विचार : बरसात में छलनी होती सडकें - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 24 सितंबर 2025

विचार : बरसात में छलनी होती सडकें

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बरसात के कारण छलनी होती सडकों के फोटो और इससे होती दुर्घटनाओं के समाचार मीडिया की सुर्खियां बनना आम होता जा रहा है। कई स्थानों पर तो सडक पर गड्ढों की भरमार इस हद तक है कि सडक को ढूंढना ही मुश्किलभरा काम हो जाता है। सडक पर गड्ढों के कारण पानी भरना तो आम है ही इसके साथ ही दुर्घटनाओं और दुर्घटना में मौत का प्रमुख कारण भी यह गड्ढ़े बनते जा रहे हैं। यह कोई इस मानसून के हालात नहीं है और यह कहीं स्थान विषेष की भी बात नहीं है अपितु कमोबेस गड्ढ़ों को यह मकड़जाल किसी भी तरफ निकल जाओ, देखने को मिल जाएगा। हालांकि इस बार वैसे भी देश में मानसून अधिक सक्रिय रहा है और देश में करीब करीब सभी क्षेत्रों में अन्य सालों की तुलना में अधिक बरसात हुई है। ऐसे में सडक में गड्ढ़े होने का एक  कारण यह बताया जा सकता है पर सत्यता तो यह है कि सडकों पर गड्ढ़ों के साल दर साल यही हालात रहते हैं। हमारे नगर नियोजक, निकाय संस्थाएं है और इंजीनियर इस साल मानसून की अधिक वर्षा को दोष दे सकते हैं या यह भी कह सकते हैं कि राह में खड्ढ़ों की समस्या हमारे यहां ही नहीं अपितु विश्वव्यापी समस्या है और रिपोर्ट की माने तो सडक पर खड्ढ़ों के कारण होने वाली मौतों में हमारे से दो कदम आगे अमेरिका जैसा विकसित देश तक हैं। पर अमेरिका, ब्रिटेन या अन्य देशों के उदाहरण देकर बचा नहीं जा सकता। आज देश में प्रतिदिन औसतन 5 व्यक्तियों की मौत का कारण सडक के गड्ढे है। वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो 2021 में आतंकवादी गतिविधियों के कारण 5226 लोग मारे गये। वहीं दूसरी और अकेले अमेरिका में ही 2021 में सड़कों के गड्ढ़ों के कारण 15 हजार से अधिक मारे गए। इसी तरह से इंग्लैण्ड में 1390, भारत में 3565, रुस में 431 लोग मारे गए।  कमोबेस दुनिया के देशों में आज भी सड़कों पर गड्ढ़ो के कारण दुर्घटना से मौत के आंकड़ों में साल दर साल बढ़ोतरी ही होती जा रही है।सड़क के गड्ढ़ों की वैश्विक गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि जानकारों को मानना है कि प्रतिवर्ष 15 जनवरी को राष्ट्रीय गड्ढ़ा दिवस मनाया जाता है। खैर यह विषयांतर होगा।


दो टके का सवाल यह है कि देश-दुनिया में तकनीक के इतने विकास के बावजूद सडकों के निर्माण में गुणवत्ता का कोई ऐसा मानक नहीं विकसित हो सका क्या कि जिससे साल दर साल होने वाले इन गड्ढ़ों की समस्या का समाधान हो सके। क्योंकि यह तो साफ हो जाना चाहिए कि इतनी बड़ी मात्रा में सडकों में गड्ढे होना कहीं ना कहीं हमारी क्षमता पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। यह भी सामान्य वुद्धि वाला व्यक्ति आसानी से समझता है कि सडक पर पानी भरना, पानी का रिसाव, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से समझौता, यातायात दबाव के अनुसार सडक डिजाइन नहीं करना, लेवलिंग आदि ऐसे कई कारण है जो सीधे सीधे हमारी इंजीनियरिंग समझ को चुनौती दे रहे हैं। सवाल यह भी नहीं कि सडकों के यह हाल अतिवृष्टि के कारण हो रहे हो। एक समय था जब सडक के किनारे किनारे पानी के निकास के लिए नालियां होती थी और शहर-कस्बों में तो नालियां देखने को ही नहीं मिलती। दूसरा यह भी साफ है कि डामर और पानी के बीच 36 का आंकड़ा है ऐसे में सडक बनाते समय लेवलिंग पर ध्यान दिया जाना जरुरी हो जाता है ताकि पानी की सही निकासी हो और पानी नहीं भरे। होता यह है कि जहां भी ढ़लाव रह जाता है वहां पानी भरने लगता है और उस कारण से सडक पर गड्ढ़े होना शुरु हो जाता है। एक अन्य कारण यातायात का दबाव भी होता है। सडक का निर्माण करते समय उस रुट पर यातायात का कितना दबाव रहेगा इसका आकलन कर ही सडक तैयार की जानी चाहिए। बड़े वाहनों के अत्यधिक आवागमन से सडक अधिक वजन नहीं झेल पाती और धीरे धरी सडक टूटने लग जाती है और इसका खामियजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है। टोल सडक होने के बाद कम से कम हाईवे पर तो यह समस्या नहीं होनी चाहिए पर धरातल पर ऐसा है नहीं है। सडक कार्यों का भी सोशल ऑडिट होना चाहिए।


यह किसी एक साल या एक स्थान की समस्या नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि इंजीनियर्स व स्थानीय निकायों को इसकी जानकारी ना हो, ऐसे में हर मानसून में सडकों पर गड्ढों की भरमार होना कहां तक उचित कहा जा सकता है। सोचना यह होगा कि किसी जिम्मेदार की छोटी सी लापरवाही किसी परिवार पर कितना कहर बन कर आती है। केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के साथ ही राज्यों के सड़क परिवहन मंत्रालयों खासतौर से सड़क निर्माण में जुटी संस्थाओं को दुर्घटनामुक्त सड़कों के निर्माण के साथ ही सड़कों के रखरखाव के प्रति ध्यान देना होगा। स्थानीय निकायों और  नेशनल हाईवे एनएचएआई को खासतौर पर इस ओर ध्यान देना होगा। यह साफ हो जाना चाहिए कि जब हम किसी को जिंदगी दे ही नहीं सकते तो हमारी लापरवाही किसी के मौत का कारण क्यों बने। सडक निर्माण करते समय ही संभावित सभी कारणों को चिन्हित कर उनके अनुसार क्रियान्वयन जरुरी हो जाता है। इसमें जिम्मेदारों की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।




डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

स्तंभकार

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