर हमें तो रसोई घर में प्रवेश करने की ही इजाजत नही होती है तो मनपसंद खाने को कहां से मिलेगा? गर्भावस्था से लेकर प्रसव होने तक और उसका नामकरण की पूजा तक हम रसोई घर में प्रवेश नहीं कर सकती हैं. पूजा होने के बाद हमें पवित्र माना जाता है उसके बाद हमें रसोई में और घर के अन्य स्थानों पर जाने की इजाज़त दी जाती है."  सवाल यह है कि आखिर समाज की यह सोच कब दूर होगी कि बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री अपवित्र नहीं होती है. अगर इसी बात को दूसरे पहलू पर नजर डाली जाए तो जिन महिलाओं के बच्चे नही होते है, उन्हें समाज पता नहीं किस-किस प्रकार से प्रताड़ित करता है? आखिर समाज की यह कैसी विडंबना है कि जो महिला बच्चे को जन्म दे वह अपवित्र होती है? समाज इस संकुचित सोच को छोड़ कर कब आगे बढ़ेगा इसका पता नहीं, लेकिन महिलाओं पर अत्याचार कल भी होता था और आज भी बदस्तूर जारी है. 




kumari-neha
कुमारी नेहा

गरुड़, बागेश्वर,

उत्तराखंड

(चरखा फीचर)

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