सौहार्दवर्धक भाषा प्राकृत - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

सोमवार, 1 अगस्त 2022

सौहार्दवर्धक भाषा प्राकृत

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने शपथ ग्रहण कार्यक्रम में ‘जोहार’ शब्द बोलकर अभिवादन किया। यह प्राकृत भाषा का शब्द है, जो आज भी कुछ भाषाओं में प्रचलित है। प्राकृत शब्दकोश में जोहार शब्द मिलता है, जिसका अर्थ नमस्कार किया गया है। राजस्थानी भाषा में भी नमस्कार के अर्थ में जुहार (जोहार का रूप) का प्रयोग विद्यमान है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 13 फरवरी 2019 को 16वीं लोकसभा के आखिरी भाषण में सदन के नेता के रूप में सदस्यों की ओर से किसी भी प्रकार की गलती के लिए जैन आगम साहित्य में प्रयुक्त प्राकृत भाषा के ‘मिच्छामि दुक्कडं’ शब्द का प्रयोग करके माफी मांगी थी। तब अनेक सदस्य मिच्छामि दुक्कडं का अर्थ नहीं समझ पाए थे। जबकि जैन समाज में मिच्छामि दुक्कडं बहुप्रचलित शब्द है।  भगवान महावीर के युग में प्राकृत लोकभाषा और जनबोली के रूप में समादृत थी। लेकिन संस्कृत के पंडित प्राकृत भाषा और प्राकृत बोलने वालों की उपेक्षा करते थे। वह उपेक्षा उसी प्रकार की मानी जा सकती है, जिस प्रकार वर्तमान में कुछ अंग्रेजी जानने वाले अपने अंग्रेजी ज्ञान पर घमण्ड करते हैं और हिन्दी या अन्य भारतीय भाषा बोलने वालों को कमतर आंकते हैं। तीर्थंकर महावीर और गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में प्रदान करके साधारण आदमी को भी असाधारण तत्वज्ञान का खजाना दे दिया था।  प्राकृत का आशय किसी जाति, धर्म या परंपरा विशेष की भाषा से नहीं, अपितु विशाल भारतवर्ष के प्राणों में स्पन्दित होने वाली उन बोलियों के समूह से है, जो ईस्वी पूर्व लगभग छठी शताब्दी से लेकर ईसा की चौदहवीं शताब्दी तक यानी लगभग दो हजार वर्षों तक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित रहीं। आज भी प्राकृत के शब्द और प्रवृत्तियाँ भारतीय भाषाओं में व्याप्त हैं। प्राकृत अध्ययन, अनुशीलन व अनुसंधान के माध्यम से अन्य बातों के अलावा भाषाई एकता और सांस्कृतिक सौहार्द के नवीन द्वार उद्घाटित किये जा सकते हैं। 



Dileep Dhing


- डॉ. दिलीप धींग

शोधप्रमुख: जैनविद्या विभाग, 

शासुन जैन कॉलेज, चेन्नई

कोई टिप्पणी नहीं: