आलेख : बसंत पंचमी : श्रीराम रुप में बाबा विश्वनाथ देंगे दर्शन, तिलकोत्सव में गूजेंगी शहनाई - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

आलेख : बसंत पंचमी : श्रीराम रुप में बाबा विश्वनाथ देंगे दर्शन, तिलकोत्सव में गूजेंगी शहनाई

शिव-विवाह से पूर्व होगा भोलेनाथ का तिलकोत्सव, गाए जाएंगे मंगल गीत, दूल्हा रूप में दर्शन देंगे बाबा। जी हां, बसंत पंचमी का पर्व देश भर में विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना के रूप में मनाया जाता है। लेकिन देवों के देव महादेव की नगरी काशी में बाबा विश्वनाथ मंदिर में बसंत पंचमी के दिन को बाबा विश्वनाथ के तिलकोत्सव के रूप में मनाया जाता है। तिलक की इस रस्म को अदा करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु अलग तरह के लिबास में बाबा मंदिर पहुंचते हैं और बसंत पंचमी के शुभ दिन बाबा को तिलक चढ़ाकर अबीर-गुलाल लगा एक-दूसरे को बधाई देते हैं। साथ ही शिवरात्रि के अवसर पर शिव विवाह में शामिल होने का संकल्प लेकर वापस लौट जाते हैं। इस बार बाबा काशी विश्वनाथ का 360वां तिलकोत्सव मनाया जाएगा। तिलक का उत्सव टेढ़ीनीम स्थित विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर होगा। लोकमान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि पर शिव-विवाह के पूर्व बंसत पंचमी पर भगवान शिव का तिलकोत्सव किया गया था। उसी परंपरानुसार, सायंकाल काशीवासी शहनाई की मंगल ध्वनि और डमरुओं के निनाद के बीच तिलकोत्सव की रस्म पूरी करेगें। सात थाल में तिलक की सामग्री लेकर समाजसेवी केशव जालान काशीवासीयों की ओर से बाबा को तिलक चढायेगें 


Basant-panchmi
मान्यता है कि तिलकोत्सव मनाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस साल भी बाबा विश्वनाथ के तिलकोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में है। इस दिन के लिए लोग बड़े ही श्रद्धा के साथ से पूजा-पाठ, पारंपरिक भजन-कीर्तन कर बसंत पंचमी के दिन का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं, जो तिलकोत्सव के बाद एक दूसरे को गुलाल और अबीर लगा बधाइयां देकर खुशियां बंटाते हैं। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर परंपरानुसार रस्में पूरी की जाती है। लोकमान्यता है कि महाशिवरात्रि पर शिव विवाह के पूर्व वसंत पंचमी पर भगवान शिव का तिलकोत्सव हुआ था। उसी परंपरा के तहत 14 फरवरी दिन बुधवार को होने वाले तिलकोत्सव के लिए तैयारियां शुरु हो गयी है। खास यह है कि इस बार त्रेतायुग की तरह एक बार फिर से बाबा विश्वनाथ प्रभु श्रीराम के स्वरूप में काशीवासियों को दर्शन देंगे। 360 साल के इतिहास में पहली बार बाबा विश्वनाथ अपने आराध्य भगवान राम के स्वरूप में महंत आवास पर विराजेंगे। बाबा विश्वनाथ की रजत प्रतिमा का भगवान राम के स्वरूप में शृंगार किया जाएगा। बाबा के तिलकोत्सव के साथ ही काशी में फागुन उत्सव की शुरुआत हो जाएगी। महंत आवास पर निभाई जाने वाली इस परंपरा में काशी की जनता ही बराती और घराती भी होती है। पहली बार काशी के मंदिरों की सहभागिता भी इस तिलकोत्सव को भव्य स्वरूप देगी। टेढ़ी नीम स्थित महंत आवास पर तिलकोत्सव की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। बाबा विश्वनाथ के तिलकहरू 14 फरवरी को शुभ मुहूर्त में बाबा का तिलक चढ़ाने पहुंचेंगे। तिलकोत्सव के दौरान शहनाई के साथ ही डमरू वादन के साथ ही बाबा का तिलक चढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही काशी में होली के रंग बिखरने लगेंगे। राम के स्वरूप में बाबा विश्वनाथ के दर्शन देने के कारण काशीवासियों पर भी रामलला का रंग सिर चढ़कर बोलेगा। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया कि अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कारण पूरे देश में उल्लास है। भोले शंकर के आराध्य भगवान राम हैं और भगवान राम के आराध्य बाबा विश्वनाथ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी कहा है कि शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहि पावा... अर्थात् जो शिव का द्रोह करके मुझे प्राप्त करना चाहता है वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। इस बार बाबा विश्वनाथ को राम के स्वरूप में सजाया जाएगा। काशी की जनता को पहली बार शिव और राम के एक साथ ही दर्शन होंगे। यह पहला मौका होगा जब काशी के मंदिरों की तिलकोत्सव में सहभागिता होगी। तिलकोत्सव के दौरान शहनाई के साथ ही डमरू वादन के साथ बाबा का तिलक चढ़ाया जाएगा। महादेव के तिलक की कथा राजा दक्षप्रजापति से जुड़ी है।


