यूनिसेफ की चिंता यह नहीं है कि किस पर कितना व्यय हो रहा है चिंता का यह कारण भी नहीं है कि वाहन आदि पर खर्च बढ़ रहा है। चिंता का कारण तो यह है कि जंक-फूड के साइड-इफेक्ट सामने आने लगे हैं। आज अधिक कैलोरी वाले जंक-फूड पेट भरने का प्रमुख साधन बन गया है। साइड इफेक्ट देखिये कि बच्चों से लेकर बड़ों तक देश में मोटापा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसी तरह से मोटापा के कारण होने वाली बीमारियों के साथ ही आज की युवा पीढ़ी हृदय रोग की शिकार होती जा रही है तो दुुनिया के देशों में जहां डायबिटिज यानी मधुमेह की गिरफ्त को कम करने में जुटे हैं वहीं हमारे देश में मधुमेह की गिरफ्त बढ़ती ही जा रही है। मधुमेह से ग्रसित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही अन्य बीमारियों की पकड़ अधिक होती जा रही है। जंक फूड के चलते इम्यूनिटी प्रभावित हो रही है। अधिक कैलोरी के कारण शरीर थुल थुल होता जा रहा है। हांलाकि मोटापा की समस्या से समूची दुनिया जूझ रही है और इसकी गंभीरता से दो चार हो रहे हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार डिब्बाबंद खाने के चलते 2030 तक देश में 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापा की चपेट में आने की संभावना व्यक्त की जा रही है। बच्चे हो या बड़े सबकी पंसद बर्गर, पिज्जा, चिप्स, कुरकुरे, मैगी, बिस्कुट और इसी तरह से डिब्बाबंद खाद्य सामग्री के साथ ही ज्यूस और सॉफ्ट ड्रिंक पसंद बनते जा रहे हैं। इसका एक तो बड़ा कारण ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में समाज रुप से बढ़ती मार्केटिंग सुविधा, चंद मिनट से लेकर कुछ मिनटों में ही सामग्री की उपलब्धता, फिर स्वाद और आक्रामक विज्ञापनों के मोहजाल के कारण पैक्ड खाद्य सामग्री के प्रति तेजी से रुझान बढ़ा है। फिर आकर्षक नाम, आकर्षक आउटलेट, वेल अरेंज्ड डिलिवरी सिस्टम व गिग वर्कर्स की टीम द्वारा आर्डर के साथ ही चंद मिनटों में उपलब्धता और इसके साथ ही इंस्टेट खाने के आदत के कारण यह सब-कुछ हो रहा है।
चिंता का कारण है कि खाना जो पोष्टिकता और समयानुकूल होता था वह अब कहीं खो गया है। अब स्वाद और इंस्टेट खाने का मोह होने लगा है। एक अन्य कारण शहरों में अध्ययन के लिए जाने, पीजी और लाइब्रेरी की कल्चर ने युवाओं का जंक फूड की गिरफ्त में अधिक ले लिया है। कौन खाना बनाएं के चक्कर में एक फोन पर सहज उपलब्धता को देखते हुए भी जंक फूड को बढ़ावा मिला है। फिर यह शहरों से गांवों तक पहुंच गई है और गांवों में भी जंक फूड आम होता जा रहा है। यूनिसेफ ही नहीं समूची दुनिया की चिंता का कारण यह है कि खान-पान और रहन-सहन की बदलती प्रवृति स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है। आज समूची दुनिया मोटापा की समस्या को लेकर गंभीर है तो हृदय रोग की गिरफ्त में कम आयु के भी आने लगे हैं। अब तो साइलेंट अटेक का दौर और चल गया है और संभलने तक का मौका नहीं मिलता है। ऐसे में पंरपरागत खान-पान की और लौटना ही होगा। पिछले दिनों ही अधिक कैलोरी और मोटापा को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं लोगों से अधिक तेलीय खाद्य पदार्थ के उपयोग को कम करने के लिए देशवासियों से आग्रह कर चुके हैं। राजस्थान की सरकार ने एक बड़ा निर्णय करते हुए सरकारी बैठकों में चना-मूंगफली का उपयोग शुरु कर दिया है। इससे यह तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित केन्द्र व राजस्थान सहित राज्यों की सरकारें गंभीर होने लगी है। यह विश्वव्यापी समस्या है ऐसे में लोगों की आदत में बदलाव के समग्र प्रयास करने ही होंगे। यह मालूम होने के बावजूद भी लोगों द्वारा जंकफूड का उपयोग बढ़ रहा है इस आदत को बदलना ही होगा। इसके लिए समग्र प्रयास करने ही होंगे।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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