सवाल : आप ने कहा, ‘समाज की अव्यवस्था के लिए आईपीएस जिम्मेदार हैं।’ यह बहुत बड़ा और विवादस्पद बयान है। इसके पीछे आपकी मूल भावना क्या है?
विश्वभूषण मिश्र : देखिए, व्यवस्था तभी बिगड़ती है जब उसका संचालन करने वाले लोग जमीनी वास्तविकताओं से कट जाते हैं। आज समाज में जो अव्यवस्था दिखाई दे रही है, गुस्सा, विरोध, हिंसा, तनाव, उसकी एक बड़ी वजह पुलिसिंग की कठोरता और संवेदनहीनता है। आईपीएस अधिकारी कानून को लागू करने के नाम पर हर छोटी बात को अपराध की श्रेणी में डाल देते हैं। यदि कॉलेज के दो बच्चे लड़ लिए, या किसी ने गुस्से में कोई शब्द बोल दिया, तो यह गलती है, अपराध नहीं। लेकिन आज का पुलिस तंत्र गलती और अपराध में फर्क करना भूल गया है। इसी संवेदनहीनता के कारण समाज में अव्यवस्था पैदा होती है। डर और दबाव से समाज नहीं चलता, संतुलन और समझ से चलता है।
सवाल : क्या यह बदलाव सिर्फ पुलिस तंत्र की समस्या है या समय के साथ सामाजिक संरचना भी बदली है?
मिश्र : बदलाव समाज में भी आया है, लेकिन पुलिस में ज्यादा आया है। पहले पुलिस समाज का ‘हिस्सा’ थी, लोगों के बीच, लोगों के साथ। आज पुलिस एक ‘एजेंसी’ बन गई है, जो समाज के ऊपर खड़ी होकर कानून लागू करती है। समस्या यह है कि अधिकारी मानते हैं कि व्यवस्था सख्ती से चलती है; पर सख्ती अक्सर अव्यवस्था पैदा करती है, व्यवस्था नहीं। समाज जितना वैविध्यपूर्ण है, पुलिसिंग उतनी ही संवेदनशील होनी चाहिए। लेकिन आज वही संवेदनशीलता गायब है।
सवाल : आप अक्सर ‘छोटी गलती पर एफआईआर’ की बात करते हैं। क्या आपको लगता है कि आईपीएस का अत्यधिक दखल कॉलेज और युवा जीवन को नकारात्मक दिशा में धकेल रहा है?
मिश्र : बहुत स्पष्ट रूप से, हाँ। आज का युवक भावुक है, तेज है, डिजिटल है, लेकिन नासमझ भी है। गलती करना उम्र का हिस्सा है। लेकिन यह कैसी पुलिसिंग है, जो किशोर भावनाओं को भी अपराध मान लेती है? एक लड़के ने बाइक तेज चला दी, एफआईआर। दो साथियों में बहस हो गई, एफआईआर। किसी छोटे मज़ाक पर विवाद हुआ, एफआईआर। क्या एफआईआर ही पुलिस का पहला हथियार है? क्या पुलिस चेतावनी देना भूल गई है? क्या दंड का पहला स्तर सबसे कठोर ही होना चाहिए? ये सवाल आज की आईपीएस मानसिकता पर उठते हैं। जो अधिकारी कल तक छात्र थे, वे आज छात्रों को अपराधी बना रहे हैं। यही सबसे बड़ी विडंबना है।
सवाल : आपने कहा कि पहले के कॉन्स्टेबल भी गलतियां समझते थे। क्या आप अपने अनुभव साझा करना चाहेंगे?