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शिवमहापुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण और स्कंदपुराण में अलग-अलग कथा संदर्भों में महादेव के तिलकोत्सव का प्रसंग वर्णित है। दक्षप्रजापति उस समय के कई मित्र राज-महाराजाओं के साथ कैलाश पर जाकर भगवान शिव का तिलक किया था। उसी आधार पर लोक में इस परंपरा का निर्वाह किया  जाता है। तिलकोत्सव के समय थालों में बाबा के लिए वस्त्र, सोने की चेन, सोने की गिन्नी, चांदी के नारियल सजा कर रखे जाते है। लोकाचार के अनुसार दूल्हे के लिए घड़ी और कलम के सेट भी एक थाल में सजा कर रखे जाते है। काशीवासियों की भीड़ के साथ दशाश्वमेध मुख्य मार्ग से टेढ़ीनीम स्थित जालान गेस्ट हाउस तक बाबा की अगवानी होती है। कन्या पक्ष की ओर से केशव जालान, किशन जालान के सदस्य तिलकोत्सव की रस्म पूरी करते है। इसके लिए वसंत पंचमी की तिथि पर भोर से ही बाबा विश्वनाथ के तिलक का उत्सव टेढ़ीनीम स्थित विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर आरंभ हो जाता है। भोर में चार से 04ः30 बजे तक बाबा विश्वनाथ की पंचबदन रजत मूर्ति की मंगला आरती उतारी जाती है। 06 से 08 बजे तक ब्राह्मणों द्वारा चारों वेदों की ऋचाओं के पाठ के साथ बाबा का दुग्धाभिषेक किया जाता है। सुबह 8ः15 बजे से बाबा को फलाहार का भोग अर्पित किया जाता है। उसके उपरांत पांच वैदिक ब्राह्मणों द्वारा पांच प्रकार के फलों के रस से रुद्राभिषेक किया जाता है। इस दौरान महिलाओं द्वारा मंगल गीत होगा। 02ः30 से 04ः45 बजे तक शृंगार के लिए कक्ष के पट बंद कर दिए जाते है। इसके बाद बाबा विश्वनाथ के पंचबदन रजत प्रतिमा का दूल्हा के रूप में शृंगार किया जाता है। संध्या आरती एवं भोग के बाद सायं पांच बजे से भक्तों के दर्शन के लिए पट खोल दिए जाते है। भक्त बाबा के दूल्हा स्वरूप में दर्शन करते है। तिलकोत्सव के उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रम होते है।


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लोकमान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि पर शिव-विवाह के पूर्व बंसत पंचमी पर भगवान शिव का तिलकोत्सव किया गया था। काशीवासी परंपरानुसार तिलक की रस्म पूरी करते हैं। बंसत पंचमी बुधवार को महंत आवास पर भोर में मंगला आरती के बाद परंपरानुसार दिनभर तिलकोत्सव के लोकाचार होगें। ब्राह्मणों द्वारा चारों वेदों की ऋचाओं के पाठ के साथ बाबा का दुग्धाभिषेक कर विशेष पुजनोपरांत फलाहार के साथ विजयायुक्त ठंडाई का भोग अर्पित किया जायेगा। काशीवासी परंपरानुसार तिलक की रस्म पूरी करते हैं। सायंकाल भक्तों को बाबा विश्वनाथ (राजसी-स्वरूप) दूल्हा स्वरूप में दर्शन देगें। सायंकाल काशीवासी परंपरानुसार शहनाई की मंगल ध्वनि और डमरुओं के निनाद के बीच तिलकोत्सव की रस्म पूरी करेगें। सात थाल में तिलक की सामग्री लेकर समाजसेवी केशव जालान काशीवासीयों की ओर से बाबा को तिलक चढायेगें। तिलकोत्सव की शोभायात्रा महंत आवास पहुंचने पर महंत डॉ. कुलपति तिवारी के सानिध्य में तिलकोत्सव की रस्म पूरी की जाएगी। महंत डॉ कुलपति तिवारी ने बताया कि बसंत पंचमी को सायंकाल बाबा विश्वनाथ की पंचबदन रजत प्रतिमा का तिलकोत्सव टेढीनिम महंत आवास पर होगा। बंसत पंचमी पर तिलकोत्सव के पुर्व भोर चार से साढ़े चार बजे तक बाबा विश्वनाथ की पंचबदन रजत मूर्ति की मंगला आरती के साथ आयोजन की शुरुआत होगी। छह से आठ बजे तक ग्यारह वैदिक ब्राह्मणों द्वारा चारों वेदों की ऋचाओं के पाठ के साथ बाबा का दुग्धाभिषेक करने के बाद बाबा को फलाहार का भोग अर्पित किया जायगा। दोपहर भोग आरती के बाद बाबा विश्वनाथ की रजत प्रतिमा का विशेष राजसी श्रृंगार के बाद सायंकाल पांच बजे से प्रतिमा का दर्शन श्रद्धालुओं को होगा। सात बजे लग्नानुसार बाबा का तिलकोत्सव किया जायगा। सायंकाल 7 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे जिसमें पूर्वांचल के कई जाने माने कलाकार शामिल होंगे। दरअसल बाबा के वैवाहिक आयोजन महंत आवास से ही शुरू होते हैं और खुद महंत डॉ तिवारी मां पार्वती के पिता की भूमिका में होते हैं यानी उनका आवास ही मां गौरा (माता पार्वती) का नैहर यानी मायका होता है। तिलकोत्सव पर बाबा विश्वनाथ की पंचबदन चल रजत प्रतिमा का पंचामृत स्नान के बाद पूजन होगा। आकर्षक परिधानों में बाबा विश्वनाथ को रजत पालकी में विराजमान कराया जाएगा। इसके साथ ही बाबा विश्वनाथ की भगवान राम के स्वरूप में भव्य झांकी सजाई जाएगी। बाबा विश्वनाथ को जन्माष्टमी पर हरि स्वरूप में सजाया जाता है। हर साल जन्माष्टमी पर महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा का हरि स्वरूप में शृंगार किया जाता है।


