- लगातार 9 घंटे चले विशाल भंडारे में 2 क्विंटल दुध, 1 क्विंटल बेसन की नुक्ती और 10 क्विंटल आटे से पूड़ी बनाई
लोग भोर से ही कतार में लग कर मां के नौवें स्वरूप का दर्शन-पूजन कर रहे थे। यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी थी। पूरे परिसर में मेला जैसा माहौल था। हवन यज्ञ में आस्था की आहूति से पूरा वातावरण सुगंध व मां शेरावाली के जयकारे से गुंजायमान था। यहां भक्त बड़ी संख्या में हवन भी कर रहे थे और आस्था के अनुरूप लोग कन्याओं को भोज करा रहे थे। करीब 150 साल प्राचीन मरीह माता के व्यवस्थापक रोहित मेवाड़ा ने बताया कि हर साल शरदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर नौ देवियों की पूजा अर्चना की जाती है। इस साल भी यहां पर महाष्टमी पर महानिशा महाआरती और विशेष अनुष्ठान का आयोजन हुआ। घंटे-घड़ियालों की ध्वनि और माता के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठा। इसके अलावा यहां पर बुधवार की सुबह हवन-यज्ञ का आयोजन पंडित उमेश दुबे, गोविन्द मेवाड़ा, जितेन्द्र तिवारी, मनोज दीक्षित मामा, रितिश अग्रवाल, सुनील चौकसे, रामेश्वर सोनी सहित अनेक लोगों की मौजूदगी में किया गया था।
सुबह सात बजे से हवन की क्रियाओं के पश्चात पूर्णाहुजि और आरती का आयोजन किया गया था। जिला संस्कार मंच के मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि मां सिद्धिदात्री नवदुर्गाओं में अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं को शास्त्रीय अनुष्ठानों के अनुसार पूजा करते हुए, भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन सिद्धिदात्री मां पूजा में संलग्न होते हैं। उनकी पूजा पूरी करने के बाद भक्तों और साधकों की सभी प्रकार की लौकिक, पारलौकिक मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सिद्धिदात्री मां के भक्त में कोई ऐसी इच्छा नहीं बची होती है, जिसे वह पूरा करना चाहता हो। ऐसा माना जाता है कि मां भगवती का स्मरण, ध्यान, आराधना हमें इस संसार की नश्वरता का बोध कराती है, जो हमें वास्तविक परम शांतिदायक अमृतपद की ओर ले जाने वाली है। मान्यता है कि इनकी पूजा करने से भक्त को सभी सिद्धियां, अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि और नव निधियों की प्राप्ति होती है।

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