दरअसल, UGC के अपने आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 और 2024 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118% की वृद्धि हुई है। जाति-आधारित हिंसा की ये घटनाएँ संस्थागत और सरकारों की अनकही मिलीभगत से कायम जातिवादी व्यवस्था का परिणाम हैं। UGC इक्विटी नियम, शैक्षणिक संस्थानों में गहरे जड़ जमाए जातिगत भेदभाव और अत्याचारों के खिलाफ़ एक देर से उठाया गया लेकिन स्वागत योग्य कदम है, जिसे रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की माताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर PIL के जवाब में जारी किया गया था, ये दोनों संस्थागत हत्या के शिकार बने थे। हमें लगता है कि यूजीसी नियमावली पर ब्राह्मणवादी तत्वों के दवाब में स्टे लगाया गया है. यह सर्वविदित और ऐतिहासिक तथ्य है कि उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ़ बनने वाले हर कानून के खिलाफ समाज के ताकतवर हिस्सों से प्रतिक्रियावादी और उन्मादी प्रतिक्रिया के साथ विरोध किया जाता है। इस मामले में भी वही प्रभावशाली समूह अपने सामाजिक वर्चस्व को बनाये रखने और किसी तरह के संस्थागत दंड से बचे रह कर वंचित तबकों के लिये लाये गये न्यायसंगत समानता के उपायों को अपना व्यक्तिगत उत्पीड़न बता रहे हैं। हम समाज के सभी न्यायपसंद लोगों से अपील करते हैं कि वे इन यूजीसी इक्विटी नियमों का समर्थन करें और काफी विलम्ब से लाये गये सही उपायों को रोकने के लिए जातिगत उन्माद भड़काने वालों की कोशिशों को नाकाम करें। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की संवैधानिक दृष्टि के लिए खड़े हों।
पटना (रजनीश के झा)। 29 जनवरी 2026 को UGC की इक्विटी नियमवली से संम्बंधित जन हित याचिका PIL पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी एक संकीर्ण और विशेषाधिकार प्राप्त चिंतन प्रक्रिया का ही परिणाम हो सकती हैं। UGC द्धारा लायी गयी नियमावली पर स्थगन आदेश देते हुये कोर्ट ने नियमों को "अस्पष्ट" और "दुरुपयोग हो सकने लायक" बताने हुये कहा है, "जातिविहीन समाज हासिल करने के मामले में हमने जो कुछ भी हासिल किया है, क्या अब हम उससे पीछे जा रहे हैं?" जाति और नस्लीय भेदभाव कोई मनगढ़न्त अवधारणा या बीती बात नहीं हैं। वे हमारे शैक्षणिक संस्थानों और पूरे समाज में रोज़मर्रा की क्रूर सच्चाई हैं। क्या "जातिविहीन समाज" बोल देने भर से रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की संस्थागत हत्या या एंजेल चकमा की नस्लीय हत्याओं के विरुद्ध न्याय मिल जायेगा? सुप्रीम कोर्ट ऐसा क्यों मानता है कि जातिगत अत्याचारों के खिलाफ़ संघर्ष, या उस संघर्ष से पैदा हुए ऐसे कानूनी उपाय जो जाति और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ों को मज़बूत करते हैं, देश को पीछे धकेल रहे हैं?

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