सीहोर : मरीह माता मंदिर में नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा-अर्चना - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 23 सितंबर 2025

सीहोर : मरीह माता मंदिर में नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा-अर्चना

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सीहोर। हर साल की तरह इस साल भी नवरात्रि के पावन अवसर पर शहर के विश्रामघाट स्थित मरीह माता मंदिर में आस्था और उत्साह के साथ पर्व मनाया जा रहा है। मंगलवार को यहां पर उपस्थित सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने दूसरे दिन मां के दूसरे स्वरूप माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की। यहां पर सुबह हवन के पश्चात आरती की गई। वहीं पांच दर्जन से अधिक कन्याओं को भोजन के पैकेटों का वितरण किया। उक्त आयोजन मंदिर के व्यवस्थापक गोविन्द रोहित मेवाड़ा, पंडित उमेश दुबे, जितेन्द्र तिवारी सहित अन्य के द्वारा किया जा रहा है। वहीं सुबह हवन और आरती का आयोजन किया गया। एक अक्टूबर को विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा।


संस्कार मंच के संयोजक मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं। पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। लंबे समय तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। बुधवार को मरीह माता मंदिर में चंद्रघंटा मां की पूजा अर्चना की जाएगी।

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