सड़कों की यह समस्या महज सुविधाओं का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार से जुड़ी है। अध्ययनों में पाया गया है कि जहाँ सड़कें बेहतर हैं वहाँ लड़कियों का स्कूल में नामांकन और उपस्थिति बढ़ी है। किशोरियों के लिए सुरक्षित और सुचारु मार्ग शिक्षा तक उनकी पहुँच आसान बनाता है। लेकिन जब रास्ता टूटा-फूटा हो, तो परिवार की पहली चिंता उनकी सुरक्षा होती है और अक्सर उनकी पढ़ाई अधूरी रह जाती है। यानी खराब सड़कें सीधे लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी ऐसी ही है। नाथवाना जैसी बस्तियों में गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुँचाना कठिन होता है। आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस गाँव तक नहीं आ पाती, और कई बार मरीजों को प्राइवेट गाड़ियों से अस्पताल ले जाना पड़ता है। जो अक्सर गांव के गरीब परिवार के लिए बजट से बाहर हो जाता है। इसके लिए उन्हें कर्ज लेने पर मजबूर होन पड़ता है। इस कर्ज से बचने के लिए वह कई बार घर में ही अप्रशिक्षित दाई से प्रसव कराने को प्राथमिकता देते हैं। इससे मातृ और शिशु स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होता है। वहीं बुजुर्गों और बीमारों की जान भी जोखिम में पड़ जाती है। जबकि शोध बताते हैं कि जब ग्रामीण सड़कें बेहतर होती हैं तो क्लीनिक और अस्पतालों तक पहुँच बढ़ जाती है और स्वास्थ्य संकेतक सुधारते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। खेतों से निकली उपज समय पर मंडी तक नहीं पहुँच पाती, जिससे किसानों को नुकसान होता है। पुरुष अक्सर रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं और गाँव में बचे परिवारों पर महिलाओं का बोझ बढ़ जाता है। महिलाएँ खेत, घर और बच्चों की जिम्मेदारी एक साथ उठाती हैं, लेकिन खराब सड़कें उनके लिए बाज़ार तक पहुँचने और आत्मनिर्भर बनने की राह में दीवार बन जाती हैं। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि सड़क सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, यह सामाजिक न्याय और अवसर का आधार है। यदि सड़कें सुरक्षित, टिकाऊ और सबके लिए सुलभ हों तो वे गाँव की लड़कियों के लिए शिक्षा का दरवाज़ा, महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का मार्ग और बुजुर्गों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती हैं। नाथवाना जैसे गाँव यह सिखाते हैं कि सड़क के विकास को केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर के नजरिये से नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे मानवीय और लैंगिक दृष्टिकोण से समझना होगा। योजनाएँ तब सफल होंगी जब उनमें स्थानीय महिलाओं की भागीदारी होगी, जब रख-रखाव के लिए पारदर्शी व्यवस्था बनेगी, और जब हर बच्चा, किशोरी, किसान और बुजुर्ग बिना डर और कठिनाई के इस रास्ते से गुजर सकेगा। आज भी नाथवाना के बच्चे धूल भरे रास्तों पर किताबें थामे स्कूल जाते हैं। लेकिन उनके चेहरे पर उम्मीद है कि शायद एक दिन उनके गाँव की सड़कें भी पक्की होंगी, शायद कल किशोरियाँ बिना डर के स्कूल जाएँगी, और बुजुर्ग बिना तकलीफ़ अस्पताल पहुँच पाएँगे। यही उम्मीद हमें याद दिलाती है कि सड़कें केवल दूरी घटाने का जरिया नहीं, बल्कि जीवन और समानता तक पहुँचने का पुल हैं। इसी उम्मीद को टूटने से बचाना सभी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
कलावती
लूणकरणसर, राजस्थान
गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)


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