बिहार : रामावातार शास्त्री लोकप्रिय व प्रतिबद्ध सासंद थे - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 17 अगस्त 2022

बिहार : रामावातार शास्त्री लोकप्रिय व प्रतिबद्ध सासंद थे

  • अनीश अंकुर लिखित पुस्तिका ' रामावतार शास्त्री: जीवन और जनसरोकार' का जनशक्ति भवन में  लोकार्पण 

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पटना, 16 अगस्त।  प्रख्यात स्वाधीनता सेनानी व पटना के पूर्व सांसद रामावतार शास्त्री की जनशताब्दी वर्ष के मौके पर  'जनशक्ति' भवन में स्मृति समारोह का आयोजन किया गया।  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित इस समारोह में   संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर द्वारा रामावतार शास्त्री के जीवन पर लिखित पुस्तिका ' रामावतार शास्त्री: जीवन और जनसरोकार'  लोकार्पण किया गया। लोकार्पण करने वालों में थे सुप्रसिद्ध पत्रकार उर्मिलेश, प्रख्यात कवि आलोकधन्वा, अवकाशप्राप्त प्रशासनिक पदाधिकारी व्यास जी, चर्चित चिकित्सक डॉ सत्यजीत,   कैलाशचंद्र झा, पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो नवल किशोर चौधरी, बिहार विधान परिषद के सदस्य केदारनाथ पांडे, सीपीआई  के बिहार  राज्य सचिव रामनरेश पांडे, अ सीपीआई ( एम) के अरुण मिश्रा,  सीपीआई के  पूर्व राज्यसभा सांसद नागेंद्र नाथ ओझा,  सुप्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ एच. एन दिवाकर कुमार, रामबाबू कुमार  आदि  आगत अतिथियों  का स्वागत  रामलला सिंह ने किया। पहले वक्ता थे रामावतार शास्त्री के भांजे दीनानाथ प्रसाद।  सीपीआई के राज्य सचिव रामनरेश पांडे ने रामावातार शास्त्री के संबन्ध में कहा "   बिहार के कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रेरणादायी शख्सियत थे रामावतार शास्त्री । स्वाधीनता आंदोलन के  साथ किसान आन्दोलन, मज़दूर आंदोलन तथा शांति आंदोलनों की उन्होंने अगुआई की।  आमलोगों के लिए सहज-सुलभ सांसद के रूप में उनकी प्रशंसा दूसरे दलों के लोग भी किया करते थे। जननेता होने के साथ -साथ रामावतार शास्त्री पत्रकार व लेखक भी थे। 'जनशक्ति' से उनका संबन्ध जीवनपर्यंत बना रहा।"  रामावतार शास्त्री के साथ काम  कर चुके बुजुर्ग कम्युनिस्ट नेता रामलोचन सिंह ने कहा " रामावतार शास्त्री तीन बार पटना के सांसद रहे। पहली बार में 1967 में संसद के सदस्य बने। संसद में  सबसे ज्यादा सवाल पूछने के कारण उन्हें नॉर्थ इंडिया  के   'कट मोशन का हीरो'  कहा जाता था। इसके साथ-साथ पार्टी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता  बड़ी मजबूत थी तथा मज़दूरों के  संघर्षों से कोई समझौता नहीं करते थे। " सुप्रसिद्ध पत्रकार उर्मिलेश ने अपने संबोधन में कहा " रामावातार  शास्त्री ने  तेरह साल उन्होंने जेल में बिताए। ऐसे लोगों का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए। मैं पटना में 1983 में पत्रकारिता करने आया था तब शहर में वामपन्थ का अच्छा-खासा दबदबा था। रामावातार शास्त्री  तथा उनके साथ अन्य कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति मेरा  आकर्षण तभी से था। मैं उनको काम करते, जनता के  बीच जाते हुए, नेतृत्व करते हुए  देखा था। जिस साल रामावातार शास्त्री की मृत्यु हुई उसी  साल यानी  1988 में ही  कर्पूरी ठाकुर  की भी  हुई थी। " व्यास मिश्रा ने रामावतार शास्त्री को याद करते हुए कहा "  रामावतार शास्त्री जैसा व्यक्ति  जिसके पिता की मृत्यु हो जाये, जिसे दूसरी मां ने पाला हो और  वह 9 साल की अवस्था में बेंत की सजा पाए यह   जानकर लगता है कि नई पीढ़ी को इसे  पढ़कर  प्रेरणा  मिलेगी।  रामावतार शास्त्री   1942 में स्वामी सहजानन्द सरस्वती के जमींदारविरोधी आन्दोलन में शामिल होते हैं। जमींदारी अमानुषिक व्यस्था थी। " चर्चित चिकित्सक और श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट के सचिव डॉ सत्यजीत सिंह ने कहा " "  मेरा गांव  शास्त्री जी के संसदीय क्षेत्र  में  आता था। मेरे पिताजी कम्युनिस्ट  थे लेकिन गांव के लोग उस तरह से कम्युनिस्ट न थे लेकिन दूसरी विचारधारा के लोग भी शास्त्री  जी से जुड़ाव रखते थे। वे हमेशा पोस्टकार्ड रखा करते थे। चिट्ठी के माध्यम से हर किसी  के जन्मदिन वगैरह को याद कर सम्पर्क बनाये रखते थे।" चर्चित हड्डी रोग  विशेषज्ञ डॉ एच.एन दिवाकर ने रामवातार शास्त्री से परिचय के पुराने दिनों को याद करते हुए कहा " जब मैं मेडिकल स्टूडेंट हुआ करता था तब मैं उन्हें  देखा करता था कि सांसद होते हुए भी वे किसी की साईकिल पर बैठकर मेरे हॉस्टल आया करते थे। जितने भी पीड़ित और सताए हुये लोग हैं सबको समान दृष्टि से देखते थे भले ही उसकी जाति कुछ भी क्यों न हो। किसी पर जुल्म होता देख बर्दाश्त नहीं करते थे। वे समझते थे कि हम सांसद बने हैं तो हमें जनता की आवाज उठानी है।" प्रो नवल किशोर चौधरी ने बताया "  वे सहज, सरल, सर्वसुलभ था  मानवीय संवेदनाओं से युक्त प्रतिबद्ध व्यक्ति थे।" लोकार्पण समारोह हिंदी के प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ,  विधान पार्षद  केदार नाथ पांडे,  अरुण मिश्रा ,   जब्बार आलम ,  कैलाशचंद्र झा , अनीश अंकुर ने भी  संबोधित किया।  लोकार्पण समारोह का संचालन जयप्रकाश ने किया । जन्मशताब्दी आयोजन में पटना था आसपास के इलाकों के बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, साहित्यकार, रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, ट्रेडयूनियनों के नेतागण, वामदलों के प्रतिनिधि सहित समाज के विभिनम क्षेत्रों के लोग मौजूद थे।

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