भगवान कृष्ण ने की सर्वप्रथम सरस्वती पूजन

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आदौ सरस्वती पूजा कृष्णेन विनिर्मिता। यत्प्रसादान्मुनि श्रेष्ठ मूर्खो भवति पण्डितः।। अर्थात जिनकी कृपा से मूर्ख भी पंडित हो जाता है, सरस्वती का सम्मान कभी नहीं घटता। या वीणा वर दण्ड मंडितकरा, या श्वेत पद्मासना।। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने मां सरस्वती को वरदान दिया था कि आज के दिन सच्चे मन से जो भी तुम्हारी आराधना करेगा, वह विद्वान एवं गुणवान बन समस्त संसार को प्रकाशित करेगा। वसंत पंचमी से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। त्रेतायुग में जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया, तब भगवान श्रीराम उन्हें ढूंढ़ते हुए अनेक स्थानों पर गए। उन्हीं में से एक स्थान था- दंडकारण्य, जहां शबरी नाम की एक भीलनी रहती थी। भगवान श्रीराम जब उसकी कुटिया में पधारे, शबरी अपनी सुध-बुध खो बैठी और उसने अपने झूठे बेर भगवान को खिलाए। भक्त-भगवान का वह अद्भुत मिलन वसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। दंडकारण्य का ये क्षेत्र गुजरात व मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। इस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को भगवान श्रीराम का स्वरूप मान कर पूजते हैं।


शक्ति की आराधना भी है सरस्वती पूजा

मत्स्यपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, मार्कण्डेयपुराण, स्कंदपुराण, विष्णुर्मोत्तरपुराण तथा अन्य ग्रंथों में भी देवी सरस्वती की महिमा का वर्णन किया गया है। इन धर्मग्रंथों में देवी सरस्वती को सतरूपा, शारदा, वीणापाणि, वाग्देवी, भारती, प्रज्ञापारमिता, वागीश्वरी तथा हंस वाहिनी आदि नामों से भी संबोधित किया गया है। मां सरस्वती को सरस्वती स्तोत्र में ‘श्वेताब्ज पूर्ण विमलासन संस्थिते’ अर्थात श्वेत कमल पर विराजमान या श्वेत हंस पर बैठे हुए बताया गया है। सरस्वती के उपासक का सम्मान कभी नहीं घटता।


प्रकृति का अद्भूत दिखता है सौन्दर्य

सर्दी की अधिकता के कारण जो पक्षी और जंतु अपने घरों में छिपे होते है, वे भी बाहर निकलकर चहकने लगते हैं। नवजीवन का आगमन इसी ऋतु में होता है। खेतों में पीली-पीली सरसों, अपने पीले-पीले फूलों से किसान को हर्षित करती हैं। या यूं कहे वसंत ऋतु पूरी प्रकृति के रुप को निखारने में कोई कसर नहीं छोड़ती। यह प्रकृति खुलकर अपने दोनों हाथों से कैसे प्यार और सौगात लुटाती है और इस धरा को सजाने में कैसे अपना हुनर दिखाती है, इसे इन दिनों देखा जा सकता है। तभी तो इस दिन सरस्वती पूजन के साथ ही लोग भी प्रकृति के रंग में रंगे दिखाई दे जाते हैं। यानी ऋतुओं में खिला हुआ, फूलों से लदा हुआ, उत्सव का क्षण हैं वसंत। वसंत यानी फूलों में पल्लवन, वनस्पतियों में प्रमोद और धरती का शृंगारमय रचाव। वसंत हमारे मन का हरियाला क्षेत्र है। जितनी उल्लासमय श्रेष्ठताएं हमारे भीतर व बाहर हैं, वे वसंत का ही रूपक हैं। वसंत को अनंग का मध्याह्न कहा जाता है। यह हमारे सृजन, चिंतन व अग्रसरण का भी मध्याह्न है। यही समय है, जब न केवल वन-उद्यान में पुष्प खिल जाते हैं, वरन हम अपनी और किसी अन्य की आंखों में भी पुष्प खिलते हुए देखते हैं।








Suresh-gandhi


सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी

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