तीन दिवसीय मीडिया चौपाल सफलतापूर्वक सम्पन्न - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 4 दिसंबर 2022

तीन दिवसीय मीडिया चौपाल सफलतापूर्वक सम्पन्न

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चंडीगढ़, 04 दिसम्बर 2022। ‘अमृतकाल में भारत अभ्युदय : चुनौतियां और संकल्प’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय मीडिया चौपाल सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। यह आयोजन चंडीगढ़ स्थित एनआईटीटीटीआर परिसर में आयोजित किया गया। तीन दिवसीय मीडिया चौपाल में 200 से अधिक मीडिया विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, मीडियाकर्मी, शोधार्थी आदि ने हिस्सा लिया। इस चौपाल में तीन विभिन्न विषयों पर आकादमिक सत्र का संचालन किया गया, जिसमें 21 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किये गये। इसके साथ ही पांच विभिन्न विषयों पर अलग-अलग पैनल डिस्कशन और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये गये। तीसरे दिन की शुरुआत चर्चा सत्र से हुई, जिसकी अध्यक्षता दूरदर्शन की भूतपूर्व हिन्दी समाचार वाचिका रंजना यादव ने किया। वहीं, सेंसर बोर्ड की सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार अनिता चौधरी ने विषय-प्रवर्तन किया। वक्ता के तौर पर लेखिका एवं सोलो ट्रैवेलर डॉ. कायनात काजी और लेखिका सोनाली मिश्र उपस्थित रहीं। सत्र संचालन ऋतु दुबे तिवारी और संयोजन रंजना पाण्डेय ने किया। दूसरे चर्चा सत्र में ‘बच्चों के मुद्दे :  मीडिया की भूमिका’ पर चर्चा की गई, जिसमें विषय-प्रवर्तन अमर उजाला डिजिटल के सम्पादक जयदीप कर्णिक ने किया। वहीं, वक्ता के तौर पर कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन के सहायक निदेशक डॉ. संगीता गौड़, पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी तथा लेखिका एवं सोलो ट्रैवेलर डॉ. कायनात काजी मौजूद रहे। सत्र का संचालन एवं संयोजन इंडिया फॉर चिल्ड्रेन के निदेशक अनिल पांडेय ने किया। तीसरे दिन, 'मीडिया चौपाल' की परम्परा के तहत भावी आयोजन पर भी सामूहिक चर्चा सम्पन्न हुई। इस चर्चा की अध्यक्षता राष्ट्रीय महामंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के राष्ट्रीय महामंत्री गोलोक बिहारी राय ने की। वहीं, विषय-प्रवर्तन पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी तथा इंडिया फॉर चिल्ड्रेन के निदेशक अनिल पाण्डेय ने किया। सत्र संचालन मीडिया चौपाल के सह-संयोजन प्रो. अनिल सौमित्र ने किया और सत्र संचालन रुपाली अवाधे और आशुतोष सिंह ने किया। इस अवसर पर डॉ. कायनात काजी की पुस्तक ‘देवगढ़ के गौड़’ का विमोचन भी किया गया। यह पुस्तक कोरोना काल के दौरान की यात्रा पर आधारित है।  इस मौके पर अनीता चौधरी ने भारतीय पौराणिक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत पौराणिक समय से ही समृद्ध रहा है। आज तकनीक को हम समृद्धता का प्रतीक मानते हैं लेकिन डिजिटल तकनीक ने हमारे परिवार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। डॉ. कायनात काजी ने कहा कि आजकल बच्चों का रियलिटी से जुड़ाव खत्म होता जा रहा है क्योंकि उनके हाथ में हमने मोबाइल दे दिया है। हमें कहने और सुनने में अच्छा लगता है कि बच्चों के हाथ में मोबाइल नहीं होना चाहिए लेकिन यह मुमकिन नहीं है क्योंकि हमारे हाथ में जब तक मोबाइल होगा, तब तक हम बच्चों से मोबाइल दूर नहीं कर सकते। डिजिटल मीडिया एक ऐसी आग है, जिसका हमें सतर्कतापूर्वक उपयोग करना चाहिए। अगर हमने सतर्कता नहीं बरती तो यही आग हमारे घर को जला देगी। इस मौके पर ऋतु दुबे तिवारी ने कहा कि वर्तमान में देश में 250 मिलियन युवा विद्यार्थी हैं। कोरोना काल एक ऐसा समय था, जहाँ हम माता-पिताओं ने खुद बच्चों के हाथ में मोबाइल दिया। हमें सूचना के ऐसे हथियार को बच्चों के हाथ में दे दिया जिसे हमें खुद चलाना नहीं आता है। हमने स्वयं को सोशल मीडिया के हवाले दे दिया है और पूरी तरह से इंटरनेट की कठपुतली बन चुके हैं। हमें इस पर विचार करना होगा। सोनाली मिश्र ने कहा कि डिजिटलाइजेशन हमें वर्चुल आजादी देने की बात करता है, जबकि उसने ही हमें अपना गुलाम बना लिया। हमें इस तरह की डिजिटल आजादी के पर पूर्णः विचार करना चाहिए। वर्तमान में जिस तरह का डिस्कोर्स बना है, वह हमारे लिए घातक साबित होगा। रंजना यादव ने कहा कि डिजिटल मीडिया एक गिद्ध की तरह कार्य कर रहा है। बच्चों को घर में देख कर हम सुरक्षित महसूस करते हैं और असुरक्षा की भावना से हम उसे बाहर नहीं जाने देते लेकिन वास्तव में घर के कमरे में डिजिटल मीडिया के कैद में डाल रहे हैं, जो सबसे ज्यादा असुरक्षित है। इस मौक पर जयदीप कर्णिक ने कहा कि डिजिटल में जो होता है, वह शुष्क हो सकता है, पर मनुष्य में संवेदनाएँ होती हैं। पिछले एक दशक में टीवी, अखबार और डिजिटल मीडिया पर बच्चों को मिलने वाला स्पेस एक प्रतिशत से कम है और उनमें भी ज्यादातर समाचार बाल अपराध से संबंधित होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि मीडिया को किसी भी नाबालिक की पहचान उजागर नहीं करना चाहिए। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक केपी सिंह ने कहा कि मीडिया युगदृष्ट्रा है। मीडिया की भूमिका को नहीं बांधा जा सकता। मीडिया में बच्चों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा नहीं की जाती। यह केवल अपराध तक ही सीमित करना गलत है। बच्चों में नशाखोरी के बढ़ते मुद्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मीडिया को विमर्श का माहौल बनाना चाहिए। 

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