मिश्र (मुस्कुराते हुए) : हम सब ने जवानी में गलतियां की हैं। आज किसी बच्चे पर एफआईआर लिखने वाले कई आईपीएस भी अपनी युवावस्था में गलती करते थे, यह बात वे भूल जाते हैं। जब हम कॉलेज में थे, शरारतें भी होती थीं, झगड़े भी। कभी-कभी कॉन्स्टेबल पकड़ लेता था। हमारे जमाने के पुलिसकर्मी कड़क थे, लेकिन दिल के नरम भी थे। डांट पड़ती थी, चेतावनी मिलती थी, कभी-कभी थप्पड़ भी। लेकिन गलती वहीं खत्म। कोई रिकॉर्ड नहीं, कोई मुकदमा नहीं। उसी सुधार की वजह से हम आगे बढ़ पाए। आज वही गलती किसी छात्र से हो जाए तो आईपीएस के दफ्तर से आदेश आता है, एफआईआर दर्ज करो।” यानी कोर्ट-कचहरी के चक्कर शुरू करा दिए, और बच्चे का भविष्य खत्म।” क्या यह सही है? अगर मैं उस समय एफआईआर के चक्कर में पड़ जाता, तो क्या मैं आज इस पद पर होता? बिल्कुल नहीं।
सवाल : क्या यह कहना सही होगा कि वर्तमान आईपीएस वर्ग ‘जमीन से कट’ गया है?
मिश्र : यह पूरी तरह सच है। पुलिसिंग कानून नहीं, समाज से संचालित होती है। लेकिन आज का आईपीएस समाज को कागज़ पर पढ़ता है, ज़मीन पर नहीं। कॉन्स्टेबल गलती और अपराध पहचानता था, आईपीएस सिर्फ अपराध ढूंढता है। उनके प्रशिक्षण का फोकस ‘कानून लागू करना’ है, ‘समाज को समझना’ नहीं। जब आदेश और वर्दी दोनों संवेदना पर भारी पड़ जाएं, तब पुलिस मानव नहीं, मशीन बन जाती है। यही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
सवाल : क्या यह समस्या बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ‘जीरो टॉलरेंस’ मॉडल की देन है?
मिश्र : कहीं न कहीं हां। आईपीएस अधिकारी यह दिखाना चाहते हैं कि वे कठोर हैं, तेज हैं, कानून लागू करते हैं। हर अधिकारी अपने कार्यकाल में ‘जीरो टॉलरेंस’ का ठप्पा चाहता है। लेकिन ‘जीरो टॉलरेंस’ का दूसरा मतलब ‘जीरो ह्यूमैनिटी’ नहीं होता। गलती और अपराध में अंतर समझना ही पुलिसिंग है। एक बच्चा अगर बाइक से किसी का पैर छू जाए तो यह दुर्घटना है, अपराध नहीं। दो छात्रों में बहस हो जाए तो यह स्वाभाविक है, अपराध नहीं। सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट डाल दे, यह भी हमेशा अपराध नहीं होता। लेकिन आज पुलिस हर चीज़ में अपराध ढूंढ लेती है। यहीं से अव्यवस्था की जड़ें निकलती हैं।
सवाल : आपके नजर में सबसे बड़ा नुकसान किसे हो रहा है?
मिश्र : एक ही शब्द में जवाब दूं तो, युवाओं को। युवाओं के मन में डर भरना आसान है, लेकिन डर से कोई समाज नहीं चलता। एफआईआर का एक दाग बच्चे की पूरी जिंदगी रोक देता है, सरकारी नौकरी, सेना, बैंकिंग, विदेश पढ़ाई, वीजा, प्राइवेट सेक्टर, करियर ग्रोथ सब कुछ प्रभावित होता है। एक 18 साल के लड़के की जिंदगी एक 45 सेकंड की घटना के कारण 45 साल की पीड़ा में बदल जाती है। क्या यह सही है? क्या यही हमारा समाज चाहता है? क्या यही प्रशासन की जिम्मेदारी है? मैं तो कहूँगा, अपराध रोको, लेकिन युवाओं को अपराधी मत बनाओ।
सवाल : समाधान क्या है? आप किस बदलाव की मांग करते हैं?
