काशी, जहाँ शंखनाद से दिन का आरंभ होता है और आरती की लौ पर रात विश्राम पाती है, वहीं अब स्मैश की गूंज भी स्थायी स्मृति बन चुकी है। सिगरा स्टेडियम के इंडोर कोर्ट पर संपन्न 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप केवल एक खेल आयोजन नहीं रही; यह उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल और विशेषकर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के लिए भविष्य की नींव साबित हुई। 35 वर्षों बाद यूपी को मिली राष्ट्रीय मेजबानी और पहली बार बनारस में हुए इस महोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया कि काशी अब आध्यात्मिक राजधानी के साथ-साथ खेल चेतना की भी राजधानी बनने की ओर अग्रसर है। यह आयोजन उस समयबोध का प्रतीक है जब खेल को मनोरंजन नहीं, राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘खेलो इंडिया’ संकल्प और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खेल-अवसंरचना केंद्रित विकास मॉडल ने जिस धरातल को तैयार किया, उस पर सिगरा स्टेडियम का यह राष्ट्रीय आयोजन आत्मविश्वास का पर्व बनकर उभरा
वार्षिक राष्ट्रीय/अंतरराज्यीय कैलेंडर, काशी को नियमित खेल गंतव्य बनाना। खेल अकादमी नेटवर्क, वॉलीबॉल के साथ एथलेटिक्स, कुश्ती, बैडमिंटन।स्कॉलरशिप और स्पोर्ट्स जॉब लिंक, युवाओं को करियर सुरक्षा। महिला खेल विशेष पैकेज, कोचिंग, पोषण, मानसिक प्रशिक्षण। खेल-पर्यटन ब्रांडिंगकृकाशी स्पोर्ट्स वीक/फेस्टिवल। मतलब साफ है 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने यह सिद्ध कर दिया कि काशी केवल अतीत नहीं, भविष्य भी है। यह आयोजन स्मैश और ब्लॉक से आगे जाकर स्वप्न और संकल्प का उत्सव बना। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र से उठी यह खेल-चेतना यदि निरंतरता पाए, तो वह दिन दूर नहीं जब पूर्वांचल के युवा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर परचम लहराएँगे। काशी ने पहली मेजबानी में इतिहास रचा है। अब समय है कि इस इतिहास को परंपरा बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ कह सकें : “यहाँ मंत्र भी गूंजते हैं और मेडल भी।” काशी की मिट्टी ने सदियों से संत, शास्त्र और संस्कृति को जन्म दिया है, लेकिन इस बार इसी धरती ने सपनों को उड़ान दी। सिगरा स्टेडियम के इंडोर कोर्ट से उठती स्मैश की गूंज ने यह साफ कर दिया कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में अब केवल विरासत ही नहीं, भविष्य भी आकार ले रहा है। 35 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश और पहली बार बनारस में आयोजित 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप ने पूर्वांचल को वह राष्ट्रीय मंच दिया, जिसकी कमी ने अब तक यहां की प्रतिभा को सीमित कर रखा था। यह आयोजन एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि युवा आत्मविश्वास, सामाजिक परिवर्तन और काशी के नवगौरव का उद्घोष बन गया। यह आयोजन बताता है कि काशी अब अतीत की विरासत ही नहीं, भविष्य की संभावनाओं की भी भूमि है। करीब 35 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर की सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप की मेजबानी मिली और पहली बार यह अवसर बनारस को प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में हुए इस आयोजन ने एक स्पष्ट संदेश दिया—खेल अब हाशिए पर नहीं, विकास की मुख्यधारा में है। यह संदेश सिर्फ खिलाड़ियों तक सीमित नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं तक पहुंचा है जो संसाधनों के अभाव में अपने सपनों को मन ही मन दबा देते थे।
खेल से आत्मविश्वास, आत्मविश्वास से भविष्य
पूर्वांचल लंबे समय तक प्रतिभा के बावजूद मंच के अभाव से जूझता रहा। गांव-देहात और कस्बों में खेलते बच्चे, सीमित संसाधनों में अभ्यास करते युवा—इन सबके भीतर क्षमता थी, पर अवसर नहीं। काशी में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता ने इस दूरी को पाटने का काम किया। जब देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी एक ही कोर्ट पर खेलते दिखे, तो स्थानीय युवाओं के लिए यह सिर्फ मुकाबला नहीं, सपनों का सजीव पाठ था। यह आयोजन बताता है कि खेल केवल पदक या ट्रॉफी तक सीमित नहीं होते। खेल अनुशासन सिखाता है, टीमवर्क गढ़ता है और हार–जीत से ऊपर उठकर संघर्ष की ताकत देता है। यही गुण किसी भी समाज को आगे ले जाते हैं। पूर्वांचल के युवाओं के लिए यह संदेश बेहद अहम है, जहां रोजगार और अवसर की तलाश अक्सर महानगरों की ओर पलायन कराती रही है। खेल इस प्रवृत्ति को रोकने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।
प्रधानमंत्री का क्षेत्र, राष्ट्रीय प्रतीक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में इस आयोजन का होना महज संयोग नहीं है। यह उस नीतिगत सोच का परिणाम है, जिसमें खेल को राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना गया है। ‘खेलो इंडिया’ जैसी पहल और राज्य सरकार द्वारा खेल अवसंरचना पर किया जा रहा निवेश अब धरातल पर दिखने लगा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाया और यह भरोसा दिया कि शासन खेल प्रतिभाओं के साथ खड़ा है। काशी में इस सफल आयोजन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि प्रशासन, स्थानीय निकाय और समाज मिलकर कामि कोशिश करें, तो पूर्वांचल जैसे क्षेत्र भी राष्ट्रीय आयोजनों के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। सिगरा स्टेडियम का फुल हाउस रहना यह दर्शाता है कि यहां खेल देखने–समझने वाला दर्शक वर्ग मौजूद है।
महिला खेल और सामाजिक संदेश
महिला वर्ग के फाइनल मुकाबले ने विशेष संदेश दिया। केरल और रेलवे की खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास और आक्रामकता के साथ खेल दिखाया, वह महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण था। यह दृश्य पूर्वांचल की बेटियों के लिए प्रेरणा है—कि मैदान भी उनका है और मंच भी। जब समाज महिलाओं को समान अवसर देता है, तो परिणाम राष्ट्रीय गौरव में बदलते हैं।
खेल और अर्थव्यवस्था का संबंध
राष्ट्रीय आयोजन ने काशी की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी। होटल, परिवहन, छोटे व्यवसाय, पर्यटन—सभी को लाभ मिला। गंगा दर्शन, सांस्कृतिक भ्रमण और स्थानीय व्यंजनों से परिचय ने यह साबित किया कि खेल और पर्यटन एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। यदि ऐसे आयोजन नियमित हों, तो काशी पूर्वांचल का खेल–पर्यटन केंद्र बन सकती है।
आगे की राह
यह आयोजन एक शुरुआत है, मंज़िल नहीं। अब आवश्यकता है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर खेल सुविधाओं का विस्तार हो, स्कूल–कॉलेजों में प्रशिक्षित कोच और नियमित प्रतियोगिताएं हों, खेल को करियर से जोड़ा जाए ताकि प्रतिभा आर्थिक असुरक्षा के डर से पीछे न हटे। पूर्वांचल की धरती पर राष्ट्रीय खेल चेतना का उदय यह संकेत है कि बदलाव की लहर चल पड़ी है। काशी ने पहली मेजबानी में यह साबित कर दिया कि वह केवल परंपरा की वाहक नहीं, भविष्य की निर्माता भी है। यदि यह सिलसिला निरंतर चला, तो वह दिन दूर नहीं जब पूर्वांचल के युवा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदेश और देश का नाम रोशन करेंगे। खेल के इस नवजागरण ने काशी को नया गौरव दिया है—और उत्तर प्रदेश को नया
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी



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