- पारिस्थितिकी - सौम्य, शांत जैसा दिखने वाला कबूतर ख़तरनाक वायरस फैला कर पक्षियों,जीव-जंतुओं और कृषि के साथ मनुष्य के लिए हानिकारक साबित हो रहा
पिछले कुछ दशकों में कबूतरों की अनियंत्रित बढ़ती आबादी चिंता का विषय बन गई है। इससे न केवल अन्य छोटे पक्षियों की संख्या पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है बल्कि स्थानीय जैव विविधता में भी भारी अंतर आ रहा है। कबूतर कई प्रकार के वायरस का भी संवहन करते हैं जो अस्थमा व साँस की बीमारियों से प्रभावित लोगों के लिए काफी ख़तरनाक है। एक मादा कबूतर वर्ष भर में 48 बच्चों को जन्म दे सकती है और एक कबूतर एक वर्ष में औसतन 12 किलोग्राम बीट उत्सर्जित करता है जो अत्यधिक अम्लीय तथा जहरीली होती है। सूखने के बाद यह हवा में धूल के साथ मिलकर आसानी से प्रसारित होती है। भारत के हर गांव, कस्बे,शहर में अनेक जगहों पर रोजाना खूब दाना डाला जाता है। अब यह परंपरा घातक हो सकती है। अमेरिका के जैव विज्ञानी और पक्षी विशेषज्ञ रॉबर्ट ए. पियर्स की शोध रिपोर्ट है कि कबूतर शायद मानव बस्तियों से जुड़ा सबसे गंभीर पक्षी है। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व इनकी बीट में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु और कीटाणु, कवक, खांसी, जुकाम, अस्थमा और फेफड़ों में संक्रमण सहित अनेक बीमारियों के कारण बन सकते हैं। शोध में कबूतर के बीट व पंखों में 20 से अधिक पैथोजेनिक बैक्टीरिया और फंगस पाए गए। कबूतरों को पिजन ऑर्निथोसिस, एन्सेफलाइटिस और साल्मोनेला फूड पॉइज़निंग जैसी बीमारियों के संचरण में शामिल पाया गया है। कबूतरों की बीट लंबे समय तक जमा रहने दी जाए, तो हिस्टोप्लास्मोसिस नामक एक प्रणालीगत फफूंद जनित रोग उत्पन्न कर सकती है, जो मानव श्वसन तंत्र को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है।
कबूतर प्रत्यक्ष रूप से स्वयं ही बीमारी नहीं फैलाते बल्कि वे अन्य पक्षियों में बीमारी के बैक्टीरिया संचारित कर उनके माध्यम से भी मानव में प्रसारित करते हैं। मसलन, एक बीमारी है- सिटाकोसिस। यह रोग कबूतरों से विभिन्न पक्षियों की कई अलग-अलग प्रजातियों को प्रभावित कर सकता है। संचरण करते करते संक्रमित पक्षी श्वसन स्रावों और मल के माध्यम से बैक्टीरिया छोड़ते हैं। जब ये स्राव और मल सूख जाते हैं, तो धूल बनकर हवा में फैल जाती है और साँस के ज़रिए मानव श्वसन तंत्र में प्रवेश कर जाती है। यह श्वसन रोग पक्षियों द्वारा छोड़े गए क्लैमाइडिया सिटासी बैक्टीरिया से होता है। कभी-कभी ‘तोता बुखार’ या ऑर्निथोसिस कहा जाता है। लीलावती अस्पताल मुंबई के सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. प्रह्लाद प्रभुदेसाई का कहना है कि पिछले वर्षों में हाइपरसेंसिटिविटी - न्यूमोनाइटिस बीमारी को ज्यादा बढ़ते देखा गया है। यह कबूतरों के संपर्क में आने से होती है। इनकी बीट और पंखों में मौजूद फफूंद सांस से शरीर में जाते हैं। इससे फेफड़ों में सूजन और धीरे-धीरे फाइब्रोसिस यानी स्थायी नुकसान होने लगता है। पिछले 7-8 वर्षों में ऐसी बीमारियों के मामले पांच गुना बढ़ चुके हैं। ‘इंडियन चेस्ट सोसाइटी’ ने इंटरस्टिशियल लंग डिजीज पर रिसर्च की है। इसमें 