मिश्र : पिछले कुछ वर्षों में देशभर में कई घटनाएं सामने आईं जहां छोटी कहासुनी, युवा वर्ग के बीच मामूली झगड़े, या कॉलेजों के सामान्य तनाव को भी गंभीर आईपीसी धाराओं के तहत दर्ज कर लिया गया। सोशल मीडिया पोस्ट, नोकझोंक, कभी-कभी तो मज़ाक या आवेश में किए गए एक झटके को कानून की कठोरता के साथ जोड़ दिया जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस इस कठोरता तक पहुंची कैसे? समाधान बहुत सरल है, बस नीयत ठीक होनी चाहिए। मेरे सुझाव, 1. पहली गलती पर एफआईआर नहीं, चेतावनी देना अनिवार्य हो। कानून सुधार का पहला मौका देता है, भय का नहीं। 2. हर जिले में ‘यूथ काउंसलिंग विंग’ होना चाहिए। जहां पुलिस, अभिभावक और शिक्षकों की संयुक्त भूमिका हो। 3. कॉलेज कैंपस में आईपीएस का दखल कम, सामाजिक संवाद अधिक हो। 4. गलतियों को पढ़ाई, मनोविज्ञान और सामाजिक आचरण के संदर्भ में समझा जाए। 5. पुलिस प्रशिक्षण में ‘समाजशास्त्र’ और ‘युवा व्यवहार’ जोड़ना चाहिए। 6. आईपीएस अधिकारियों का ग्राउंड लेवल पर कम से कम सप्ताह में एक दिन उपस्थित होना अनिवार्य हो। 7. पुलिस की भूमिका डर पैदा करना नहीं, भरोसा बनाना होनी चाहिए। कानून तभी प्रभावी होता है, जब वह इंसानियत की भाषा बोलता है।
सवाल : क्या यह माना जाए कि पुलिस व्यवस्था में संवाद और मानवीय रिश्ते खत्म होते जा रहे हैं?
मिश्र : हाँ, और यह बहुत खतरनाक संकेत है। कानून के पीछे इंसान छिप जाए तो व्यवस्था खोखली हो जाती है। पहले पुलिस पड़ोस का हिस्सा थी। उस समय पुलिस गलती को गलती मानती थी, अपराध नहीं। आज गलती को अपराध मानकर दंड दिया जाता है, जबकि सुधार की गुंजाइश ही खत्म कर दी गई है। लोग जानते थे कि यह हमारा ही आदमी है, जो हमें बचाने के लिए है। आज का पुलिसकर्मी दूर खड़ा दिखता है, जैसे कोई अलग से थोप दी गई ताकत हो। जितना संवाद कम होगा, विवाद उतने बढ़ेंगे। जितना भरोसा घटेगा, डर उतना बढ़ेगा। और डर से कोई राष्ट्र सुरक्षित नहीं बनता, न समाज, न भविष्य।
सवाल : आपके इस बयान पर बहस और आलोचना दोनों होंगी। क्या आप इसके लिए तैयार थे?
मिश्र : मेरी बात किसी संस्था के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक सोच के खिलाफ है। सख्ती का मतलब संवेदना की हत्या नहीं होता। अगर मेरी बात से कोई अधिकारी आहत होता है तो समझ लीजिए कि कही न कही उसके भीतर संवेदनशीलता की कमी है। मैं यह बात समाज, प्रशासन और युवाओं के हित में बोल रहा हूँ। यदि पुलिस गलतियां सुधारने का मौका नहीं देगी, तो समाज अपराधियों से भर जाएगा। हमारा लक्ष्य अपराध रोकना होना चाहिए, अपराधियों की संख्या बढ़ाना नहीं।
सवाल : अंत में, युवाओं और पुलिस दोनों के लिए आपका संदेश?
