- बीएलएफ4 में माटी, स्मृति और संगीत का जीवंत उत्सव : मनोज तिवारी
जेन-जी से संवाद : लोक से जुड़े रहो, वही पहचान है
गीतों के बीच-बीच में मनोज तिवारी ने श्रोताओं से आत्मीय संवाद भी किया। उन्होंने खासतौर पर जेन-जी को संबोधित करते हुए कहा कि आप चाहे जिस गांव, जिस क्षेत्र या जिस पृष्ठभूमि से हों, अपने लोक संगीत से जुड़ाव बनाए रखें। नए प्रयोग करें, नई अभिव्यक्तियां गढ़ें, लेकिन जड़ों को कभी न छोड़ें। लोक-संस्कृति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब युवाओं के कंधों पर है।
हास्य, आत्मीयता और लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ
संवाद के दौरान उन्होंने सहज हास्य के साथ कहा, “अब मेरी अंग्रेजी ठीक हो गई है,” और यह कहते ही पूरा सभागार ठहाकों से गूंज उठा। वहीं रिंकिया के पापा गीत के पीछे की भावना साझा करते हुए उन्होंने बताया कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना होते हैं, जो समय, परिस्थिति और आम जन की भावनाओं को स्वर देते हैं।
सूरीनाम की स्मृतियां और प्रवासी भोजपुरी समाज का दर्द
अपनी सूरीनाम यात्रा का संस्मरण साझा करते हुए मनोज तिवारी ने भावुक अंदाज में गीत छेड़ा, “तोर मोर लावा मिलाए सखी...” यह गीत सुनते ही प्रवासी भोजपुरी समाज की स्मृतियां, जड़ें और अपनापन सुरों में ढल गया। श्रोता भावनाओं के सैलाब में डूबते चले गए।
लोक-गीतों की फुलझड़ी, झूम उठा पूरा प्रांगण
इसके बाद शीतला घाट पे काशी में..., बगल वाली जान मारेली..., ऊपरवाली... और जिया हो बिहार के लाला... जैसे लोकप्रिय गीतों की ऐसी फुलझड़ी छूटी कि श्रोता खुद को रोक नहीं पाए। कहीं ताली, कहीं ठेका, तो कहीं सुर में सुर मिलाते स्वर, पूरा प्रांगण लोक-संगीत के महोत्सव में तब्दील हो गया। मतलब साफ है बीएलएफ4 का यह सत्र केवल मंचीय गायन भर नहीं था। यह भोजपुरी अस्मिता, लोक-संस्कृति और नई पीढ़ी के बीच एक सशक्त सेतु बन गया, जहां हर सुर यही कहता सुनाई दिया. “माटी से जुड़ल रहे,तबही संगीत अमर रहे।” काशी की धरती पर लोक-सुरों का यह उत्सव यह याद दिला गया कि संस्कृति तब जीवित रहती है, जब वह स्मृति, संवाद और संवेदना के साथ बहती है।

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