मिग-21 सुपर सोनिक फाइटर विमान का निर्माण सोवियत रुस द्वारा 1950 के दशक के दौरान आरंभ किया और मिग की पहली उड़ान 1955 में हुई। 1962 के युद्ध के अनुभवों के कारण भारत को अपनी वायुसेना को मजबूत बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को एफ-16 विमानों की आपूर्ति के कारण भारत को भी अपनी वायुसेना को वेल इक्विप्ड करने की आवश्यकता महसूस हुई और अमेरिका सहित अन्य देषों के फाइटर विमानों के विकल्प होने के बावजूद भारत ने सोवियत रुस के मिग फाइटर विमान खरीदने को पाथमिकता दी। हालांकि 1965 के युद्ध में मिग का सीमित योगदान रहा पर 1971 के युद्ध की तो भाषा ही मिग फाइटर ने बदल कर रख दी। अमेरिका के एफ-16 विमानों को मारगिराकर मिग विमानों ने ना केवल अपनी मारक क्षमता का प्रदर्शन किया अपितु दुनिया के देशों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया। हालिया ऑपरेशन सिन्दुर में भी मिग विमानों ने महत्वूपर्ण भूमिका निभाई है।
मिग-21 अपनी उड़ान क्षमता, तेजी से आकाश में उंचाई पर जाने, ध्वनी से भी तेज गति से उड़ाने भरने और निशाने पर निशाना साधनें में सफल रहा है। दुश्मन देष तो मिग के नाम से दहसत खाने लगे थे। मिग-21 छोटे रनवे, कठिन हालातों में भी उड़ान भरने में सक्षम रहा है। अचानक हमले के हालातों में भी यह भरोसेमंद रहा है। सूई की नोक जैसे इस विमान में तापमान की समस्या के बावजूद इस विमान की उड़ान भरने में वायुसेना फाइटर गौरव महसूस करते रहे हैं। 2021 के बालाकोट के दौरान भी इसने अपने शौर्य का प्रदर्शन किया। इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के 60 से अधिक देशों में मिग ने अपने पराक्रम को दिखाया पर मिग के निर्माता सोवियत रुस से ही मिग की विदाई सबसे पहले आरंभ हुई। रशिया ने 1990 से ही मिग की विदाई आरंभ कर दी। चीन, पौलेण्ड, बुल्गारिया, रोमानिया, चेकस्लोवाकिया, क्रोएशिया, हंगरी आदि इसे विदाई दे चुके हैं। हालांकि सीरिया, उत्तर कोरिया औद अफ्रिकी देशों में मिग सेना के हिस्से बने हुए हैं। भारत में मिग का लंबे समय का कार्यकाल रहा है। फ्लाइंग काफिन जैसे नाम से बदनामी के बावजूद अपग्रेडेड मिग का भारतीय सेना में उपयोग होता रहा। निशाने पर लक्ष्य को साधने में सक्षम होने के बावजूद जिस तरह से इसके क्रेस होने की गति रही है उससे यह बदनामी का भी प्रमुख कारण रहा है। और यही कारण है कि मिग-21 की गौरवपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद अंततोगत्वा 62 साल की लंबी यात्रा के बाद इसे सम्मानपूर्वक विदाई दी गई है। देखा जाएं तो मिग ने भारतीय सेना में अपनी गौरवपूर्ण सेवाएं दी और भारतीय सैनिकों ने युद्ध के दौरान इसका जिस तरह से उपयोग किया वह भारतीय सेना के गौरव को बढ़ाने वाला रहा। यही कारण है कि मिग को गौरवपूर्ण समारोह में विदाई दी गई। जहां से इसकी शुरुआत हुई वहीं से इसको विदाई दी गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विदाई समारोह में कहा कि भारतीय वायु सेना के इतिहास में मिग की सेवाओं को स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। मिग को भारत और रुस के बीच संबंधों से भी जोड़ के देखा जाता रहा है। खासबात यह कि उड़ता ताबूत कहलाने के बावजूद भारतीय वायु सेना में मिग ने 60 वर्ष से भी अधिक समय तक अपने सामर्थ्य से देश के जरुरत के समय अपेक्षाओं पर खरा उतरा। युद्ध या यौद्धिक गतिविधियों के दौरान मिग गैम चैंजर सिद्ध हुआ है। यही कारण है कि मिग को रिटायरमेंट की गौरवपूर्ण विदाई दी गई। अब भारतीय वायु सेना में स्वदेशी फाइटर तेजस मिग का स्थान लेगा। सुखाई, राफेल और तेजस आदि की उपस्थिति से आज भारत की वायुसेना दुनिया की सबसे सक्षम और ताकतवर सेनाओं में से एक है। भले ही भारतीय वायु सेना के बेडे से मिग की विदाई हो गई है पर 1971 का युद्ध, करगिल, बालकोट, ऑपरेशन सिन्दुर और इसी तरह के अभियानों की चर्चा होगी तो मिग की गौरवपूर्ण सेवाओें को सम्मान के साथ याद किया जाएगा।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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