मिश्र : युवाओं से : गलती जीवन का हिस्सा है। लेकिन गलती दोहराना मूर्खता है। अपने भविष्य को अपने हाथों से न बिगाड़ें। पुलिस से : कानून लागू कीजिए, लेकिन इंसानियत के साथ। हर गलती अपराध नहीं होती। किसी बच्चे को सुधार का अवसर देना उसके भविष्य को बचाना है, और यही पुलिसिंग का मूल उद्देश्य है। समाज से : अपने बच्चों पर भरोसा रखिए। एक गलती उन्हें अपराधी नहीं बनाती, लेकिन समाज और पुलिस की कठोरता उन्हें अपराधी बना सकती है। संवेदनशील पुलिसिंग ही एक संवेदनशील समाज की नींव है। और संवेदनशील समाज ही मजबूत राष्ट्र बनाता है।
इसकी बड़ी वजह 1 - विकासोन्मुख समाज में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का दुरुपयोग, प्रशासन में सख्ती जरूरी है, पर सख्ती और संवेदनहीनता में फर्क है। 2 -टॉप-डाउन प्रेशर सिस्टम : आईपीएस अधिकारियों पर आधुनिक दौर में अपेक्षाएँ और दबाव दोनों बढ़े हैं, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग, राजनीतिक दबाव, त्वरित कार्रवाई की मांग। 3 - कानून-व्यवस्था बनाम करियर : पुलिस छोटे मामलों में भी अपराध दर्ज कर अपना “प्रोफेशनलिज़्म” दिखाती है, लेकिन इससे युवाओं की भविष्य की संभावनाएँ खत्म हो जाती हैं। 4. सिस्टम में बढ़ती डीजीटल निगरानी : हर कार्रवाई रिकॉर्ड होती है, जिससे अधिकारी “रिस्क लेने” से बचते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है. सुधार का अवसर खत्म करना समाज को अपराधी बनाना है. अगर एक बच्चा या युवा गलती करता है, तो उसे सुधारने का अवसर देना समाज की जिम्मेदारी है। पर आज पुलिस सीधे उसे अपराधी की तरह ट्रीट करती है। इससे वह बच्चा संघर्षपूर्ण और टूटे हुए मन के साथ आगे बढ़ता है। वह अपराधी बनता नहीं, बल्कि बनाया जाता है। न्यायशास्त्र भी मानता है पहली गलती सुधार का अवसर है, दूसरी गलती चेतावनी की, तीसरी गलती अपराध की श्रेणी में आ सकती है, लेकिन पुलिस का वर्तमान दृष्टिकोण इस क्रम को उलट देता है।
बदलते समय की कानून व्यवस्था और पुलिस का दृष्टिकोण : समाज बदल रहा है। पहले गाँव-मोहल्ले में सामाजिक नियंत्रण था। बुजुर्ग समझा देते थे, शिक्षक रोक देते थे, परिवार मार्गदर्शन कर देता था। पुलिस अंतिम विकल्प होती थी। आज उलट स्थिति है, माता-पिता शिकायत लेकर पुलिस के पास जाते हैं, स्कूल-कॉलेज प्रशासन सीधे एफआईआर दर्ज करा देते हैं, पुलिस भी तत्काल कार्रवाई करके “सख्त कार्यवाही” का प्रदर्शन करती है, सोशल मीडिया इसे और भड़काता है। सवाल यह है, क्या इस कठोरता से समाज बेहतर हो रहा है या और उलझ रहा है? यह कथन कटु जरूर लगता है, लेकिन वास्तविकता से दूर भी नहीं है। आज अधिकांश आईपीएस अधिकारी, अत्यधिक तकनीकी, प्रोफेशन-ड्रिवन, आदेश-पद्धति आधारित, और कभी-कभी जमीनी हकीकत से दूर कार्यशैली अपनाते हैं। इसके उलट, पुराना पुलिस ढांचा स्थानीय समाज और मानवीय चरित्र को समझता था। छोटी गलतियों को अपराध बनाना, कानूनी और सामाजिक दुष्परिणाम. 1. पहचान संकट पैदा होता है. युवा अपने आपको अपराधी सिद्ध करने से पहले ही अपराधी समझने लगता है। 2. समाज भरोसा खो देता है. जिस पुलिस से न्याय और सुरक्षा की उम्मीद थी, वही भय का कारण बन जाती है। 3. कानून-व्यवस्था का बोझ बढ़ता है : जितनी छोटी एफआईआर दर्ज की जाएगी, उतनी ही बड़ी फाइलों की संख्या और न्याय व्यवस्था की देरी। 4. बच्चों पर स्थायी दाग : कई सरकारी नौकरियों, इमिग्रेशन, स्कॉलरशिप में एफआईआर का रिकॉर्ड जीवन भर असर डालता है। 5. मानसिक दबाव बढ़ता है. कई छात्र और युवा अवसाद, भय या अपराध-बोध की स्थिति में चले जाते हैं।

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