वैश्विक राजनीति के उथल-पुथल भरे दौर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उभरते हुए नए वैश्विक समीकरण की गूंज बनकर सामने आई है। जब यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध, चीन की आक्रामकता और मध्य-पूर्व की अनिश्चितता ने विश्व व्यवस्था को अस्थिर कर रखा है, ऐसे समय में भारत और रूस ने अपनी दशकों पुरानी दोस्ती में नई ऊर्जा भरते हुए एक महत्त्वपूर्ण संदेश दिया है, रणनीतिक स्वायत्तता और आपसी भरोसा वैश्विक राजनीति का नया आधार बन रहा है। दिल्ली में हुई 23वीं वार्षिक शिखर बैठक में 16 समझौते और 4 प्रमुख घोषणाएं यह साबित करती हैं कि यह रिश्ता सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि बहुआयामी विकास, तकनीकी सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा उत्पादन, कृषि, अंतरिक्ष और मानव संसाधन के साझा हितों पर आधारित है। वर्ष 2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य तय करना, रूसी उद्योगों के लिए भारत से प्रशिक्षित श्रमिक भेजना, भारत को तेल-गैस की निर्बाध आपूर्ति की गारंटी, उर्वरक संयंत्र की स्थापना और आतंकवाद पर पुतिन का दो-टूक समर्थनकृइन सबने भारत को वैश्विक मंच पर नई मजबूती दी है। यह यात्रा दुनिया को बता गई कि बदलते विश्व-व्यवस्था में भारत अब “साइलेंट प्लेयर” नहीं, बल्कि निर्णायक रणनीतिक शक्ति है, अपने हितों के साथ, अपने आत्मविश्वास के साथ मतलब साफ है यह न सिर्फ भारत : रूस की विशेष रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय होगा, बकि 2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार, ऊर्जा-रक्षा सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीति में भारत की निर्णायक मजबूती होगी
जहां तक अमेरिका, यूरोप और चीन की बेचैनी क्यों बढ़ी? का सवाल है तो पश्चिम चाहता है कि भारत रूस पर दबाव बढ़ाए। पर भारत की स्पष्ट नीति है, राष्ट्रीय हित सर्वोपरि। अमेरिकी थिंक टैंक पहले ही कह चुके हैं कि भारत रूस की मदद कर रहा है ऊर्जा बाजार स्थिर रखने में। जबकि पुतिन का खुला आतंकवाद विरोधी समर्थन पाकिस्तान की कूटनीति पर गहरा झटका है। रूस - भारत रक्षा सहयोग का बढ़ना पाकिस्तान - चीन के गठजोड़ को असहज करता है। क्योंकि भारत और रूस दोनों आतंकवाद को साझा खतरा मानते हैं। चीन रूस को अपनी ओर खींचने की कोशिश में है। परन्तु रूस का भारत के साथ खुले रूप से जुड़ना बीजिंग की रणनीति को कमजोर करता है। वैश्विक भू-राजनीति में भी भारत रूस साझेदारी का खासा महत्व है. (1) ऊर्जा भू-राजनीति में भारत की निर्णायक भूमिका : भारत ऊर्जा का स्थिर खरीदार है, रूस स्थिर आपूर्तिकर्ता। दोनों का जुड़ना तेल-बाजार में नई स्थिरता लाता है। (2) एशियाई क्षेत्र में शक्ति संतुलन : चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच रूस-भारत सहयोग हिंद-प्रशांत में नया समीकरण बनाता है। (3) पश्चिमी दबाव में भी भारत की स्वायत्तता : भारत ने दिखाया है कि वह, अमेरिका का मित्र है, रूस का पुराना रणनीतिक साथी, परंतु किसी के प्रभाव में नहीं. यह “मल्टी-वेक्टर“ डिप्लोमेसी की पराकाष्ठा है। भारत-रूस गठजोड़ ग्लोबल साउथ देशों की ऊर्जा, तकनीक और मुद्रा-सहयोग पहल को आगे बढ़ाता है।
हालांकि कुछ चुनौतियाँ भी है, जिन्हें भारत को ध्यान में रखना होगा. रूस पर बढ़ते प्रतिबंध भुगतान व्यवस्था और परिवहन पर असर डाल सकते हैं। भारत को वैकल्पिक वित्तीय तंत्र को मजबूत करना होगा। रूस पर चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। भारत को संतुलन बनाए रखते हुए साझेदारी आगे बढ़ानी होगी। यूक्रेन युद्ध के लंबे खिंचने की संभावना है। इससे रूस की आर्थिक प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं। रूस-भारत व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्ग से आता है। भारत को, पोर्ट, कोल्ड-चेन, लॉजिस्टिक्स को मजबूत करना होगा। कुल मिलाकर राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा ने एक स्पष्ट संदेश दिया, भारत विश्व व्यवस्था का “साइलेंट लेकिन निर्णायक पोल“ बन चुका है। भारत ने दिखाया कि वह, अपने हितों पर अडिग है. ऊर्जा व रक्षा मुद्दों पर समझौता नहीं करेगा. रूस जैसे पुराने साझेदार को छोड़कर पश्चिम की ओर नहीं झुकेगा. और अमेरिका से समान दूरी बनाए रखकर ग्लोबल बैलेंसर की भूमिका निभाएगा. यह परिपक्व और आत्मविश्वासी भारत का रूप है। मतलब साफ है रूस की तकनीक $ भारत का बाज़ार और जनशक्ति = 2030 तक बनने वाली नई आर्थिक-रणनीतिक धुरी, भविष्य में रक्षा उत्पादन, उर्वरक, ऊर्जा, अंतरिक्ष, समुद्री व्यापार, कृषि, डिजिटल भुगतान, इनमें भारत-रूस सहयोग दुनिया के सामने नया मॉडल होगा। भारत रूस की साझेदारी विश्व-राजनीति के उतार-चढ़ाव से ऊपर उठकर आगे बढ़ी है। अब यह संबंध रणनीतिक, आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और भू-राजनीतिक, सभी स्तरों पर एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। 2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य इस नए युग की घोषणा है। ऊर्जा-सुरक्षा, तकनीक, रक्षा आत्मनिर्भरता, कृषि व रोजगार, हर क्षेत्र में भारत को निर्णायक लाभ मिलने वाला है। पाकिस्तान की बेचैनी, चीन की असहजता और पश्चिम की चिंता यह बताने के लिए पर्याप्त है कि भारत का उदय अब विश्व व्यवस्था का केंद्र बन रहा है, और रूस इस यात्रा का एक स्थिर, विश्वसनीय साथी।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




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