प्रशासक प्रिंसी मैथ्यू के लिखित बयान पर मामला दर्ज होना एक आवश्यक कदम है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं. इससे पहले भी अकाउंट्स डिपार्टमेंट, इंपोलॉइस कोऑपरेटिव सोसाइटी और लेबोरेटरी डिपार्टमेंट में घपले सामने आ चुके हैं. कहीं एफआईआर कर जेल भेजा गया, कहीं चुपचाप रिकवरी कर मामला रफा-दफा किया गया, तो कहीं इस्तीफा लेकर संतोष कर लिया गया. यह दोहरा मापदंड संस्थागत विश्वसनीयता को कमजोर करता है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गबन किसने किया, बल्कि यह भी है कि बार-बार ऐसे मामले क्यों सामने आ रहे हैं. क्या यह महज संयोग है, या फिर आंतरिक नियंत्रण प्रणाली में गंभीर खामियां हैं? धार्मिक और सेवा आधारित संस्थानों से समाज अपेक्षा करता है कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही में मिसाल पेश करें. कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल का मामला चेतावनी है—सेवा का मिशन तभी सुरक्षित रह सकता है, जब सिस्टम मजबूत हो, निगरानी निष्पक्ष हो और दोषी के खिलाफ कार्रवाई हर हाल में समान हो.वरना सेवा की आड़ में पनपती अनियमितताएं उस भरोसे को तोड़ देगा, जिसे बनाने में दशकों लगे हैं.
पटना, (आलोक कुमार). मेडिकल मिशन सिस्टर्स सोसाइटी की पहचान वर्षों तक सेवा, करुणा और अनुशासन से जुड़ी रही है. डॉ. अन्ना डेंगल और उनकी सहयोगियों ने जिस सोच के साथ इस सोसाइटी की नींव रखी थी, उसका उद्देश्य इलाज को व्यापार नहीं, बल्कि मिशन बनाना था. मुंबई, दिल्ली, केरल, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड तक फैला इसका नेटवर्क इसी विचार का विस्तार था. लेकिन समय के साथ कई संस्थान या तो बंद हुए या अन्य ईसाई संस्थाओं को सौंप दिए गए.झारखंड में अस्पतालों की जगह नशा मुक्ति केंद्रों का खुलना इस बदलाव का प्रतीक है. बिहार में कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल आज भी इस परंपरा का प्रमुख स्तंभ है, जिसे मेडिकल मिशन सिस्टर्स सोसाइटी और सिस्टर्स ऑफ चैरिटी ऑफ नाज़रेथ साझेदारी में चला रही हैं. प्रशासक की जिम्मेदारी दोनों संस्थाओं की सिस्टर्स के बीच बदलती रहती है. यह साझेदारी भरोसे पर टिकी है, लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि भरोसे के समानांतर मजबूत निगरानी तंत्र कितना जरूरी है. कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल के अधीन संचालित कॉलेज ऑफ नर्सिंग में सामने आया 72.91 लाख रुपये के गबन का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की बेईमानी नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोरी की कहानी है. प्रशिक्षण लिपिक नीरज कुमार पर दर्ज एफआईआर ने यह साफ कर दिया कि छात्रों के भविष्य से जुड़ी फीस और संस्थान की राशि, दोनों ही असुरक्षित थीं.59 छात्रों का रजिस्ट्रेशन लंबित रह जाना, वह भी तब जब पोर्टल बंद हो चुका हो, यह सवाल खड़ा करता है कि आंतरिक ऑडिट और डिजिटल निगरानी कहां थी.

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