यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक दार्शनिक ग्रंथ भी है। इसमें शिव को अनंत, अखंड, अजर-अमर बताया गया है, जो सृष्टि के आदि और अंत दोनों हैं। कालिदास, कुमारसंभव और रघुवंश जैसे काव्यों में भी शिव की महिमा का जो चित्रण मिलता है, उसकी गूंज शिव महिम्न स्तोत्र में स्पष्ट सुनाई देती है। आचार्यों का मानना है कि यह स्तोत्र अद्वैत दर्शन का भी आधार हैकृजहाँ शिव केवल देवता न होकर परब्रह्म के स्वरूप हैं। यही कारण है कि शैव, वैष्णव और शाक्त सभी संप्रदायों में इसे आदर से पढ़ा और गाया जाता है। कार्यक्रम का आयोजन विश्वमांगल्य सभा काशी प्रांत के धर्म शिक्षा विभाग द्वारा किया गया। इसमें प्रमुख अतिथि के रूप में, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्वभूषण मिश्रा, काशी प्रांत (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) प्रांत संगठन मंत्री अभिलाष जी, केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षण संस्थान कुल सचिव डॉ. सुनीता चंद्रा, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सदस्य कार्यकारी परिषद प्रो. श्वेता प्रसाद, अखिल भारतीय संयोजिका, धर्म शिक्षा विभाग, विश्वमांगल्य सभा डॉ. राधिका जी विशेष रूप से उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता आनंद प्रभा ने की, जबकि सुगंधा ने संचालन कर सभी को भक्ति में डुबो दिया। यह आयोजन केवल स्तोत्र पाठ नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि धर्म और संस्कृति के संवाहक के रूप में महिलाएँ आज भी समाज को दिशा दे रही हैं। सामूहिक स्तोत्र पाठ ने यह सिद्ध कर दिया कि नारी शक्ति यदि एकजुट हो जाए, तो उसका प्रभाव आध्यात्मिक व सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर विराट हो जाता है।
काशी की जीवंत परंपरा
काशी विश्वनाथ धाम प्रशासन के सहयोग से सम्पन्न इस आयोजन ने यह सिद्ध किया कि काशी की धार्मिक परंपराएँ आज भी उतनी ही सजीव हैं, जितनी सदियों पहले थीं। मंदिर परिसर में उपस्थित श्रद्धालु इस दृश्य को देखकर अभिभूत हो उठे। शिवभक्ति में लीन यह सामूहिक पाठ काशी की उसी सनातन परंपरा का द्योतक बना, जिसमें धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को संस्कारित करने और जोड़ने का माध्यम है।

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