कविता : आक्रांता - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

कविता : आक्रांता

मेरी मुद्रा एक मनुष्य की मुद्रा थी

लेकिन मेरी रात मेरे आँसुओं से तब भर गई

जब संसद के भीतर से कहा गया 

‘मैं मनुष्य नहीं, एक आक्रांता हूँ

जो घोड़े पर आए नीरवता को भंग करते’


ऐसा कहने वाले काफ़ी अनुभवी थे

वो पहले मुझे दबाते चाँपते सताते घाव देते

फिर मारते किसी धारदार हथियार से

जिस तरह पशु-पक्षी की गर्दन

एक ही वार में काटी जाती रही है


उन्हें मारने का हलाल तरीक़ा कभी नहीं आया

सो वो मुझे हमेशा हराम तरीक़े से मारते


वो धर्मशास्त्र के सारे निषिद्ध तरीक़े मानने वाले थे

सो उन्हें मनुष्य-वध का यही तरीक़ा सिखाया गया था


 वो जो भी नियमभंग करते धर्म के नाम पर करते


नियमभंग करते हुए वो मुझे मुसलमान कहकर गालियाँ देते

नियमभंग करते हुए वो मुझे आक्रांता कहकर दोषी सिद्ध करते

जबकि हमेशा आक्रमण मुझ पर किए गए

जबकि हमेशा घर मेरे तोड़े गए निर्दयता से

जबकि हमेशा मेरी औरतों को गालियाँ दी गईं


ऐसा करने के लिए उनके पास सहस्र ईश्वर थे

ऐसा न करने के लिए मेरे पास बस एक ख़ुदा था


तभी उन्हें सहस्र बार मेरी हत्या का अधिकार दिया गया था

तभी उन्हें सहस्र बार मेरे घर ढहाने का अधिकार दिया गया था


तभी उन्हें सहस्र बार मुझे कारावास भेजे जाने का अधिकार दिया गया था


चूँकि उनके पास सहस्र ईश्वर थे और मेरे पास एक ख़ुदा

सो वो हमेशा से शालीन लोग थे और मैं हमेशा से आक्रांता


चूँकि उन्हें घोड़े की सवारी करनी कभी नहीं आई

सो वो बुलडोज़र की सवारी करते विश्वगुरु घोषित करते


चूँकि वो आलापी लोग थे सो वो बस अपनी बात करते

और बस धोखा करते और बस घात करते और बस अहित करते।



कविता : आक्रांता
■ शहंशाह आलम

मोबाइल : 9835417537

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