सीहोर : मरीह माता मंदिर में मंगलवार रात्रि बारह बजे की जाएगी महानिशा महाआरती - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

रविवार, 28 सितंबर 2025

सीहोर : मरीह माता मंदिर में मंगलवार रात्रि बारह बजे की जाएगी महानिशा महाआरती

Marih-mata-sehore
सीहोर।  हर साल की तरह इस साल भी नवरात्रि के पावन अवसर पर शहर के विश्रामघाट स्थित मरीह माता मंदिर में आस्था और उत्साह के साथ पर्व मनाया जा रहा है। रविवार को मां के कात्यायनी स्वरूप की पूजा अर्चना की गई। इस मौके पर  मंदिर परिसर में कन्याओं को प्रसादी का वितरण मंदिर के व्यवस्थापक गोविन्द मेवाड़ा, रोहित मेवाड़ा, पंडित उमेश दुबे, जितेन्द्र तिवारी, धर्मेन्द्र माहेश्वरी सहित अन्य बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल थे। अब आगामी मंगलवार को महाष्टमी और बुधवार को भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा।


संस्कार मंच के मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि नवरात्रि की एक तिथि बढ़ने से रविवार को छठवे स्वरूप की पूजा अर्चना की गई। नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की आराधना की जाती है। छठे दिन मां के कात्यायनी स्वरूप की पूजा का विधान है। योग साधना में इस दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्रÓमें स्थित होता है, जो आत्मज्ञान और भक्ति की ऊंचाई का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु जब सम्पूर्ण समर्पण भाव से मां कात्यायनी की उपासना करता है तो उसे सहज ही मां के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी एवं भव्य स्वरूप से युक्त हैं।


स्वर्ण के समान चमकीला वर्ण, सिंह वाहन और चार भुजाओं वाली मां कात्यायनी अत्यंत तेजस्विनी प्रतीत होती हैं। इनके बाए हाथ में कमल और तलवार है, वहीं दाहिने हाथ आशीर्वाद और स्वास्तिक मुद्रा से सुशोभित हैं। भगवान कृष्ण को पाने की कामना से व्रज की गोपियों ने इन्हीं की आराधना यमुना (कालिंदी) के तट पर की थी। मां कात्यायनी का प्राकट्य महर्षि कात्यायन की तपस्या का फल है। महिषासुर के अत्याचार से त्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने तेज से एक दिव्य देवी का आविर्भाव किया, तो महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम उनकी पूजा की। इसीलिए ये 'कात्यायनी नाम से विख्यात हुईं और महर्षि की पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित मानी गईं।

कोई टिप्पणी नहीं: