2025. जब मौसम ने कैलेंडर पर कब्ज़ा कर लिया
रिपोर्ट बताती है कि 2025 ने एक बार फिर यह साबित किया कि भारत में जलवायु प्रभावों का पैटर्न बदल चुका है. बाढ़, अत्यधिक वर्षा, चक्रवात, भूस्खलन और हीटवेव. ये सभी अब बार-बार और ज़्यादा तीव्रता से सामने आ रहे हैं. क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के मुताबिक, शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, हाइवे, बंदरगाह और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स जैसे पूंजी-प्रधान सेक्टरों को “उच्च” से “अत्यधिक उच्च” जलवायु जोखिम की श्रेणी में रखा गया है. यानी स्कोर 4 से 5. यह सिर्फ सैद्धांतिक खतरा नहीं है. 2000 के बाद से भारत में प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक नुकसान 99 अरब डॉलर से अधिक का रहा है. और 2023 में ही, प्राकृतिक आपदाओं से भारत को 12 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जो पिछले दशक के औसत से कहीं अधिक है.
जहां निवेश है, वहीं जोखिम भी है
रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह है कि भारत की कई सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं उन्हीं इलाकों में स्थित हैं जो जलवायु के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं. ओडिशा का पारादीप पोर्ट, आंध्र प्रदेश के नए पोर्ट प्रोजेक्ट्स, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की पहाड़ी सड़कें और सुरंगें, सिक्किम का तीस्ता हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, लद्दाख का ज़ोजिला टनल, और अरुणाचल प्रदेश की बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं. इन सबमें मिलाकर निवेश करीब 2.95 लाख करोड़ रुपये का है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर ऐसे प्रोजेक्ट्स बार-बार जलवायु आपदाओं से प्रभावित होते रहे, तो बीमा कंपनियों के लिए इनका जोखिम उठाना मुश्किल होता जाएगा.
बीमा उद्योग. चेतावनी भी, तैयारी भी
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने भारत की प्रमुख नॉन-लाइफ इंश्योरेंस और रीइंश्योरेंस कंपनियों से बातचीत की. इनमें SBI General Insurance, Munich Re India, Swiss Re India और General Insurance Corporation of India शामिल हैं. इन सभी का मानना है कि जलवायु जोखिम अब बीमा उद्योग के लिए एक “कोर बिज़नेस रिस्क” बन चुका है. रिपोर्ट के मुताबिक, सभी बीमाकर्ताओं ने स्वीकार किया कि मौजूदा मॉडल बदलते जलवायु पैटर्न को सही तरीके से पकड़ पाने में सक्षम नहीं हैं. यानी खतरा यह नहीं कि बीमा खत्म हो जाएगा. खतरा यह है कि जोखिम की सही कीमत तय करना मुश्किल होता जा रहा है. और जब ऐसा होता है, तो बीमा और वास्तविक नुकसान के बीच का अंतर, जिसे प्रोटेक्शन गैप कहा जाता है, और चौड़ा हो जाता है. रिपोर्ट बताती है कि भारत में आज भी लगभग 91 प्रतिशत जलवायु नुकसान बिना बीमा कवर के रह जाते हैं.
क्या भारत अनइंश्योरबल हो सकता है?
रिपोर्ट यह साफ़ करती है कि भारत अभी “अनइंश्योरबल” नहीं हुआ है. लेकिन कुछ इलाके, खासकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्से, उस सीमा के क़रीब पहुंचते दिख रहे हैं. अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया और फ्लोरिडा जैसे राज्यों के उदाहरण दिए गए हैं, जहां जलवायु जोखिम बढ़ने के बाद कई बीमा कंपनियों ने कवरेज देना बंद कर दिया. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर भारत में भी नुकसान “निश्चित” हो गया, तो बीमा का गणित ही बदल जाएगा.
सरकार के लिए बढ़ता जोखिम
एक अहम बिंदु यह भी है कि कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स सरकार के स्वामित्व में हैं. ऐसे मामलों में बीमा का बोझ अंततः राज्य या केंद्र सरकार पर ही आता है. रिपोर्ट सवाल उठाती है कि अगर अगले 10 से 20 वर्षों में जलवायु घटनाएं और तीव्र हुईं, तो क्या सरकारी खजाना इन नुकसानों को संभाल पाएगा.
समाधान क्या है?
आरती खोसला के शब्दों में, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग में जलवायु सहनशीलता को शुरुआत से ही शामिल करना अब विकल्प नहीं, ज़रूरत है. डिजाइन, लोकेशन, और जोखिम आकलन. सब कुछ बदलते मौसम को ध्यान में रखकर करना होगा. रिपोर्ट सुझाव देती है कि बेहतर रिस्क मॉडलिंग, मानकीकृत डिस्क्लोज़र फ्रेमवर्क, और पैरामीट्रिक इंश्योरेंस जैसे नए उपकरण इस दिशा में मदद कर सकते हैं. लेकिन एक बात साफ़ है. भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य अब सिर्फ कंक्रीट और स्टील का सवाल नहीं है. यह सवाल है कि बदलती जलवायु के दौर में हम अपने विकास को कितना सुरक्षित बना पाते हैं. और उसकी कीमत कौन चुकाता है.

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