गांव की बुजुर्ग चानुली देवी, कहती हैं “प्रसव पीड़ा के समय, एक महिला को जंगलों के रास्ते कंधों पर उठाकर ले जाना क्या आप उस दर्द की कल्पना भी कर सकते हैं?” उनकी आंखों में उस दृश्य की तस्वीर उभरती है जो उन्होंने बार-बार देखा है। वहीं 55 वर्षीय देवकी देवी 12 साल पुरानी याद बताते हुए आज भी कांप जाती हैं। वह बताती हैं कि एक दिन गांव की एक महिला जंगल में लकड़ी काट रही थी। अचानक उसका पैर फिसला और वह खाई में गिर गई। उसके सिर में गंभीर चोट लगी। उसे बैजनाथ जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां पहुँचने से पहले उसकी मौत हो गई। अगर गांव में ही उसे प्राथमिक चिकित्सा मिल जाती, तो शायद उसकी जान बच सकती थी।” ग्राम प्रधान हेमा देवी भी गांव में कमजोर स्वास्थ्य ढांचा से बखूबी वाकिफ हैं। वह कहती हैं, “गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने से लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विशेषकर सर्दियों के दिनों जब बच्चे अधिक बीमार पड़ते हैं तो ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की कमी बहुत अधिक महसूस होती है क्योंकी मौसमी बीमारी का यहां आसानी से इलाज मुमकिन हो सकता है। लेकिन नहीं होने से परेशानी अधिक बढ़ जाती है।" वह कहती हैं कि इस संबंध में वह लगातार प्रयास कर रही हैं कि गांव के अंदर ही लोगों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो सके।
गनीगांव में स्वास्थ्य सुविधा किसी एक व्यक्ति का मुद्दा नहीं है। यह गांव की हर किशोरी, मां और हर परिवार की आवश्यकता है। यहां के पुरुष खेतों और पशुपालन में जुटे रहते हैं, जबकि महिलाएं घर से बाहर के काम और बच्चों की देखभाल करती हैं। बीमारी के समय दोनों अपने हिस्से का काम छोड़कर एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। लेकिन सच यही है कि उनके पास इलाज तक पहुंचने के लिए केवल दो रास्ते हैं एक-दूसरे की मदद और पहाड़ों पर लंबे सफर तय करना। लेकिन यह कठिनाई यहीं तक सीमित नहीं होती है। सबसे अधिक मुश्किल बारिश और सर्दियों के दिनों में होती है। इस दौरान यही पहाड़ी रास्ते फिसलन भरे हो जाते हैं। वहीं सर्दियों के दिनों में जब बर्फ पड़ती है, तो मोबाइल नेटवर्क के साथ-साथ उम्मीद भी जमने लगती है। गनीगांव के लोगों को अस्पताल की सुविधा चाहिए। यह किसी सुविधा की मांग नहीं, बल्कि उस समाज के सम्मान की इच्छा है जो हर दिन अपने लोगों का वजन अपने कंधों पर उठाता है। यह वही सम्मान है जो किसी नवजात के पहले रोने से लेकर किसी के घाव के भरने तक में छिपा होता है। यहां के लोगों को उम्मीद है कि एक दिन उनके गांव में भी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध होगी, तब कोई औरत सड़क तक कंधों पर उठाकर नहीं ले जाई जाएगी। तब बीमारी पहाड़ों से युद्ध नहीं होगी, बल्कि इंसानों के बीच एक छोटे से पुल की तरह होगी जो उनके लिए राहत और जीवन को जोड़ती होगी।
किरण रावल
गनीगांव, गरुड़
बागेश्वर, उत्तराखंड
गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



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