- यह यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि मानवता के कल्याण का संकल्प : अंतर्राष्ट्रीय कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा

सीहोर। जिले के इतिहास में पहली बार संयुक्त मां कालका उत्सव समिति के तत्वाधान में चल रहे सहस्त्र चंडी महायज्ञ के कारण आज मां के दरबार में मेला लगा हुआ है, यह यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि मानवता के कल्याण का संकल्प है। यज्ञ की पवित्र अग्नि में समर्पित हर आहुति शांति, सद्भावना और सकारात्मक ऊर्जा को जागृत करती है। इस महा यज्ञ में सहभागी बनकर विश्व कल्याण की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाएं। आपके सहयोग से ही यह प्रयास सफल हो रहा है। उक्त विचार शहर के करोली माता मंदिर में जारी दस दिवसीय ऐतिहासिक महायज्ञ में पहुंचे अंतर्राष्ट्रीय कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहे। शनिवार को भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रवि मालवीय, नगर पालिका अध्यक्ष प्रिंस राठौर के अलावा अन्य संतों ने यज्ञ शाला में पहुंचकर परिक्रमा की। महायज्ञ की पूर्णाहुति आगामी 27 जनवरी को होगी। आज कार्यक्रम में महामंडलेश्वर मंदिर समिति के महामंडलेश्वर अनिलानंद महाराज आदि शामिल थे। दोपहर में यहां पर आए संत-साधुओं का महायज्ञ के यज्ञाचार्य पंडित महादेव शर्मा, कार्यक्रम के अध्यक्ष विवेक राठौर, मुख्य यजमान तरुण राठौर, पंडित हरि तिवारी, पंडित वासुदेव शर्मा, शैलेश तिवारी, जितेन्द्र राठौर, प्रतुल राठौर, अजय राठौर, दीपांशु राठौर नट्टू, प्रिंस राठौर छोटा, मितेश धाड़ी, कानू राठौर आदि ने स्वागत सम्मान किया। महायज्ञ के मीडिया प्रभारी प्रदीप समाधिया ने बताया कि शहर के इतिहास में होने वाले सहस्त्र चंडी महायज्ञ में अब तक छह दिन में दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने परिक्रमा दी है और एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने नगर भोज में प्रसादी ग्रहण की है। माघ गुप्ता नवरात्रि के पावन अवसर पर सुबह से देर रात्रि तक यहां पर मेले जैसा वातावरण नजर आ रहा है।
नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की आराधना
महायज्ञ के यज्ञाचार्य पंडित महादेव शर्मा ने बताया कि नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की आराधना की जाती है। छठे दिन मां के कात्यायनी स्वरूप की पूजा का विधान है। योग साधना में इस दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्रÓमें स्थित होता है, जो आत्मज्ञान और भक्ति की ऊंचाई का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु जब सम्पूर्ण समर्पण भाव से मां कात्यायनी की उपासना करता है तो उसे सहज ही मां के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी एवं भव्य स्वरूप से युक्त हैं। स्वर्ण के समान चमकीला वर्ण, सिंह वाहन और चार भुजाओं वाली मां कात्यायनी अत्यंत तेजस्विनी प्रतीत होती हैं। इनके बाए हाथ में कमल और तलवार है, वहीं दाहिने हाथ आशीर्वाद और स्वास्तिक मुद्रा से सुशोभित हैं। भगवान कृष्ण को पाने की कामना से व्रज की गोपियों ने इन्हीं की आराधना यमुना के तट पर की थी। मां कात्यायनी का प्राकट्य महर्षि कात्यायन की तपस्या का फल है। महिषासुर के अत्याचार से त्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने तेज से एक दिव्य देवी का आविर्भाव किया, तो महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम उनकी पूजा की। इसीलिए ये 'कात्यायनी नाम से विख्यात हुईं और महर्षि की पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित मानी गईं।
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