ख़ुद के सपनों को सजा पाऊँ,
खेल के मैदान से पुलिस की रेस तक,
मैं हर रेस में भाग दौड़ कर पाऊँ,
लोगों की बातें छोड़, ख़ुद में खो जाऊं,
क्यूँ न मैं भी पुलिस बन जाऊँ,
उमंगों के साथ आसमान में उड़ जाऊं,
तोड़ कर सब पाबंदियों को,
ख़ुद की एक नई दुनिया बसाऊं,
क्यूँ न मैं भी पुलिस बन जाऊँ।।
पावनी
कपकोट, उत्तराखंड
गांव की आवाज

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