विशेष : बापू (गांधी का स्वराज) , सर्वोदय और हलमा का समकालीन अर्थ - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

विशेष : बापू (गांधी का स्वराज) , सर्वोदय और हलमा का समकालीन अर्थ

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दूनिया जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा, भूमि क्षरण और जल संकट जैसी जटिल चुनौतियों से जूझ रही है। तकनीकी समाधान और नीतिगत सुधारों के बावजूद पृथ्वी की पारिस्थितिकी और समाज दोनों असंतुलन की ओर बढ़ रहे हैं। पर्यावरणीय विनाश, संसाधनों का अत्यधिक दोहन और सामाजिक विखंडन आधुनिक विकास के अनिवार्य परिणाम बन गए हैं। इस दौर में जब हम समाधान की तलाश में भटक रहे हैं, आदिवासी समुदाय अपनी परंपराओं, जीवनशैली और सामूहिक ज्ञान के ज़रिए एक अलग रास्ता दिखा रहे हैंवह रास्ता जो स्थिरता, सामूहिकता और संतुलन पर आधारित है। आदिवासी समुदाय सदियों से जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतुओं के साथ सामंजस्यपूर्ण रिश्ता बनाए हुए हैं। उनकी परंपराएँ, विशेष रूप से 'हलमा' यानी सामूहिक श्रमदान, आधुनिक विकास के लिए ठोस प्रेरणा देती हैं। यह केवल एक कृषि पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक दर्शन है जो समुदाय, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता को एक सूत्र में पिरोता है। हलमा एक पारंपरिक आदिवासी प्रथा है जो प्राचीन काल से आदिवासी समुदायों में प्रचलित रही है। यह सामूहिक प्रयास का वह अनूठा उदाहरण है जहां समुदाय के लोग एक दूसरे की मदद करते हैं, खासकर कृषि कार्यों में। इस प्रक्रिया में कोई आर्थिक लेन-देन नहीं होता, बल्कि सभी लोग अपनी मेहनत से योगदान करते हैं। बुआई, निराई, गुड़ाई, फसल कटाई और अन्य कृषि कार्यों के दौरान समुदाय के सभी सदस्य किसी एक सदस्य के खेत में एकत्रित होकर काम करते हैं।


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हलमा का मूल उद्देश्य पारस्परिक सहयोग और समर्थन के माध्यम से समुदाय की समृद्धि और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। यह प्रथा इस बात का प्रमाण है कि सामूहिक चेतना और सहयोग की भावना से कोई भी समुदाय न केवल अपनी आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित कर सकता है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूत बना सकता है। हलमा प्रणाली का संचालन दो महत्वपूर्ण स्तरों पर होता है, जो इसकी लचीलापन और व्यापकता को दर्शाते हैं। पहले स्तर पर व्यक्तिगत सहयोग आता है। जब किसी किसान के खेत में अधिक काम होता है, जैसे कि फसल कटाई का समय या बुआई का मौसम, तो अन्य ग्रामीण स्वेच्छा से मदद करते हैं। इसमें कोई हिसाब-किताब नहीं होता, बल्कि यह विश्वास होता है कि जब मुझे जरूरत होगी तो समुदाय मेरे साथ खड़ा होगा। दूसरा स्तर सामुदायिक विकास का है। जब पूरे गाँव के हित के लिए कोई सामूहिक कार्य होता है, जैसे तालाब की खुदाई, सड़क निर्माण या जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण, तो सभी लोग बिना किसी मजदूरी के मिलकर वह काम करते हैं। यह सामुदायिक संपत्ति और सामूहिक विकास के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह दो-स्तरीय संरचना हलमा को एक समग्र सामाजिक व्यवस्था बनाती है जो व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों आवश्यकताओं को संबोधित करती है।


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आधुनिकता के दौर में जब दुनिया जल संकट से जूझ रही है, तब झाबुआ जिले के पेटलावद ब्लॉक के ग्राम गोदडिया ने अपनी समृद्ध आदिवासी परंपरा के जरिए एक नई मिसाल पेश की है। यहाँ के ग्रामीणों ने सदियों पुरानी हलमा पद्धति को पुनर्जीवित करते हुए जल संरक्षण का एक सराहनीय कार्य किया है। ग्राम की ऊँची टेकरी पर स्थित कटारा फलिया में पानी के बहाव को रोकने और भू-जल स्तर सुधारने के लिए ग्रामीणों ने कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत की। पारंपरिक हलमा पद्धति के माध्यम से यहाँ एक गली प्लग यानी छोटा डैम बनाया गया। इस प्रयास से न केवल ग्रामीणों को दैनिक उपयोग के लिए पानी मिलेगा, बल्कि मवेशियों के लिए भी पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होगी। इस आयोजन की खास बात इसकी जीवंतता रही। जल संरक्षण के इस कार्य को ग्रामीणों ने किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक उत्सव की तरह मनाया। कटारा फलिया के चालीस से अधिक परिवारों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ढोल, कुंडी और थाली की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हुए ग्रामीणों ने श्रमदान किया। वागधारा गठित  ग्राम स्वराज समूह के दिनेश कटारा ने कहा कि यदि समाज एकजुट होकर प्रयास करे तो जल संकट जैसी गंभीर समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कार्यक्रम के दौरान ब्लॉक सहजकर्ता मुकेश पोरवाल ने सामूहिकता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि एकता से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं और परिणाम अधिक प्रभावी मिलते हैं।


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कार्यक्रम का सफल संचालन सामुदायिक सहजकर्ता दीपक मईडा द्वारा किया गया। इस पुनीत कार्य में ग्राम स्वराज समूह के दिनेश कटारा, पूनमचंद, कैलाश, हीरा डोडियार सहित प्रेमलता डामर, ललिता कटारा और लीलावती सिंगाड़ जैसे अनेक कार्यकर्ताओं का सक्रिय योगदान रहा। गोदडिया के जल संरक्षण प्रयास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब गाँव के लोगों ने महसूस किया कि यदि तुरंत आगे का कार्य नहीं किया गया तो जो कुछ हासिल हुआ है वह टिकाऊ नहीं रहेगा। तालाब के रिसाव को रोकने के लिए पत्थरों की आवश्यकता थी, लेकिन पत्थर दूर से लाने पड़े। इस चुनौतीपूर्ण कार्य में कई ग्रामीणों, खासकर महिलाओं ने मिलकर यह काम स्वयं पूरा किया। सक्षम समूह की सदस्य ललिता कटारा के अनुसार, "यह काम कठिन था, लेकिन हमारे बीच एकता और सहयोग की भावना ने हमें आगे बढ़ाए रखा।" यह कथन हलमा की आत्मा को व्यक्त करता है कठिनाइयों के बीच भी सामूहिक संकल्प और एकता की शक्ति। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी यह भी दर्शाती है कि हलमा केवल पुरुषों की प्रथा नहीं है, बल्कि पूरे समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है।


आर्थिक दृष्टि से देखें तो सामूहिक श्रम से कृषि कार्यों में बाहरी संसाधनों की आवश्यकता कम हो जाती है। मजदूरी पर खर्च न करने से किसानों की आर्थिक बचत होती है। साथ ही सामूहिक श्रम और सहयोग के माध्यम से समुदाय अपने कृषि कार्यों को खुद ही पूरा कर सकता है, जिससे बाहरी सहायता पर निर्भरता कम हो जाती है। यह आत्मनिर्भरता आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करती है। जब समुदाय अपने संसाधनों और श्रम से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है तो वह न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होता है, बल्कि आत्मसम्मान और गौरव की भावना भी विकसित होती है। हलमा पारंपरिक ज्ञान और तकनीकों को सुरक्षित रखने का एक माध्यम भी है। जब समुदाय के सदस्य एक साथ मिलकर काम करते हैं तो वे अपनी कृषि विशेषज्ञता और पारंपरिक विधियों को साझा करते हैं। यह अंतर-पीढ़ीगत ज्ञान हस्तांतरण का एक प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है। सांस्कृतिक पहचान की मजबूती में भी हलमा की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह प्रथा आदिवासी संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को संरक्षित करने में मदद करती है।  हलमा जैसी प्रथाएं सांस्कृतिक गौरव और आत्म-सम्मान का स्रोत बनती हैं।


आधुनिक अर्थव्यवस्था मुद्रा-केंद्रित है। हर चीज़ का मूल्य पैसे में आंका जाता है और हर रिश्ता एक आर्थिक लेन-देन में बदल गया है। इस व्यवस्था में श्रम एक वस्तु है जिसे खरीदा और बेचा जाता है। लेकिन हलमा एक बिल्कुल अलग अर्थव्यवस्था प्रस्तुत करता है एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो मुद्रा के बिना काम करती है, जहां संबंधों का मूल्य पैसे से नहीं मापा जाता। हलमा में लेन-देन नहीं होता, बल्कि आदान-प्रदान होता है। आज मैं आपके खेत में काम करता हूं, कल आप मेरे खेत में आएंगे। यह कोई करार नहीं है, बल्कि विश्वास है। यह कोई हिसाब-किताब नहीं है, बल्कि रिश्ता है। जब कोई व्यक्ति हलमा में भाग लेता है तो वह केवल एक मजदूर नहीं होता—वह समुदाय का सम्मानित सदस्य होता है। उसका श्रम उसकी गरिमा को बढ़ाता है, महात्मा गांधी ने स्वराज की जो अवधारणा प्रस्तुत की थी, वह हलमा की भावना से गहराई से जुड़ी है। गांधी जी का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामुदायिक सशक्तिकरण और ग्राम स्वराज की अवधारणा थी। गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों में ग्रामोद्योग, श्रमदान और सामुदायिक कार्य शामिल थे। हलमा इन सभी तत्वों को एक साथ लाता है।


जब गोदडिया के ग्रामीण मिलकर जल संरक्षण करते हैं तो वे गांधी जी के स्वराज के सपने को साकार कर रहे होते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान श्रमदान एक महत्वपूर्ण हथियार था। लोग स्वेच्छा से मिलकर सड़कें बनाते थे, स्कूल खोलते थे और समाज सेवा करते थे। हलमा यह परंपरा आज भी जीवित रखे हुए है। विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन में भी सामुदायिक श्रम और सहयोग का महत्व था। हलमा सर्वोदय के आदर्शों को व्यावहारिक रूप देता है जहां सबका उत्थान होता है, किसी का शोषण नहीं। गोदडिया की कहानी में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ललिता कटारा, प्रेमलता डामर, लीलावती सिंगाड़ जैसी महिलाओं ने न केवल भाग लिया बल्कि नेतृत्व भी किया। हलमा में महिलाएं और पुरुष समान रूप से भाग लेते हैं। महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान देता है।महिलाएं केवल श्रम नहीं करतीं बल्कि योजना बनाने और निर्णय लेने में भी शामिल होती हैं। सक्षम समूह की ललिता कटारा का कथन इस बात का प्रमाण है कि महिलाएं संगठित हैं और अपनी आवाज़ रखती हैं। जब महिलाएं सामुदायिक संसाधनों के निर्माण और प्रबंधन में भाग लेती हैं तो उनका आर्थिक अधिकार भी स्थापित होता है।


हलमा केवल एक कृषि पद्धति या श्रमदान की व्यवस्था नहीं है। यह एक जीवन दर्शन है जो सामूहिकता, सहयोग, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ता है। गोदडिया गाँव का उदाहरण दर्शाता है कि आधुनिक चुनौतियों का समाधान पारंपरिक ज्ञान में निहित है। जब दुनिया भर के विकासशील और विकसित देश जल संकट, पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक विखंडन से जूझ रहे हैं, तब हलमा जैसी परंपराएं एक वैकल्पिक मार्ग दिखाती हैं। यह मार्ग न तो पूंजीवादी विकास का है और न ही राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था का, बल्कि यह सामुदायिक स्वराज और सहकारिता का मार्ग है। आज जब हम सतत विकास लक्ष्यों की बात करते हैं, जब हम जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रणनीतियां बनाते हैं, तब हमें आदिवासी समुदायों की ओर देखना चाहिए। उनकी परंपराओं में, उनकी जीवनशैली में और हलमा जैसी प्रथाओं में भविष्य के समाधान छिपे हैं।

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