1948 के यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑन ह्यूमन राइट्स में भी जेंडर समानता शामिल है।
अनेक दशकों के प्रयासों से 1979 में क़ानूनी-रूप से बाध्य संधि – सीडॉ (CEDAW) पारित हुई जिसके केंद्र में ही जेंडर न्याय है। सरकारों ने सीडॉ को पारित करके, हर प्रकार ही महिला हिंसा और शोषण को अंत करने का वादा किया पर अभी तक सभी वादों को पूरा नहीं किया है। डॉ पाम राजपूत जो भारत सरकार द्वारा गठित महिला समिति की पूर्व अध्यक्ष रही हैं और प्रखर नारीवादी हैं, ने शी एंड राइट्स सत्र के अध्यक्षीय व्याख्यान में कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा 1993 में भी दुनिया के सभी देशों के प्रमुख ने महिला हिंसा समाप्त करने के वादे को दोहराया था। 1994 में आईसीपीडी (जनसंख्या और विकास पर अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन) के तहत वादों में भी महिला हिंसा का अंत और महिला के मानवाधिकार के मुद्दे केंद्र में रहे। 1995 संयुक्त राष्ट्र महिला मुद्दों पर वैश्विक अधिवेशन में ऐतिहासिक बीजिंग घोषणापत्र पर सभी सरकारों ने मोहर लगायी जिसमें अनेक महत्वपूर्ण वादों के साथ महिला हिंसा समाप्त करना भी शामिल था।
महिला हिंसा समाप्ति के वादे – सिर्फ़ वादे ही क्यों रह गए?
2000 से महिला हिंसा दरों में क्यों परिवर्तन नहीं है – 0.2% की सालाना गिरावट के क्या मायने हैं? 26 साल से महिला हिंसा दरों में बड़ी गिरावट होनी अनिवार्य थी और विश्व के सभी देशों को 2030 तक हर प्रकार की महिला हिंसा को समाप्त करने की ओर अग्रसर होना था। शी एंड राइट्स की समन्वयक और प्रखर नारीवादी कार्यकर्ता शोभा शुक्ला ने कहा कि ट्रम्प समेत अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ सरकारें जेंडर और मानवाधिकार विरोधी कदम उठा रही हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी की एमेरिटस प्रोफेसर डॉ पाम राजपूत ने कहा कि जंग और कलह में महिला हिंसा का दर दोगुनी हो जाती है परंतु देशों के बीच जंग या कलह या आंतरिक हिंसा या कलह अनेक जगह व्याप्त है। संयुक्त राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है कि वैश्विक शांति क़ायम रहे। शी एंड राइट्स सत्र को नियमित रूप से ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूज़न, वोमेन डिलीवर कांफ्रेंस 2026, इंटरनेशनल प्लैंड पैरेंटहुड फेडरेशन, एरो, डबल्यूजीएनआरआर, सीएनएस आदि संयुक्त रूप से आयोजित करते हैं। डॉ पाम राजपूत ने बताया कि महिला हिंसा अक्सर रिपोर्ट नहीं होती है पर इसके बावजूद भी आंकड़े अत्यंत चिंताजनक हैं: विश्व में कम-से-कम 84 करोड़ महिला हिंसा का शिकार होती हैं जिनमें से 32 करोड़ महिलाओं ने हिंसा पिछले 12 महीनों में ही झेली है। 73% महिला पत्रकारों ने भी हिंसा की पुष्टि की और इनमें से 20% ने जेंडर विरोधी समूह द्वारा हिंसा और प्रताड़ना भी झेली है। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन ने 2025 में एक शोध प्रकाशित किया था जिसके अनुसार एशिया पसिफ़िक देशों की 60% महिला सांसद ने ऑनलाइन महिला हिंसा झेलने की पुष्टि की। नफ़रती सोशल मीडिया पोस्ट-ट्रोल, निजी डेटा को सार्वजनिक करना, आदि शामिल था। 76% महिला सांसदों ने कहा कि उन्होंने मानसिक हिंसा और प्रताड़ना भी झेली है। 25% महिला सांसद ने यौनिक हिंसा की भी पुष्टि की।
बुनियादी असमानताएं दूर करो
डॉ राजपूत का मानना है कि हमें बुनियादी असमानताएं दूर करनी होंगी, पितृत्मकता को जड़ से उखाड़ना होगा जिससे कि नारीवादी व्यवस्था बने - जहाँ सभी जेंडर के लोग समानता के साथ जी सकें और उनके सभी मानवाधिकारों की रक्षा हो सके, और सरकारी तंत्र (जैसे कि न्याय और पुलिस) को जेंडर समानता के लिए अधिक संवेदनशील बनाया जा सके। डॉ राजपूत ने कहा कि जो वादे वैश्विक स्तर पर होते हैं उनके लोकल या स्थानीय स्तर पर लागू क्यों नहीं किया जाता? हम 'सतत विकास' की कैसे बात कर सकते हैं जब दुनिया की आधी आबादी अनेक प्रकार की हिंसा और शोषण का शिकार हो और विकास के मानकों पर पिछड़ रही हो?
एचआईवी/एड्स और महिला हिंसा
अफ़्रीकन गर्ल्स एम्पावरमेंट नेटवर्क की एस्थर असुकुओ ने कहा कि जबतक महिला हिंसा समाप्त नहीं होती, एचआईवी/एड्स का अंत संभव नहीं है। बलात्कार या अन्य प्रकार की जेंडर हिंसा के कारण महिला के एचआईवी समेत अनेक यौन रोगों से संक्रमित होने का खतरा अनेक गुना बढ़ जाता है। युगांडा की वुमन डिलीवर इमर्जिंग लीडर एंजेल बबीरिये ने कहा कि अनेक लड़कियों और महिलाओं को माहवारी संबंधित उत्पाद नहीं मिलते, स्वच्छता संबंधित सेवाएं नहीं मिलती, और माहवारी स्वच्छता संबंधित जानकारी तक नहीं मुहैया होती। माहवारी स्वच्छता के अभाव में लड़कियां/ महिलाएं शिक्षा या कार्य पर नहीं जा पातीं, स्वास्थ्य बिगड़ता है और महिलाओं के अधिकार और आर्थिक स्वतंत्रता भी खंडित होते हैं। युगांडा देश में हर 4 में से 1 लड़की, माहवारी आरंभ होने के बाद स्कूल छोड़ देती है। जो लड़कियां माहवारी के बाद भी स्कूल जाती हैं उनके स्कूल से छुट्टी लेने का दर तीन गुना अधिक है। एंजेल बबीरिये कहती हैं कि महिलाएं और लड़कियां तब तक सम्मान और अधिकार के साथ जीवन नहीं जी सकती जब तक माहवारी स्वच्छता सबके लिए सुनिश्चित करवायी जाये।
2026 में क्या जेंडर-विरोधी मुहिम का अंत होगा?
2030 के सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब 5 साल से कम समय शेष है। दुनिया की सभी सरकारों ने इन लक्ष्यों को "सबके लिए" पूरा करने का वादा किया था। आशा है कि 2026 में सरकारें, कथनी और करनी में भेद मिटाएँगी। 1945 के संयुक्त राष्ट्र के चार्टर को ईमानदारी से लागू करना होगा - देशों के बीच जंग, कलह, पूंजीवाद, पितृसत्ता, अमीर देशों (और उनके बैंक) द्वारा विकासशील देशों को क़र्ज़ों में डुबाना, आदि मुद्दे जेंडर समानता और न्याय के मुद्दे से जुड़े हुए हैं। जेंडर न्याय के साथ-साथ इन मुद्दों पर भी कार्य करना ज़रूरी है। जब सरकारों ने विश्व शांति और जेंडर न्याय के लिए अनेक समझौतों आदि को पारित किया हुआ है, तब कुछ अमीर देशों या लोगों की मनमानी क्यों? आगामी मार्च 2026 में महिला हिंसा के अंत पर केंडिट सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र अन्तर-सरकारी उच्च स्तरीय बैठक होगी। उम्मीद है कि सरकारें जेंडर-विरोधी मुहिम का अंत करेंगी, और जेंडर समानता समेत सभी सतत विकास लक्ष्यों पर कार्य तेज़ी से आगे बढ़ायेंगी।
शोभा शुक्ला – सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस)
(लेखक लखनऊ के लोरेटो कॉन्वेंट कॉलेज की सेवानिवृत्त वरिष्ठ शिक्षिका हैं और सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापिका-संपादिका हैं।)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें