राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत में 2024 के लोकसभा चुनावों के परिणाम को लेकर उन्होंने बार-बार वोट चोरी के आरोप लगाए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह ऐसे बयान वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा के लिए हैं या केवल राजनीतिक हताशा से उपजे ऐसे कदम, जो भारत की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर सकते हैं। राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोप तथ्यात्मक आँकड़ों के आगे कहीं नहीं ठहरते, क्योंकि अगर भाजपा वोट चोरी कर रही होती, तो वह 272 से अधिक सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत प्राप्त करती,न कि 240 सीटों पर सिमट जाती और न ही अमेठी-अयोध्या जैसी प्रतिष्ठित सीटें हारतीं। राहुल गांधी के वोट चोरी आरोपों का खोखलापन स्वयं कांग्रेस के परिणाम ही नकार रहे हैं। कांग्रेस की सीटें 2019 के 52 से बढ़कर 2024 में 99 हो गईं – क्या भाजपा इतनी अक्षम थी कि वोट चोरी करते हुए भी विपक्ष को लगभग दोगुना सीटें दे दीं? इसी तरह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सीटें 5 से बढ़कर 37 हो गईं और महाराष्ट्र में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा – क्या वोट चोरी करने वाली पार्टी अपने गढ़ में इतनी बुरी तरह हार सकती है?
दरअसल राहुल गांधी की सियासी रणनीति भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को गलत समझने की भूल पर टिकी है, और इसके परिणाम कांग्रेस के लिए गंभीर हो सकते हैं। राहुल का जेन-जी वाला बयान भी भारत की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं और परिपक्व मतदाता व्यवहार को देखते हुए कांग्रेस पर उल्टा असर डाल सकता है। कांग्रेस की छवि एक अराजकतावादी और नकारात्मक राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में ही नहीं,बल्कि देश की स्थिरता को जोखिम में डालने वाली भी बन रही है। नेपाल और बांग्लादेश के उदाहरण बताते हैं कि ऐसे अराजक आंदोलन कितने विनाशकारी हो सकते हैं। राहुल गांधी भारत के कोई सामान्य नेता नहीं हैं। वे पिछले दो दशकों से राजनीति में सक्रिय रहकर पांचवी बार सांसद बने हैं। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि इतनी मजबूत है कि वे उस परिवार से आए हैं जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं और ख़ुद भो प्रधानमंत्री पद के दावेदार मानते हैं। विडम्बना यह है कि इतने महत्वपूर्ण तथ्यों के बावजूद राहुल गांधी की राजनीति में गंभीरता और परिपक्वता नहीं झलकती है। प्रभावी पृष्ठभूमि और संवैधानिक पद पर होने के बाद वे अनेक मौकों पर देश और विदेशी मंचों पर इस बात को साबित कर चुके हैं। कई बार तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि उन्हें मालूम ही नहीं कि किस मौके पर उन्हें कहना क्या है। उनकी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समझ,वैश्विक बोध की अपरिपक्वता इनके जेन-जी वाले बयान से झलकती है कि अराजक और दिशाहीन युवाओं के उन हिंसक प्रदर्शनों को वे क्रांति समझ रहे हैं,जिन्होंने अपने ही देशों को बर्बादी के कगार पर ला दिया। इक्कीस सालों की राजनीतिक यात्रा के बाद भी सियासी बीहड़ में उनके भटकाव का दौर जारी है। राहुल गांधी को समझना चाहिए कि भारत का लोकतंत्र नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका से कहीं अधिक परिपक्व और मजबूत है। भारत में न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाएं मजबूती से काम कर रही हैं। मतदाता भी जागरूक हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास रखते हैं। राहुल गांधी का नेपाल जैसी स्थिति की ओर इशारा करना भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता को नजरअंदाज करना है। वे निश्चित रूप से यह भी नहीं जानते कि भारत में आज की युवा पीढ़ी की प्राथमिकताएं रोजगार, शिक्षा और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर केंद्रित हैं, न कि विवादास्पद राजनीतिक नैरेटिव पर। आज के भारत की जेन-जी टेक्नो-सेवी ही नहीं, काफी तार्किक और विश्लेषणात्मक बैद्धिक कौशल वाली है। वो परिवाद,भ्रष्टाचार, नाटकीय शैली में किये गए खोखले दावों को स्वीकार नहीं करती। राहुल गांधी को युवाओं के जवाब और उनकी प्रतिक्रिया को समझने के लिए हाल ही सामने आए पंजाब,दिल्ली और हैदराबाद विश्वविद्यालयों के छात्र संघ के चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रमुख पद जीते, जबकि एनएसयूआई (कांग्रेस की छात्र इकाई) की करारी हार हुई। आज का युवा अच्छी तरह जानता है कि हाल ही नेपाल की जेन-जी ने हिंसक तरीके से जो अराजकता मचाई है, उससे उबरने में नेपाल को बरसों लग जाएंगे। नेपाल और बांग्लादेश में हाल के राजनीतिक उथल-पुथल ने इन देशों की अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक संस्थानों पर गंभीर प्रभाव डाला है। इसके परिणाम हिंसा, अराजकता और आर्थिक तबाही के रूप में सामने आए। इन सबके बावजूद राहुल गांधी अगर जेन-जी की भूमिका की सराहना कर उसे भारतीय व्यवस्था में इस्तेमाल करना चाहते हैं तो यह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता और अगम्भीरता को दर्शाती है।
हरीश शिवनानी
स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन
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