सुबह का वक्त… भदोही की संकरी गलियों में करघों की आवाज अब पहले जैसी नहीं गूंजती। कुछ घरों में करघे बंद पड़े हैं, कुछ में धूल जमी है और कुछ जगहों पर मजदूर अब दूसरे काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। कालीन उद्योग, जो कभी इस इलाके की पहचान हुआ करता था, आज सस्ते वैश्विक उत्पादों और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है। करीब 52 वर्षीय कालीन कारीगर रामजी बताते हैं— “पहले एक घर में चार-चार करघे चलते थे, अब मुश्किल से एक चलता है। बाजार में सस्ता सामान आ गया है, हमारी मेहनत की कीमत कम होती जा रही है।” यह कहानी केवल भदोही की नहीं है। यह कहानी पूरे पूर्वांचल की है। यह कहानी उस बदलते आर्थिक ढांचे की है जिसमें पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे बाजार की प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में उद्योग और रोजगार सीधे तौर पर राजनीतिक मुद्दा बनते जा रहे हैं। बेरोजगारी और उद्योगों की गिरती स्थिति क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकती है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि उद्योगों के पुनर्जीवन से रोजगार बढ़ेगा और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। यही मुद्दा भविष्य की राजनीति का आधार बन सकता है। अर्थशास्त्रियों और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक उद्योगों को बचाने के लिए कई स्तरों पर सुधार जरूरी हैं— छोटे उद्योगों को आसान वित्तीय सहायता. तकनीकी प्रशिक्षण और डिजाइन नवाचार. डिजिटल मार्केटिंग और वैश्विक बाजार से जुड़ाव. लॉजिस्टिक्स और उत्पादन लागत में सुधार. स्थानीय उत्पादों के लिए ब्रांडिंग और पहचान निर्माण. मतलब साफ है पूर्वांचल के उद्योग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। यदि यह उद्योग कमजोर होते हैं तो इसका असर केवल रोजगार पर नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत पर भी पड़ेगा। भारत आज वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है। स्थानीय उद्योगों को मजबूत करना केवल आर्थिक नीति का हिस्सा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक संरक्षण का भी प्रश्न बनता जा रहा है। भदोही के करघों की धीमी होती आवाज, वाराणसी के बुनकरों की चिंता और मिर्जापुर के मजदूरों का पलायन—ये केवल स्थानीय कहानियां नहीं हैं, बल्कि बदलते भारत की आर्थिक कहानी हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीडीपीएस) 2025-26 में करीब 30.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह आंकड़ा न केवल आर्थिक विस्तार का संकेत देता है बल्कि यह बताता है कि प्रदेश राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहा है। राज्य सरकार का दावा है कि निवेश, औद्योगिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार के कारण आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। यही कारण है कि राज्य निवेश आकर्षण के मामले में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट भी प्रदेश को तेज आर्थिक विकास वाले राज्यों में शामिल करती रही है, जो इस बजट की आर्थिक पृष्ठभूमि को मजबूत बनाता है। बजट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भारी निवेश है। एक्सप्रेसवे, मेट्रो परियोजनाएं, औद्योगिक कॉरिडोर और एयरपोर्ट विस्तार जैसी योजनाओं के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाले एक्सप्रेसवे प्रदेश की औद्योगिक क्षमता को नई ऊंचाई देने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सड़क और परिवहन नेटवर्क के विस्तार से लॉजिस्टिक्स लागत कम होने और निवेश बढ़ने की संभावना है।
विश्व बैंक और अन्य वैश्विक संस्थाएं भी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को क्षेत्रीय विकास का सबसे प्रभावी माध्यम मानती हैं। प्रदेश सरकार इसी रणनीति को अपनाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों को औद्योगिक विकास से जोड़ने की योजना पर काम कर रही है। इस बजट की सबसे बड़ी विशेषता पूर्वांचल क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता देना है। बनारस, गोरखपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर और भदोही जैसे जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और पर्यटन परियोजनाओं के लिए विशेष धन आवंटित किया गया है। पूर्वांचल लंबे समय तक विकास से पिछड़ा क्षेत्र माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र को राजनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। सरकार का यह निवेश सामाजिक असंतुलन दूर करने और राजनीतिक समर्थन मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश सरकार ने राज्य को ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निवेश, औद्योगिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन इसके लिए लगातार निवेश और रोजगार सृजन आवश्यक होगा।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें