मझगवां ब्लॉक के चितहरा गांव के मवासी आदिवासी, रामेश्वर मवासी ने लैंटाना के आक्रामक फैलाव के कारण स्थानीय जंगल को धीरे-धीरे, अपने सामने ही खत्म होते देखा है। रामेश्वर बताते हैं, “मुझे अभी भी याद है कि हमने मझगवां जंगल से चिरौंजी इकट्ठा की थी ताकि हमारा परिवार मेरी बहन की शादी की दावत का खर्च उठा सके। मेरी मां, दो भाई और मैंने जंगल में चार दिन बिताए और 80 किलो चिरौंजी इकट्ठा की और उसे बाजार में जाकर बेचा। लेकिन आज स्थिति बदल गई है। आप जंगल में कितने भी दिन बिता लो, आपको कुछ नहीं मिलेगा। दुख की बात है कि महुआ, चिरौंजी और अन्य जड़ी-बूटियां, लैंटाना जैसी आक्रामक प्रजातियों के कारण विनाश की कगार पर हैं।” यहां वन विभाग साल में दो बार लैंटाना को साफ करने का प्रयास करता है। साल 2021 में वन विभाग ने लैंटाना को काटकर सतना जिले के एक सीमेंट प्लांट को भेजना शुरू किए ताकि कोयले की जगह इसे एक ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
यहां ग्राम वन समिति (विलेज फॉरेस्ट कमेटी – वीएफसी) का भी गठन किया गया जिसमें गांव के सभी निवासी सदस्य हैं। इन सदस्यों को वन क्षेत्र से लैंटाना झाड़ियों को उखाड़ने का काम सौंपा गया था। इस काम के लिए वीएफसी सदस्यों को कटी हुई लैंटाना झाड़ियों के लिए प्रति मीट्रिक टन 1,200 रुपये दिए जाते हैं। पहले तीन महीनों में, 29.87 मीट्रिक टन लैंटाना निकाला गया जिसके लिए गांव के लोगों को करीब 35 हजार 844 रुपये मिले। अब इस परियोजना को उन जिलों में भी लाया जा रहा है जहां लैंटाना पौधों का आक्रमण है। जिले के एक अन्य निवासी कुशराम मवासी का कहना है कि “लैंटाना को हटाने के बाद पलाश, जामुन, रेला, धावा और करोंदा जैसे स्थानीय पेड़ उगने लगे हैं। अब जंगल में जानवरों के लिए चारा भी मिल जाता है। साथ ही जंगली सूअर, हिरण और चीतल फसल को अब पहले जितना, नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं।”
सनव्वर शफ़ी
लेखक भोपाल, मध्य प्रदेश में बतौर स्वतंत्र पत्रकार काम करते हैं।
यह एक लेख का संपादित अंश है जो मूलरूप से 101 रिपोर्टर्स पर प्रकाशित हुआ था।

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