शिकागो में भाषण के लिए स्वामी विवेकानंद ने एक चर्च में संबोधन से जुटायी थी निधि - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

रविवार, 3 अप्रैल 2022

शिकागो में भाषण के लिए स्वामी विवेकानंद ने एक चर्च में संबोधन से जुटायी थी निधि

church-gives-vivekanand-fund-for-chicago
एनिसक्वाम (अमेरिका), तीन अप्रैल, शिकागो में सितंबर 1893 के ऐतिहासिक भाषण से करीब एक पखवाड़े पहले स्वामी विवेकानंद द्वारा अमेरिका में दिए गये पहले भाषण के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन बोस्टन से करीब 65 किलोमीटर दूर समुद्र किनारे बसे एक गांव के निवासी आज उन्हें एक ऐसे हिंदू सन्यासी के रूप में याद करते हैं, जिनकी बुद्धिमता और ज्ञान हार्वर्ड (विश्वविद्यालय) के किसी प्रोफेसर से भी अधिक था। ऐतिहासिक एनिसक्वाम विलेज चर्च की पादरी सुए कोहलर-आर्सेनॉल्ट ने एक साक्षात्कार में ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मुझे लगता है कि उन्होंने (स्वामी विवेकानंद) यहां जो छाप छोड़ी वह ऐसे किसी व्यक्ति की थी जिसकी संस्कृति बहुत अलग है, जिसका धर्म बहुत अलग है लेकिन उनकी बुद्धिमता, उनका ज्ञान हार्वर्ड के किसी प्रोफेसर से भी कहीं ज्यादा था।’’ स्वामी विवेकानंद ने 27 अगस्त 1893 को अमेरिकी धरती पर अपना पहला भाषण इसी गिरजाघर में दिया था। उन्होंने अगस्त 1893 को रविवार के दिन खचाखच भरे गिरजाघर में जिस डेस्क से भाषण दिया था, वह उस ऐतिहासिक दिन की संभवत: एकमात्र निशानी बची है लेकिन उनका भाषण इस गांव में गूंजता रहता है और निवासियों को लगता है कि वे इतिहास का हिस्सा हैं।


हालांकि, गिरजाघर में उनके भाषण के अंश या सामग्री उपलब्ध नहीं है या इतिहास के वेग में खो चुके हैं लेकिन पादरी ने कहा कि ऐसा माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां भारत की सांस्कृतिक विविधता और अपने देश के बारे में बात की थी और इस गिरजाघर में उनका भाषण हिंदुत्व के बारे में नहीं था जो कि 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म संसद में दिए उनके ऐतिहासिक भाषण का मुख्य विषय था। एक सवाल पर कोहलर-आर्सेनॉल्ट ने कहा, ‘‘मेरी समझ यह है कि वह भारत, उसकी संस्कृति और परंपराओं की एक तस्वीर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्होंने यहां धर्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा बल्कि जीवनशैली के बारे में कहा था।’’ उनके अनुसार, स्वामी विवेकानंद हार्वर्ड के एक प्रोफेसर के निमंत्रण पर इस गांव में आए थे। बोस्टन में एक रेल यात्रा के दौरान इस प्रोफेसर की विवेकानंद से फौरन दोस्ती हो गयी थी। हार्वर्ड के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट का इस गांव में एक घर था। आपस में बातचीत से प्रोफेसर राइट को मालूम चला कि स्वामी विवेकानंद के पास बोस्टन से शिकागो जाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था, इसलिए उन्होंने उन्हें एनिसक्वाम आमंत्रित किया ताकि वह ग्रामीणों को संबोधित कर सकें। साथ ही, वह इस अवसर का इस्तेमाल शिकागो की यात्रा के लिए धन एकत्रित करने के तौर पर कर सकें। शिकागो में ऐतिहासिक भाषण के एक महीने बाद स्वामी विवेकानंद ने हार्वर्ड के प्रोफेसर को पत्र लिखा था और उन्हें ‘‘डियर अध्यापकजी’’ कहकर संबोधित किया था। एनिसक्वाम ऐतिहासिक सोसायटी के पास उपलब्ध इस पत्र की प्रति के अनुसार, स्वामी विवेकानंद ने प्रोफेसर राइट से उन्हें पहले ही पत्र न लिखने को लेकर खेद जताया क्योंकि वह शिकागो के भाषण को लेकर व्यस्त थे। इस गिरजाघर में हर महीने अच्छी-खासी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। साल में एक बार भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लोग यहां एकत्रित होकर स्वामी विवेकानंद के पहले भाषण का जश्न मनाते हैं। स्वामी विवेकानंद इस गांव की यात्रा के दौरान जिन दो घरों में ठहरे थे, वे अब भी वहां मौजूद हैं।

कोई टिप्पणी नहीं: