- अजय राय का आरोप : योगी का जनता दर्शनः राहत का मंच या फोटोशूट का प्रबंधन?
- कहा, सर्किट हाउस के हॉल में भाजपा पदाधिकारियों का कब्ज़ा, गेट पर खड़ी रही आम जनता
- भाजपा व सरकार का दावा : मुख्यमंत्री ने जनता की समस्याएं सुनीं, त्वरित निस्तारण का निर्देश दिया
विपक्ष की तस्वीरः निराशा और आरोप
लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर के समानांतर एक और तस्वीर भी उभरी, वह तस्वीर जिसमें हॉल के भीतर भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता आराम से कुर्सियों पर बैठे नजर आए, जबकि बाहर गेट पर असली जनता अपनी बारी के इंतजार में खड़ी रही। कांग्रेस नेता अजय राय ने इसी आधार पर जनता दरबार को “फर्स्ट डे फर्स्ट शो फ्लॉप” और “फोटोशूट दरबार” करार दिया। उनका आरोप है कि जिन नेताओं और जनप्रतिनिधियों की नाकामी और उपेक्षा से जनता महीनों से परेशान थी, वही लोग दरबार के भीतर जगह बनाए बैठे रहे। उनका कहना है कि मंत्री अनिल राजभर के प्रतिनिधि संजय सिंह, दीनदयाल मंडल पदाधिकारी अर्चना सेठ और चांदनी श्रीवास्तव समेत आधे से ज्यादा भाजपा पदाधिकारी हॉल के भीतर आराम से कुर्सियों पर बैठे दिखे, जबकि बाहर असली जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कतार में धूप झेल रही थी। अजय राय ने तंज कसते हुए कहा, “योगी जी का जनता दरबार नहीं, फोटोशूट दरबार था। जिन जनप्रतिनिधियों की नाकामी और उपेक्षा से लोग महीनों से परेशान हैं, वही नेता अंदर सबसे आगे बैठे रहे। जनता बाहर गेट पर खड़ी रही। यह जनता के साथ धोखा है।” विपक्ष का सवाल है, जब दरबार जनता के लिए था, तो नेताओं को विशेषाधिकार क्यों? सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने विपक्ष को और हथियार थमा दिया है। एक तरफ मंच पर भाजपा चेहरे और दूसरी तरफ गेट पर इंतजार करती भीड़ ने इस बहस को और गहरा कर दिया।
जनता दरबार में उम्मीदें भी, उलझनें भी
जनता दरबार के पहले दिन की हकीकत यह है कि इसमें उम्मीदें भी हैं और उलझनें भी। सरकार इसे जनता से सीधा संवाद और त्वरित समाधान का मंच बताती है, वहीं विपक्ष इसे महज दिखावा और फोटोशूट करार देता है। असली सवाल यही है कि जनता दरबार वास्तव में जनता की फरियादों को कितना सुलझा पाएगा।
भरोसे की पहल या दिखावे का खेल?
हकीकत यह है कि जनता दरबार का मकसद तभी पूरा होगा, जब इसमें जनता को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि नेताओं और पदाधिकारियों को। यदि यह मंच सिर्फ सियासी चेहरों की भीड़ से घिरा रहा तो जनता का भरोसा टूटेगा और यह आयोजन औपचारिकता बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुरूप हर फरियाद का त्वरित और ठोस समाधान हुआ, तो यही जनता दरबार सरकार की सबसे बड़ी ताकत और जनता के विश्वास का नया आधार बन सकता है। जनता अब ज्यादा भोली नहीं है। वह देख भी रही है और परख भी रही है। जनता दरबार सरकार के इरादों की असली परीक्षा है, यह जनता को राहत देगा या केवल नेताओं के लिए मंच बनकर रह जाएगा, यह आने वाले दिनों में तय होगा।
भाजपा का बचाव
भाजपा नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री ने जनता की समस्याओं को गंभीरता से सुना और तत्काल निस्तारण के आदेश दिए। पार्टी के मुताबिक, पदाधिकारी वहां जनता की मदद और व्यवस्थाएं देखने के लिए मौजूद थे। उनका कहना है कि विपक्ष सिर्फ नकारात्मक राजनीति कर रहा है।
विवाद के प्रमुख बिंदु
सर्किट हाउस के हॉल में भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता जमे रहे
आम जनता गेट के बाहर घंटों कतार में खड़ी रही
विपक्ष ने कहाकृ“फर्स्ट डे फर्स्ट शो फ्लॉप”
अजय राय का आरोप, “योगी जी का जनता दरबार नहीं, फोटोशूट दरबार”
सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने आरोपों को हवा दी
जनता की उम्मीदें
मुख्यमंत्री से सीधे मिलकर समस्याओं का समाधान
अफसरों और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी का विकल्प
न्याय और राहत की गारंटी का भरोसा
भीड़ और राजनीति से दूर, आम लोगों के लिए खुला मंच
वाराणसी से लखनऊ-गोरखपुर भटकने की मजबूरी खत्म होने की आस
तस्वीरों से बढ़ा विवाद
सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में भी यही तस्वीर सामने आई—हॉल में भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता तो गेट के बाहर अपनी समस्याओं का समाधान पाने की उम्मीद में खड़े आम लोग। विपक्ष ने इन तस्वीरों को हथियार बनाकर सरकार पर सीधा हमला बोला और कहा कि यही वजह है कि लोग महीनों से अपनी फरियाद लेकर लखनऊ और गोरखपुर के जनता दरबार तक भटकने को मजबूर थे।

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