सचदेवा ने कहा कि इनवर्टेड टैक्स स्ट्रक्चर की वजह से इनपुट टैक्स क्रेडिट या रिफंड भी उपलब्ध नहीं है, जिससे निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है। परिणामस्वरूप, छोटे और मध्यम उद्यम (MSME) बड़े कॉरपोरेट पेपर मिलों की तुलना में भारी नुकसान झेल रहे हैं। इससे न सिर्फ छात्रों और अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है, बल्कि रोजगार और स्थानीय स्तर पर कार्यरत उद्यमों की स्थिति भी कमजोर हो रही है। उद्योग जगत ने सरकार से तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली—यह स्पष्ट किया जाए कि नोटबुक और अभ्यास पुस्तिका निर्माण हेतु प्रयुक्त कागज व पेपरबोर्ड पर भी 0% जीएसटी लागू होगा। दूसरी—एक सरल अनुपालन तंत्र बनाया जाए ताकि पेपर मिलें निश्चिंत होकर 0% जीएसटी पर बिल जारी कर सकें। तीसरी—यह सुनिश्चित किया जाए कि छोटे और मध्यम नोटबुक निर्माता बड़ी पेपर मिलों के मुकाबले नुकसान की स्थिति में न आएं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस विसंगति को दूर नहीं किया गया तो लाखों छात्रों को महंगी नोटबुक खरीदनी पड़ेगी और हजारों छोटे निर्माताओं का व्यवसाय संकट में आ जाएगा। वहीं, समय रहते राहत प्रदान की गई तो शिक्षा क्षेत्र को सीधा लाभ मिलेगा और सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ अभियान भी मजबूत होगा। उद्योग जगत का मानना है कि शिक्षा से जुड़ी सामग्री पर कर का बोझ कम करके ही देश के भविष्य को सशक्त बनाया जा सकता है।
नई दिल्ली (रजनीश के झा)। जीएसटी सुधार 2.0 के तहत केंद्र सरकार ने कागज एवं पेपरबोर्ड पर जीएसटी दर 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दी है। इस फैसले के बाद शिक्षा क्षेत्र, प्रिंटिंग और प्रकाशन उद्योग, तथा छोटे उद्यमों में गहरी चिंता देखने को मिल रही है। उद्योग जगत का कहना है कि इस बढ़ोतरी का सीधा असर छात्रों और अभिभावकों पर पड़ेगा और यह ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की भावना को कमजोर कर देगा। ऑफसेट प्रिंटर्स एसोसिएशन समेत विभिन्न राज्य स्तरीय संगठनों ने सरकार से अपील की है कि कागज पर जीएसटी को तत्काल घटाया जाए ताकि शिक्षा सुलभ और किफायती रह सके। संगठनों का कहना है कि इस दर वृद्धि के कारण नोटबुक, किताबें, कॉपी और अन्य शैक्षिक सामग्री महंगी हो जाएगी, जिससे देशभर के करोड़ों विद्यार्थियों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसी मुद्दे पर दिल्ली स्टेट कॉपी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजकुमार सचदेवा ने भी सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार ने हाल ही में नोटबुक और अभ्यास पुस्तिकाओं (HSN 4820) को 0% जीएसटी स्लैब में शामिल करके सराहनीय कदम उठाया था। लेकिन वास्तविक समस्या यह है कि नोटबुक निर्माण के लिए प्रयुक्त कागज (HSN 4802) अभी भी 18% जीएसटी पर बेचा जा रहा है। इस वजह से नोटबुक निर्माता 18% जीएसटी देकर कागज खरीदने को मजबूर हैं, जबकि तैयार नोटबुक उन्हें 0% पर बेचनी पड़ रही है।

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