23 मेडिकल संस्थानों के 1,100 सैंपल से पता चला कि हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस फेंफड़ों की गंभीर बीमारी का बड़ा कारण है। पक्षियों के अलावा कबूतरों के बाहरी परजीवियों में विभिन्न प्रकार के घुन, पिस्सू, किलनी और कीड़े शामिल हैं जो परोक्ष रूप में घातक बीमारियों के संचरण में सहायक बनते हैं। ऐरोमोनस एसपी, सेरेटीया एसपी, प्रोटीयस, स्टेफीलोकस, रिजोपस, फुसारियम, अल्टर्नेरिया और माइकोबेक्टेरियम जैसे घातक सूक्ष्मजीवों के भी वाहक हैं।
अन्य जीव-पक्षियों,खेतों के लिए भी ख़तरनाक
मानव-स्वास्थ्य के लिए गंभीर होने के अलावा कबूतर पारिस्थितिकी और जैव विविधता के लि ख़तरनाक साबित हो रहे हैं। कबूतर बड़ी मात्रा में बीज और अन्य खाद्य संसाधनों का उपभोग करते हैं, जो अन्य पक्षियों और छोटे जीवों के लिए भोजन की कमी का कारण बनता है। वे घोंसले बनाने की जगह के लिए भी अन्य स्थानीय पक्षियों (जैसे गौरैया, मैना आदि) के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं और छोटे पक्षियों जैसे गोरैया, तोते व अन्य पक्षियों का भोजन भी चट कर जाते हैं; जिससे इन अन्य पक्षियों की संख्या में बेहद कमी आई है, छोटी चिड़िया ( गौरेया), जो कीटों का भक्षण करके कृषि में सहायक होती थी, आज विलुप्त प्रायः है तथा कबूतरों के बचे दाने से आकर्षित होकर चूहों की संख्या में वृद्धि भी कृषि के लिए हानिकारक साबित हो रही है। इस प्रकार अनियंत्रित आबादी और तेजी से प्रजनन करने की क्षमता व पर्यावरणीय अनुकूलनशीलता के कारण कबूतर स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को असंतुलित ही करते हैं। जलाशयों के निकट इनकी उपस्थिति, पंखो से गंदगी, बीट निष्कासन छोटी मछलियों व अन्य जलीय जीवों के लिए भी जहरीली साबित होती है। उनकी अम्लीय बीट मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित लेती है। यह पौधों की वृद्धि को भी नुकसान पहुंचा कर स्थानीय वनस्पति को प्रभावित करती है।
यह समस्या केवल भारत की ही नहीं, पूरे विश्व की है। वैश्विक स्तर पर भी इस परेशानी से बचने के लिए कई उपाय अपनाए गए हैं। ऑस्ट्रिया के वियना में कुछ वर्षो से कबूतरों को दाना डालने पर 36 यूरो का जुर्माना निर्धारित है। स्पेन के कई शहरों में ओविस्टोप नामक ड्रग का प्रयोग इनके दाने में मिलाकर किया जाता है जो एक प्रकार का गर्भ निरोधक है। सैन फ्रांसिस्को के अलावा लन्दन के मशहूर ट्राफलगर स्क्वायर पर कबूतरों को दाना डालने पर 2001 से पूर्णतया प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। इसी प्रकार इटली के वेनिस शहर में सेंट मार्क स्क्वायर पर दाना बेचने वालो पर कठोर जुर्माने का है।ऑस्ट्रेलिया, अमरीका, न्यूजीलैंड, कनाडा, जर्मनी जैसे देशों के महानगरों में इन्हें पालना प्रतिबंधित है। भारत में भी इस प्रकार के नियमों की सख्त आवश्यकता है ताकि समय रहते इनकी अनियंत्रित आबादी पर काबू पाकर घातक बीमारियों तथा अन्य पक्षियों की संख्या में आ रही गिरावट को रोककर जैव विविधता का संतुलन पुनः स्थापित किया जा सके।
हरीश शिवनानी
(स्वतंत्र पत्रकारिता-लेखन)
ईमेल : shivnaniharish@gmail.com
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