- नदियों में नर्मदा सर्वश्रेष्ठ है जिसका पुराण और परिक्रमा होती है : कथा व्यास पंडित चेतन उपाध्याय
उन्होंने गुरुवार को माता सती और भगवान शिव का प्रसंग बताते हुए कहा कि शक एक ऐसी बीमारी है, जो अच्छे से अच्छे रिश्ते को भी तोड़ देती है। इस बीमारी का ना तो कोई इलाज है और ना ही कोई दवा। परंतु ऐसा नहीं कि संशय केवल मनुष्यों को होता है। इस बीमारी से तो देवी-देवता और दिव्य पुरुष भी अछूते नहीं हैं। जब रावण ने माता सीता का हरण किया था और भगवान राम और लक्ष्मण उन्हें ढूंढते हुए दर-दर विचरण कर रहें थे। उसी समय भगवान शिव और माता सती का श्री राम कथा सुनकर कैलाश वापस लौट रहे थे, तभी रास्ते में भगवान शिव को प्रभु श्री राम के दर्शन हुए। राम उस समय लीलावश माता सीता के वियोग में रो रहे थें, जिसके कारण उनकी लीला में विघ्न ना बनने की इच्छा से उन्होंने दूर से ही अपने आराध्य भगवान राम को प्रणाम किया। यह देख माता सती ने उनसे पूछा, हे नाथ, ऐसा कौन है जिसे स्वयं आप सिर झुकाकर प्रणाम कर रहे हैं। इस पर भगवान शिव ने उत्तर दिया, मैं अपने इष्ट प्रभु राम को प्रणाम कर रहा हूं, जिनकी कथा अभी अभी आप और मैं श्रवण करके आ रहे हैं। तब माता सती ने भगवान राम को देखा और उन्हें सीता जी के वियोग में ऐसे रोता-बिलखता और दर-दर भटकता देख उन्हें उनपर संदेह हो गया कि सच में वह भगवान हैं भी या नहीं। यह संदेह उन्होंने भगवान शिव के सामने प्रस्तुत किया जिसे सुन बाबा भोलेनाथ ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उन्हें कुछ समझ ना आया, तब भोलेनाथ ने माता सती को उनके विश्वास के लिए भगवान राम की परीक्षा लेने को कहा, और साथ ही हिदायत दी कि परीक्षा विवेकपूर्ण तरीके से ही लें अन्यथा नहीं।

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