- संतान की दीर्घायु के लिए आज माताएं सूर्योदय से निर्जला उपवास का संकल्प लेंगी, कल करेंगी पारण
- निर्जला उपवास में मां का अटूट विश्वास, संतान की लंबी उम्र के लिए 24 घंटे की तपस्या
वाराणसी (सुरेश गांधी)। आश्विन कृष्ण अष्टमी की बेला, गंगा-तट की ठंडी हवा, धूप-दीप की सुगंध और आस्था के मंत्रों से गूंजती गलियां। संतान की दीर्घायु के लिए मां की अटूट प्रार्थना शनिवार की सुबह-सांझ को विशेष बना रही है। जीवित्पुत्रिका, जिसे जन-जन में जितिया कहा जाता है, महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के अमर प्रेम और तप का जीवंत आख्यान है। संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा जीवित्पुत्रिका व्रत, लोकप्रिय नाम ‘जितिया’ शनिवार को नहाय-खाय की परंपरा के साथ आरंभ हो गया। रविवार 14 सितंबर को माताएं 24 घंटे का निर्जला उपवास रखेंगी और सोमवार 15 सितंबर सोमवार प्रातः 6ः27 बजे पारण करेंगी। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाला यह पर्व मां की ममता, त्याग और संकल्प का जीवंत प्रतीक है। यह उपवास भूख-प्यास का साधारण त्याग नहीं, यह वह निःशब्द प्रार्थना है जिसमें मां अपनी हर पीड़ा को संतान के जीवन की सुरक्षा में बदल देती है।
सुबह की पहली किरण के साथ ही खोजवां, लंका, मलदहिया, भेलूपुर, लोहता से लेकर सारनाथ तक की गलियों में अद्भुत हलचल थी। महिलाओं ने चावल, कुशा, धूप-दीप, दही-चूड़ा, लाल-पीले धागे और सोने-चांदी के लॉकेट खरीदे। बाजार के हर नुक्कड़ पर आस्था के रंग घुल गए, नोनी के साग की खुशबू, सतपुतिया की ताजगी, और गन्ने की मिठास जैसे पूरे नगर को व्रत की पवित्रता में डुबो रहे हों। रविवार को सायंकाल, जब दीपक की लौ में थरथराएगी, तब हर आंगन में गोबर से बने पोखर और पाकड़ की डाली के पास बैठी माताएं गीत गाएंगी, सिर्फ अपने बच्चों के नाम की नहीं, बल्कि उस अनन्त शक्ति के लिए जो ममता को अमर रखती है। यही जितिया है, जहां भूख से बड़ा प्रेम है, और प्यास से गहरी प्रार्थना. नहाय-खाय के दिन व्रती महिलाएं स्नान-ध्यान कर मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग, दही और चूड़ा का सेवन करती हैं। रविवार को वे सूर्योदय से पूर्व सात्विक भोजन कर निर्जला उपवास का संकल्प लेंगी। आश्विन कृष्ण अष्टमी के प्रदोषकाल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा कर व्रत की कथा सुनना अनिवार्य माना गया है।
शुभ मुहूर्त
इस वर्ष अष्टमी तिथि 14 सितंबर रविवार को सुबह 8ः51 बजे से आरंभ होकर 15 सितंबर सोमवार को प्रातः 5ः36 बजे तक रहेगी। पारण का शुभ समय सोमवार सुबह 6ः27 बजे के बाद का है। पौराणिक मान्यतानुसार, चील ने इस व्रत का पालन कर सात पुत्रों का सुख पाया, जबकि सियारिन के छल ने उसे संतान सुख से वंचित कर दिया। बाद में भगवान जीमूतवाहन की कृपा से उसे भी संतान सुख मिला और तभी से यह व्रत अनंत आस्था का प्रतीक बन गया।
साग-सब्जी की मांग बढ़ी
नोनी का साग 40 रुपये प्रति पाव और सतपुतिया 5 से 10 रुपये में बिका। केला 50 रुपये दर्जन और सेब 120 रुपये किलो तक पहुंच गया। धागा और लॉकेटः परंपरा के अनुसार लाल-पीले रंग के धागे और सोने-चांदी के लॉकेट की भी जमकर खरीदारी हुई। महिलाओं ने बच्चों की संख्या से एक अधिक लॉकेट धारण करने की परंपरा निभाई।

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