पटना : तस्वीरों की राजनीति और सच्चाई की पड़ताल - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 30 अगस्त 2025

पटना : तस्वीरों की राजनीति और सच्चाई की पड़ताल

Congress-bjp-clash-bihar
पटना, (आलोक कुमार). लोकतंत्र में असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति का स्तर जब असभ्यता तक पहुँच जाए, तो समाज और राजनीति दोनों की गरिमा आहत होती है.बिहार के दरभंगा की रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी दिवंगत मां के लिए अभद्र टिप्पणी की घटना ने पूरे देश को विचलित किया. इस घटना के बाद जैसे ही आरोपी की गिरफ्तारी हुई, सोशल मीडिया पर राजनीतिक रंग चढ़ना शुरू हो गया.


सबसे पहले एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें दावा किया गया कि गाली देने वाला युवक भाजपा कार्यकर्ता है और उसे “आज तक” चैनल ने भी दिखाया है.तस्वीर में कमल का झंडा, गले में भाजपा का दुपट्टा और फूल-मालाएँ थीं.जाहिर है कि जनता के एक हिस्से ने इसे बिना परखे सच मान लिया और राजनीतिक विरोधियों पर तीर छोड़ दिए. लेकिन तथ्य सामने आने पर सच कुछ और ही निकला.आजतक सहित कई राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने फैक्ट-चेक किया और पाया कि यह तस्वीर दरभंगा के उस आरोपी की नहीं है जिसने मंच से गाली दी.असली आरोपी का नाम है मोहम्मद रिज़वी उर्फ राजा (20 वर्ष, दरभंगा निवासी), जबकि वायरल तस्वीर मध्यप्रदेश के भाजपा कार्यकर्ता नेक मोहम्मद रिज़वी की है, जिनका इस प्रकरण से कोई लेना-देना नहीं. यहां सवाल केवल एक व्यक्ति के गाली देने का नहीं, बल्कि उस सामाजिक-राजनीतिक तंत्र का है जो आधे सच और फर्जी तस्वीरों के सहारे भ्रम फैलाता है.जनता के सामने झूठ को सच की शक्ल देकर पेश किया जाता है, और इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा हो जाता है.


यह सच है कि प्रधानमंत्री की माँ का अपमान किसी भी लोकतंत्रप्रेमी नागरिक को स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. यह भी सच है कि ऐसी गिरी हुई भाषा का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति कानून के शिकंजे में है.लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि झूठी तस्वीरों और भ्रामक पोस्टों से किसी पार्टी या विचारधारा को बदनाम करने की साजिश भी लोकतांत्रिक संवाद के लिए घातक है. आज की ज़रूरत यही है कि जनता तथ्यों को परखे, अफवाहों से बचे और मीडिया से अपेक्षा करे कि वह सच्चाई को निर्भीकता और पारदर्शिता के साथ सामने लाए.लोकतंत्र में विचारों का टकराव ज़रूर हो, मगर संवाद सभ्य भाषा और सत्य के धरातल पर ही होना चाहिए.

कोई टिप्पणी नहीं: