सर्वेक्षण से पता चलता है कि किसानों को ‘किसान उत्पादक समूह‘ से जोड़ने पर कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। किसानों के बीच उन्नत तकनीक जैसे की ड्रिप सिंचाई के साथ जीरो-ट्रिल सीड ड्रिल, क्रॉलर ट्रैक गीले खेत के कंबाइन हार्वेस्टर, पैडी राउंड स्ट्रॉ बेलर के साथ कंबाइन हार्वेस्टर का पाया जाना सराहनीय प्रगति है। कई क्षेत्रां में धान और गेहूं के फसल चक्र के अलावा मक्का एवं चना के रूप में फसल विविधता का दृष्टान्त मिला। कुछ गांवों में लाख एवं कपास की खेती भी देखने को मिली। जल संरक्षण के लिए गांवों में पंचायत द्वारा तलैया एवं कृषि विभाग द्वारा बलराम तालाब खुदवाना, किसानों के बीच जीवन रक्षक सिंचाई का माध्यम बन रहा है। गांव में हो रहे बदलाव का स्पष्ट चित्र पाने के लिए अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स जैसे किसानों, प्रोग्रेसिव किसानों, कृषि विज्ञान केन्द्रों के अधिकारियों, आत्मा परियोजना से जुड़े अधिकारियों, पशुपालन अधिकारियों, मछली पालन अधिकारियों, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, मिल मालिकों, गोदाम मालिकों से उनकी राय जानी गई। अन्वेषण का निर्णायक प्रस्तुतीकरण 15 दिसंबर को भारत के क्लाइमेट चेंज विशेषज्ञ और रिलायंस फाउंडेशन, मुंबई के अधिकारियों के सामने किया जाएगा। शोध का अपेक्षित परिणाम आने पर विकसित जलवायु अनुकूल सूचकांक को पूरे भारतवर्ष में कृषि विकास के पैमाने के रूप में किया जा सकेगा। यह शोध कार्य भारत के नीति निर्धारकों, योजनाकारों एवं कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों हेतु मार्गदर्शी होगा।
भोपाल (रजनीश के झा)। किसानों द्वारा पराली जलाने की समस्या के समाधान हेतु मध्यप्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा 15 दिवसीय सर्वेक्षण किया जा रहा है। भारत-इंडिया जोड़ो अभियान अन्तर्गत यह सर्वेक्षण 03 जिलों सतना, पन्ना और सिवनी जिले में सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिया गया है। 07 प्रमुख आयामों पर आधारित अन्वेषण का निर्णायक प्रस्तुतीकरण 15 दिसंबर को भारत के क्लाइमेट चेंज विशेषज्ञों के समक्ष किया जाएगा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिक डॉ. सुधानंद प्रसाद लाल द्वारा महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधार्थी अक्षय सिंह, आदित्य सिंह एवं जैकी वर्मा के साथ मिलकर एक टीम गठित की है जो गांवों में जाकर सर्वेक्षण का कार्य कर रहे हैं। सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य रिलायंस फाउंडेशन द्वारा विकसित जलवायु अनुकूल सूचकांक का शोधन और मानकीकरण करना है। सूचकांक के कुल 07 आयाम हैं जो कि जलवायु परिवर्तन जागरूकता, सामुदायिक तैयारी, सामाजिक सामंजस्य, उत्पादन और कृषि पद्धतियां, जल संसाधन प्रबंधन, उत्पादक नेटवर्क, विपणन और जोखिम प्रबंधन, महिला सशक्तिकरणः विविध आजीविका और खाद्य उपलब्धता, और जैव-भौतिक-वन और बागवानी हैं। जमीनी स्तर के अध्ययनों से पता चला है कि मध्य प्रदेश के कई गांवों में पराली जलाना, आवारा पशु, जंगली जानवर, बिजली और वोल्टेज ट्रिप, एवं सिंचाई के साधन का अभाव, सड़क पर मक्का सुखाना, रासायनिक खाद की किल्लत, फसल का समय पर उचित और समर्थन मूल्य न मिल पाना, किसानों के बीच मुख्य समस्या पाई गई।

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