अपनी मर्जी से खेल पाती,
मुझे भी होती पूरी आज़ादी,
मैं भी कहीं भी घूम पाती,
अपनी मर्जी से सब खा पाती,
इतना ऊँचा मैं उड़ना चाहती,
किसी की सोच तक पहुँच न पाती,
किताबों के पंछी आसमान में उड़ते,
इतनी ऊंची वो उड़ान भरते कि,
फिर नीचे न किसी को देखते,
करते अपने मन की सौ बार,
फड़ फड़ उड़ जाते हर बार।।
लता
कपकोट, उत्तराखंड
गाँव की आवाज़

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