- वर्ष 1990 से अब तक तीन पीढ़ी करती आ रही प्रतिमा की स्थापना
महिला मंडल ने भी की थी स्थापना
माता की भक्ति में महिलाओं का योगदान न हो यह तो हो ही नहीं सकता। 35 से निरंतर माता की स्थापना का सिलसिला कभी टूटा नहीं। एक बार तो पूरी समिति की जिम्मेदारी महिलाओं ने ही संभाली थी। जहां अध्यक्ष, उपाध्यक्ष से लेकर सभी पदों पर महिलाओं की ही नियुक्ति की गई थी, इतना ही नहीं पूरे नो दिनों तक होने वाली दोनों समय की आरती से लेकर अन्य धार्मिक आयोजन की जिम्मेदारी भी महिला मंडल ने ही संभाली थी।
झूले पर माता के विराजने की कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार जब-जब माता दुर्गा झूले पर विराजमान होती हैं तो यह आस्था और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में वर्णन है कि माता का झूले पर बैठना भक्त और देवी के बीच की आत्मीय निकटता को दर्शाता है। जैसे मां अपने बच्चे को झूला झुलाकर स्नेह लुटाती है, वैसे ही देवी दुर्गा झूले पर विराजकर अपने भक्तों को संरक्षण और आशीर्वाद प्रदान करती हैं। मान्यता है कि झूले पर बैठी माता की झलक देखने मात्र से भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
समिति का आयोजन
इस आयोजन की व्यवस्था नवदुर्गा उत्सव समिति द्वारा की गई है। समिति के अध्यक्ष मनीष सोनी और उपाध्यक्ष पंडित बनवारी लाल ने बताया कि नवरात्र के दौरान प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना, दुर्गा चालीसा, भजन-कीर्तन और प्रसादी का कार्यक्रम रखा गया है। शाम होते ही रंग-बिरंगी रोशनियों और भव्य साज-सज्जा से पूरा पंडाल जगमगाता है।

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