सबसे पहले टीम का गठन ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि कई गांवों में आज भी लड़के और लड़कियों के बीच आम बातचीत तक को गलत नजर से देखा जाता है। शुरुआत में माता-पिता अपनी बेटियों को लड़कों के साथ खेलने की इजाजत देने को तैयार नहीं थे, जिससे टीम बनाना मुश्किल हो गया था। हरदा जिले के निमाचा गांव में कुछ लड़कियां अपने माता-पिता से ट्यूशन की अनुमति लेकर क्रिकेट अभ्यास के लिए जाती थी। वहीं समाज की तरफ से भी हतोत्साहित करने वाली प्रतिक्रियाएं आईं और खेलने वाली लड़कियों पर तंज कसे जाते थे। इन परिस्थितियों के बीच हमने सिनर्जी संस्थान के लीडर्स के सहयोग से टीम के कप्तानों और उप-कप्तानों के साथ मिलकर स्थानीय अभिभावकों से नियमित बातचीत की और उन्हें समझाने का प्रयास किया। धीरे-धीरे परिजनों की सोच में बदलाव आया और उन्होंने अपनी बेटियों को खेलने की अनुमति दी। इस क्षेत्र में शराब की लत जैसी समस्याएं भी युवाओं को जकड़ रही हैं, जिससे कई लड़के जोखिम में हैं। ऐसे में यह टूर्नामेंट सिर्फ क्रिकेट तक सीमित न होकर उनके लिए एक सकारात्मक दिशा में बढ़ने का अवसर भी बन गया है।
जब अभ्यास सत्र शुरू हुए, तो कई नई चुनौतियां भी सामने आयी। लड़कों और लड़कियों के बीच शुरुआत में संवाद काफी असहज था। कई लड़कियां, जो पहली बार क्रिकेट खेल रही थी, अपने ही पुरुष साथियों की आलोचना का शिकार होती थी। लेकिन समय के साथ उनके बीच दोस्ती बढ़ी और आपसी समझ विकसित हुई। इसके बाद टीमें जीत दर्ज करने लगी। इससे न केवल लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ा, बल्कि लड़कों ने भी महिला नेतृत्व का सम्मान करना और उनके साथ मिलकर काम करना सीखा। महिला कप्तानों के नेतृत्व में खेलने से लड़कों ने जाना कि लड़कियां भी रणनीति बना सकती हैं, बड़े फैसले ले सकती हैं और अपनी टीमों को जीत दिला सकती हैं। जो लड़के शुरूअत में एक मिश्रित टीम में खेलने को लेकर संकोच कर रहे थे, वे अब इसे एक सकारात्मक बदलाव मानने लगे हैं। एक खिलाड़ी ने कहा, “महिला कप्तान के नेतृत्व में खेलना मेरे लिए आंखें खोल देने वाला अनुभव रहा। इससे मुझे एहसास हुआ कि लड़कियों को समान अवसर न देकर हम खुद कितना कुछ खो रहे हैं।”
जैसे-जैसे हमारी दोनों टीमें मैच जीतने लगीं, वैसे-वैसे समाज की नकारात्मक सोच समर्थन में बदलने लगी। एक खास मुकाबले में हार के करीब पहुंच चुकी एक टीम ने पूर्व चैंपियन को हराकर सबको चौंका दिया। इस अप्रत्याशित जीत ने लोगों के संशय को गर्व में बदल दिया और इस पूरी पहल को समुदाय का सहयोग मिलने लगा। वे माता-पिता जो कभी अपनी बेटियों को टीम में भेजने के खिलाफ थे, अब खुद उन्हें भर्ती कराने के लिए आगे आने लगे हैं। इस तरह जो पहल एक साधारण क्रिकेट टूर्नामेंट के रूप में शुरू हुई थी, वह अब इस क्षेत्र की युवा लड़कियों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। यह समाज की सोच में भी सकारात्मक बदलाव लाने के लिए एक अहम कदम है। निमाचा गांव, हरदा की नेहा सांगुले अपनी टीम की कप्तान हैं। हरदा जिले के सलियाखेड़ी गांव के रहने वाले तेजराम अपनी टीम के उप-कप्तान हैं।
तेजराम, नेहा सांगुले
हरदा जिला, मध्य प्रदेश
इस लेख में सिनर्जी संस्थान की कार्यक्रम समन्वयक श्रुति ठाकुर का भी योगदान रहा है।

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