विचार : अरावली पर्वतमालाः अवैध खनन रोकने में जनसहभागिता भी जरूरी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 24 जनवरी 2026

विचार : अरावली पर्वतमालाः अवैध खनन रोकने में जनसहभागिता भी जरूरी

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सर्वोच्च न्यायालय की अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन को लेकर जो चिंता देखी गई है वह अपने आपमें महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है कि अरावली पर्वतमाला को खोखला करने में अवैध खनन गतिविधियों की प्रमुख भूमिका रही है। यही कारण है कि 21 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की बैंच ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और समस्या के मूल कारण अवैध खनन पर रोक पर जोर दिया है। 21 जनवरी के निर्देशों को स्पष्टता की दृष्टि से दो भागों में समझा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी में जहां अरावली पर्वतमाला क्षेत्र में अवैध खनन पर प्रभावी रोक और इसकी कार्ययोजना के निर्देष दिए हैं वहीं अरावली पर्वतमाला को परिभाषित करने के मुद्दे का अलग अलग देखने पर जोर दिया है। अरावली पर्वतमाला की 100 मीटर के आदेष को दिसंबर के केप्ट इन एवियांस के आदेश को यथावत रखा हैं और विशेषज्ञों की कमेटी बनाने के लिए नाम व सुझाव मांगे है। कमोबेस चार सप्ताह में दुबारा सुनवाई तक कार्ययोजना और विशेषज्ञों के नाम और सुझाव का समय दिया गया है। पर अरावली पर्वतमाला क्षेत्र में अवैध खनन गतिविधियों के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने अधिक गंभीरता जताई है।


अरावली पर्वतमाला को लेकर वैध और अवैध खनन की बहस को अलग रखकर देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि अरावली पर्वतमाला को वैध खनन से अधिक अवैध खनन ने नुकसान पहुंचाया है। यह चिंता केवल पर्यावरणविदों की ही नहीं अपितु समूचे समाज और समूचे देश की इस मायने में है कि अरावली पर्वतमाला एक मोटे अनुमान के अनुसार 2 अरब पुरानी प्रोटेरोजोइक युग में निर्माण हुआ माना जाता है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली एनसीआर और गुजरात तक अरावली पर्वतमाला है। राजस्थान का बड़ा क्षेत्र 20 जिले अरावली पर्वतमाला में आते हैं। अरावली पर्वतमाला की कोख में मेसेनरी स्टोन से लेकर क्रिटिकल और स्ट्रेटेजिक मिनरल्स के अपार भण्डार है। देखा जाए तो अरावली पर्वतमाला को राजस्थान की तुलना में हरियाणा और दिल्ली एनसीआर में अधिक नुकसान पहुंचाया गया है। खैर आरोप प्रत्यारोप का ना तो यह समय है और ना ही इससे कोई निकष निकलने वाला है। पर एक बात साफ है कि अरावली पर्वतमाला को संरक्षित रखना समय की मांग और भविष्य के लिए आज की आवश्यकता है।


अरावली पर्वतमाला देखा जाए तो थार के मरुस्थल के फैलाव को रोकने की प्राकृतिक तारबंदी या दीवार माना जा सकता है। एक तरह से मरुस्थलीय विस्तार पर प्राकृतिक अवरोध है। जल और वायु को संरक्षित करता है तो जैव विविधता को संरक्षित करती है। अरावली पर्वतमाला में जैव विविधता के साथ ही वन्यजीव गलियारे विकसित है। दरअसल अरावली पर्वतमाला केवल प्राकृतिक अवस्था नहीं है बल्कि अन्य सब कारकों के साथ ही इसका सांस्कृतिक महत्व भी है। अरावली श्रृंखला धूलभरी आंधियों से संरक्षित करती है तो जल संरक्षण और नदियों का स्रोत भी है। वन्य जीवों सहित जैव विविधता को अपनी कोख में संरक्षित किये हुए हैं। अब दोहरा संकट सामने हैं। एक और अरावली के संरक्षण की आवष्यकता है तो दूसरी और बेशकीमती खनिजों का खनन भी समय की मांग है। हांलाकि जैसा नवंबर के आदेश के बाद विशेषज्ञों के विष्लेषण सामने आये हैं वह कहानी कुछ और ही कहता है पर यह विवाद या बहस का विषय हो सकता है।


