संयुक्त राष्ट्र संघ को आज 80 साल होने जा रहे हैं लेकिन इसके खाते में सफलताओं से ज्यादा विफलताएं ही हैं। दुनिया के कई देशों के बीच अनेक मुद्दे हैं जिन्हें लेकर उनके बीच युद्ध भी हो चुके हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र कुछ नहीं कर पाया। अमेरिका,रूस और इजरायल जैसे देशों के साथ कई देश अब इसकी कोई बात नहीं मानते।
स्वेज नहर संकट (1956): यूएन सैन्य समाधान देने में असफल रहा; अमेरिका और सोवियत संघ के दबाव से ही संकट सुलझा।
कश्मीर विवाद: 1948 से प्रस्तावों के बावजूद भारत-पाकिस्तान के बीच यह विवाद यूएनओ कभी सुलझा नहीं पाया। भारत ने धारा 370 ख़त्म पीओके को पुनः भारत में विलय करने का संकल्प दोहराया है।
ईरान-इजरायल संघर्ष: अमेरिका के वीटो के कारण यूएन इजरायल की कार्रवाइयों पर रोक नहीं लगा सका।
फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष: दो-राज्य समाधान लागू नहीं हो सका, और इजरायल ने यूएन प्रस्तावों की जमकरअनदेखी की और अंततः गाजा पट्टी को लगभग खत्म ही कर दिया।
सीरिया गृहयुद्ध: रूस और अमेरिका के मतभेदों ने यूएन को बौना साबित कर दिया। इसी तरह उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर यूएन प्रतिबंध प्रभावी नहीं रहे तो पश्चिमी सहारा पर भी जनमत संग्रह कराने में यूएन विफल रहा,साइप्रस विवाद भी दशकों पुराना यह विवाद अनसुलझा है। सबसे बढ़कर पिछले तीन सालों से यूक्रेन-रूस संघर्ष जारी है और हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं पर यूएन बेबस, लाचार बना हुआ है। इन सब वैश्विक घटनाओं को देखते हुए अब यूएन की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं क्योंकि शक्तिशाली देश इसके फैसलों की अवहेलना करते रहे हैं और लगातार कर रहे हैं। इजरायल ने 1967 के युद्ध के बाद कब्जे वाली भूमि से पीछे हटने के यूएन प्रस्तावों को नजरअंदाज किया। अमेरिका ने इजरायल के पक्ष में वीटो का दुरुपयोग किया, जबकि रूस ने यूक्रेन संकट में खुद को बचाया।
भारत की स्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आठ बार अस्थायी सदस्य रहने के बावजूद भारत को स्थायी सदस्यता नहीं मिली। जी-4 देशों (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) के साथ मिलकर भारत सुधारों की मांग कर रहा है, लेकिन पी-5 के विरोध ने प्रगति रोकी। निराशा में भारत ब्रिक्स और क्वाड जैसे वैकल्पिक मंचों की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में भारत ने अफ्रीकी प्रतिनिधित्व की वकालत की, लेकिन अपनी सदस्यता की अनदेखी से असंतोष बढ़ा है। इसी के मद्देनजर गत 26 सितंबर को महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने सुरक्षा परिषद में सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया और साफ कहा कि “ अब 1945 का दौर नहीं रहा।" 2024 के 'समिट ऑफ द फ्यूचर' में भी सुधारों पर चर्चा हुई, लेकिन पी-5 के बीच तनाव ने रोड़े अटका दिए। कहने को कहा जा सकता है कि यूएन ने मानवीय सहायता, शरणार्थी संरक्षण और जलवायु पर कुछ सफलताएं हासिल की हैं, लेकिन इसकी विफलताएं भारी हैं। वीटो पावर, पी-5 का प्रभुत्व और उभरते देशों की अनदेखी ने इसे पक्षपाती बना दिया है। वैकल्पिक मंचों जैसे ब्रिक्स और जी20 का उदय यूएन की प्रासंगिकता को चुनौती दे रहा है। सुधारों के बिना यूएन लीग ऑफ नेशंस की तरह अप्रासंगिक हो सकता है। आवश्यक सुधारों के लिए दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं:
वीटो पावर पर अंकुश: सुरक्षा परिषद के पाँच देशों के वीटो के दुरुपयोग को सीमित करना।
स्थायी सदस्यता का विस्तार: भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान और अफ्रीकी देशों को शामिल करना अब अपरिहार्य हो चुका है बदलते वैश्विक परिदृश्य में इनकी भूमिका को कम नहीं आंका जा सकता। गत 80 वर्षों में यूएन ने विश्व शांति के लिए कुछ प्रयास किए, लेकिन रवांडा, स्रेब्रेनिका, इराक, सीरिया, यूक्रेन और गाजा जैसे मामलों में इसकी विफलताएं इसकी विश्वसनीयता पर बट्टा लगाती हैं।यदि यूएन 2025 की दुनिया के अनुरूप खुद को नहीं ढालता, तो यह केवल भाषणों का क्लब बनकर रह जाएगा। सुधार ही इसका भविष्य तय करेंगे—वरना अप्रासंगिक बन कर रह जाना ही इसकी नियति होगी।
हरीश शिवनानी
(स्वतंत्र पत्रकारिता-लेखन)
ईमेल : shivnaniharish@gmail.com
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