सबसे बड़ा संकेत यह है कि बिहार अब “नीतीश मॉडल” नहीं, बल्कि “यूपी मॉडल” के रास्ते पर धकेला जा रहा है. मुख्यमंत्री तो नीतीश हैं, पर गृह मंत्रालय किसी और के पास है—और उसके पीछे बुलडोजर की छाया स्पष्ट दिखती है.जिस तरह उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कानून का प्रतीक बन गया, उसी की छाया बिहार पर डालने की चेतावनी दी जा रही है.सवाल यह है कि क्या यह बुलडोजर अपराधियों पर चलेगा, या फिर वही पुराना पैटर्न दोहराया जाएगा—जहां दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक ही सबसे आसान निशाना बनते हैं? दुलारचंद यादव की हत्या और उपमुख्यमंत्री का “छाती पर बुलडोजर” वाला बयान यह संकेत देता है कि राजनीति फिर से भय और दमन की भाषा अपनाने की ओर लौट रही है। चुनावी मंचों पर किसानों से लेकर बेरोजगारों तक को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए—उद्योग खोलने से लेकर बाढ़ समाधान तक—अब जनता हिसाब मांग रही है. मोदी के ‘गंगा’ वाले बयान पर दीपंकर का तंज भी राजनीतिक संदेश से भरा है। उन्होंने कहा—यह गंगा आस्था की नहीं, सत्ता की गंगा है, जिसे बंगाल की राजनीति में मोड़ने की तैयारी है. इसके समानांतर, श्रम कानूनों में बड़े बदलाव मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला माने जा रहे हैं. आठ घंटे की जगह 12 घंटे काम, हड़ताल लगभग असंभव, नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं—और इसे ‘सुधार’ के नाम पर परोसा जा रहा है.
हिडमा की हत्या का मुद्दा भी सभा में राजनीतिक रंग से भरा.दीपंकर के अनुसार यह केवल माओवादी नेता की मौत नहीं, बल्कि आदिवासी इलाकों में कॉर्पोरेट विस्तार—खासकर अडानी समूह—को रास्ता साफ करने की प्रक्रिया का हिस्सा है.उनकी बूढ़ी मां का इस्तेमाल कर ‘सरेंडर’ का दबाव बनाने का आरोप और फिर हत्या—ये बातें बस्तर की वेदना और अविश्वास को और गहरा करती हैं. साथ ही, गैर-भाजपा राज्यों के साथ केंद्र का टकराव, तमिलनाडु में बिलों को रोके रखने की प्रवृत्ति, और सुप्रीम कोर्ट के बदलते रुख को दीपंकर लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला बताते हैं। उनका स्वर साफ था—जब अंग्रेजों को भगाया जा सकता है, तो आज की किसी भी तरह की तानाशाही का मुकाबला भी संभव है. चुनाव में महिलाओं के इस्तेमाल का आरोप, दलित-पिछड़ों पर बढ़ते अत्याचारों की चेतावनी, और बुलडोजर-राज के उभार को रोकने का आह्वान इस सभा का मूल संदेश बनकर सामने आया। कामरेड विशेश्वर प्रसाद यादव को दी गई श्रद्धांजलि सिर्फ भावनात्मक क्षण नहीं थी—वह आने वाले संघर्षों की प्रस्तावना भी थी. बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है.अब सवाल यह नहीं कि सरकार किसकी है—सवाल यह है कि शासन कैसा होगा: कानून का, या बुलडोजर का? और इस सवाल का उत्तर आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगी.

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