सर्वोच्च न्यायालय की नवीनतम टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अवैध खनन एक प्रमुख कारण रहा है। हांलाकि दिसंबर के केप्ट इन एवियांस आदेश के साथ ही राजस्थान की भजन लाल शर्मा सरकार ने प्रदेष में अरावली क्षेत्र के 20 जिलों में 29 दिसंबर, 25 से 15 जनवरी, 2026 तक अवैध खनन गतिविधियों के खिलाफ अभियान चलाया और इसके सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त हुए। अभियान के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 1445 प्रकरण दर्ज हुए और संबंधित पुलिस थानों में 320 एफआईआर दर्ज कराई गई। इस दौरान 140 व्यक्तियों की गिरफ्तारी भी हुई। 82898 टन से अधिक अवैध भण्डारित खनिज जब्त किया गया। अवैध खनन गतिविधियों में लिप्त 68 एक्सक्वेटर, जेसीबी सहित अन्य उपकरण जब्त किए गए और 1223 वाहन जब्त कर संबंधित पुलिस थानों को सुपुर्द किये गये। अभियान के दौरान जुर्माने के रुप में 9 करोड़ 86 लाख रुपए की वसूली कर राजकोष में जमा किए गए। यह भौतिक उपलब्धि रही है। खैर आंकड़ों को अलग रख भी दिया जाए तो राजस्थान सरकार ने अवैध खनन गतिविधियों के खिलाफ ईमानदार प्रयास किये हैं। केन्द्र सरकार ने भी अरावली संरक्षण को लेकर कार्ययोजना घोषित की है। इस क्षेत्र में खनन पर प्रतिबंध तो है ही।


चिंतनीय और गंभीर सवाल यह उठता है कि नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय के अरावली पर्वतमाला को परिभाषित करने के कुछ समय बाद जिस तरह से अरावली संरक्षण के लिए देश व्यापी आवाज उठी और जिस तरह से डीपी लगाने और प्रदर्शन आदि का दौर चला वह दिसंबर में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नवंबर के आदेश को केप्ट इन एवियांस करने के साथ ही ना जाने कहां नेपथ्य में चला गया। हांलाकि अरावली पर्वतमाला को लेकर जिस तरह से आवाज उठाई गई वह जागरुकता की मिसाल मानी जा सकती है। बाद में तो कुछ छुट-पुट आवाज ही सुनाई दी। जबकि मीडिया लगातार अग्रलेखों व अन्य तरह से इस मुद्दे को जीवित रखे रहा। सर्वोच्च न्यायालय की नवीनतम टिप्पणी ने अवैध खनन के प्रति जिस तरह से गंभीरता दिखाई है और रोक लगाने के निर्देश दिए हैं वह समस्या की जड़ तक पहुंचने में सहायक है। जब हम सब मानकर चल रहे हैं और जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक तरह से मोहर लगा दी है कि समस्या की जड़ अवैध खनन गतिविधियां है तो फिर आवाज की गूंज अवैध खनन पर रोक की भी तेज होनी चाहिए। अब सवाल यह भी उठता है कि अवैध खनन करने वाले कौन है? अरावली पर्वतमाला को खोखला करने वाले कौन है? कोई आप हम में से आम आदमी तो हो नहीं सकता। निश्चित रुप से प्रभावशाली लोगों का ही यह काम है। मजे की बात यह है कि इस तरह के लोगों में से कुछ तत्व ही आंदोलन के अगुवा बन जाते हैं। फिर धरातलीय बात की जायं तो यह मानना ही पड़ेगा कि स्थानीय लोगों, स्थानीय प्रशासन और सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं से छुप कर अवैध खनन होता हो तो यह भी गले उतरने वाली बात नहीं हो सकती। ऐसे में भले ही आरोप प्रत्यारोप किसी पर भी लगे, कहने को सरकार और सरकारी मशीनरी को दोषी बताया जाएं पर आमआदमी और गैरसरकारी संस्थाओं, सोशल एक्टिविस्टों की भी समाज के प्रति जिम्मेदारी बनती है। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि राजस्थान सरकार द्वारा या किसी भी राज्य की सरकार द्वारा अभियान चलाये जाते हैं या अन्य सामान्य परिस्थितियों में अवैध खनन गतिविधियों की शिकायत भूल भटकी ही प्राप्त होती है। बात कड़बी अवश्य लग सकती है पर यह भी सही है कि अधिकांश शिकायतें आपसी रंजिश के कारण होती है या ब्लेकमेल कर कुछ लाभ प्राप्त करने की होती है। अन्यथा यदि जहां भी अवैध खनन हो रहा है वहां के आसपास के लोग या एक्टिविस्ट सक्रिय हो जाएं तो लाख प्रयासों के बावजूद अवैध खनन नहीं हो सकता है और अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। ठीक है सरकार की जिम्मेदारी है और सरकार को सख्ती से अवैध खनन गतिविधियों को रोकना भी चाहिए पर यह भी साफ हो जानी चाहिए कि वैध खनन को प्रोत्साहित करके ही अवैध खनन पर कारगर रोक संभव है और दूसरी यह कि सरकार के साथ ही आमजन को भी सक्रिय होने के साथ ही अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। यहां सरकार के पक्ष में कहने की यह बात नहीं है पर अवैध खनन गतिविधियां जहां भी हो रही है वहां के नागरिकों को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से आगे आना चाहिए ताकि अरावली के संरक्षण में ठोस सहभागिता हो सकें।  








डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

स्तंभकार

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