- इलेक्शन कमीशन दरअसल अब इलेक्शन ओमीशन बन गया है
का. दीपंकर ने आरोप लगाया कि 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने एक गलत तर्क देकर अपनी जवाबदेही राजनीतिक दलों पर डालने की कोशिश की. आयोग ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों के मिलाकर करीब डेढ़ लाख बीएलए हैं - फिर वे क्या कर रहे हैं? जबकि सच्चाई यह है कि मतदाता सूची का सही निर्माण करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है, न कि राजनीतिक दलों की. राजनीतिक पार्टियां और नागरिक समाज केवल सहयोगी हो सकते हैं. उन्होंने आगे कहा कि भाजपा के बीएलए ने अब तक एक भी आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई? क्या चुनाव आयोग और भाजपा के बीच कोई अंदरूनी सांठगांठ है? आयोग की प्रक्रिया बेहद जटिल, अपारदर्शी और आम जनता के लिए समझ से बाहर है. इस प्रक्रिया में शिकायत दर्ज कर पाना भी बहुत मुश्किल है.
माले महासचिव ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग माले के बीएलए की संख्या 1500 बता रहा है, जबकि मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, बिहार के डैशबोर्ड पर यह संख्या 2500 दर्ज है. इनमें से लगभग 1000 बीएलए को अब तक पेंडिंग रखे गए हैं. एसआईआर प्रक्रिया को दो महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन आयोग अभी तक इन बीएलए को मान्यता नहीं दे पाया है. अपना काम तो ठीक से हो नहीं पा रहा, उलटे हम पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि जब आयोग बीएलए को मान्यता ही नहीं देगा, शपथपत्र की प्रति उपलब्ध नहीं कराएगा, और प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से बताएगा नहीं -तो आपत्तियां दर्ज कैसे होंगी? उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान नियम के अनुसार एक बीएलए एक दिन में केवल 10 और अधिकतम 30 मतदाताओं की आपत्ति ही दर्ज कर सकता है. ऐसे में जिन बूथों पर 30 से अधिक विसंगतियां हैं, उनका क्या होगा? यह साफ संकेत देता है कि चुनाव आयोग की मंशा मतदाताओं को सूची से बाहर करने की है. का. दीपंकर ने कहा कि अब बिहार की जनता सब समझ चुकी है. इस बार वोट की चोरी नहीं होने दी जाएगी. वोटर अधिकार यात्रा को जनता का जबरदस्त समर्थन मिल रहा है. एसआईआर के खिलाफ गुस्सा और एनडीए की 20 वर्षों की विफलताओं के खिलाफ बदलाव की तीव्र आकांक्षा दिख रही है.

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