नई दिल्ली, 9 फरवरी, (रजनीश के झा)। इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित आईएचसी समन्वय 2026: भारतीय भाषाओं का उत्सव तीन दिनों तक चले गहन संवाद, कलात्मक प्रस्तुतियों और विचारोत्तेजक विमर्श के बाद सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस प्रतिष्ठित महोत्सव ने भारत के विविध प्राकृतिक भू-दृश्यों और उसकी समृद्ध साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक परंपराओं के आपसी संबंधों को केंद्र में रखते हुए एक सार्थक और संवेदनशील संवाद रचा। इस वर्ष महोत्सव ने प्रकृति को विमर्श के केंद्र में स्थापित करते हुए यह अन्वेषण किया कि किस प्रकार पर्वत, नदियाँ, मरुस्थल, वन और तटरेखाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाओं, आस्था प्रणालियों, रचनात्मक अभिव्यक्तियों तथा सामुदायिक जीवन को निरंतर आकार देती रही हैं। प्रख्यात लेखकों, विद्वानों, पर्यावरण संरक्षणविदों, फ़िल्मकारों, संगीतज्ञों और कलाकारों की सशक्त सहभागिता के साथ, आईएचसी समन्वय 2026 पारिस्थितिकी को एक जीवंत अनुभव और सांस्कृतिक स्मृति के रूप में प्रस्तुत करने वाला एक बहुविषयी मंच बनकर उभरा, जिसने प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंधों पर नई दृष्टि प्रदान की।
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महोत्सव के समापन अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए, इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश ने कहा, “आईएचसी समन्वय के समापन के साथ, इन तीन दिनों में हुए विमर्श और कलात्मक प्रस्तुतियाँ भारत की भाषायी परंपराओं, सांस्कृतिक आचरणों और उन पारिस्थितिक संदर्भों के बीच के गहरे और अविभाज्य संबंध को पुनः रेखांकित करती हैं, जिनमें उनका विकास और विस्तार हुआ है। यह संस्करण जानबूझकर पारिस्थितिकी को सांस्कृतिक स्मृति और जीवंत ज्ञान—दोनों के रूप में केंद्र में लाता है, और हमें यह स्मरण कराता है कि पर्यावरणीय उत्तरदायित्व बौद्धिक सजगता और नैतिक चेतना से पृथक नहीं हो सकता। आईएचसी समन्वय के माध्यम से, इंडिया हैबिटेट सेंटर एक ऐसे संवेदनशील और विचारोत्तेजक सांस्कृतिक मंच को निरंतर सशक्त करने का प्रयास करता है, जहाँ विचारों की गंभीर पड़ताल हो, परंपराओं से जीवंत संवाद स्थापित किया जाए, और यह संवाद एक अधिक जागरूक, संतुलित एवं सतत भविष्य की दिशा में सार्थक योगदान दे।” समापन टिप्पणी साझा करते हुए, विद्यु्न सिंह, क्रिएटिव हेड – प्रोग्राम्स, हैबिटेट वर्ल्ड, इंडिया हैबिटेट सेंटर ने कहा, “यह समन्वय का एक अत्यंत संतोषजनक संस्करण रहा। उत्कृष्ट लेखकों, वक्ताओं और संचालकों की सशक्त उपस्थिति के बीच, पर्यावरणविद् सुनीता नारायण के ओजस्वी और प्रेरक उद्घाटन मुख्य भाषण से लेकर अग्रणी, पुरस्कार-विजेता पर्यावरण फ़िल्मकार माइक पांडे के अनुभव-साझाकरण वाले समापन सत्र तक, ये तीन दिन सचमुच अविस्मरणीय रहे। यह एक अद्भुत यात्रा थी, जिसने इस धन्य भूमि की लंबाई और चौड़ाई को समेटते हुए जैव-विविधता के संरक्षण और संवर्धन के महत्व को रेखांकित किया—न केवल हमारी धरती के लिए, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी ग्रह के लिए।” उन्होंने आगे कहा, “हमारी आशा है कि यहाँ आरंभ हुई ये चर्चाएँ समन्वय से आगे भी निरंतर प्रवाहित होती रहें और हमारे घरों, हमारे कार्यस्थलों तथा हमारे दैनिक निर्णयों को सकारात्मक रूप से दिशा दें।”

महोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत एक गहन संवाद से हुई, जिसका शीर्षक था ‘राग पहाड़ी –हिमालयाज इन द लाइफ एंड इमेजिनेशन’। इस सत्र में प्रतिष्ठित लेखिका एवं महोत्सव की सह-निदेशक नमिता गोखले, पुरस्कार-विजेता लेखक और पर्यावरण के संवेदनशील इतिहासकार स्टीफ़न ऑल्टर, तथा पूर्व राजनयिक, लेखक और अनुवादक नवतेज सरना शामिल हुए। चर्चा का संचालन रवि सिंह, पब्लिशर, स्पीकिंग टाइगर बुक्स ने किया। इस संवाद में हिमालय को एक ऐसे भू-दृश्य के रूप में देखा गया, जिसने सदियों से आध्यात्मिक खोज, साहित्यिक कल्पना और ऐतिहासिक गतियों को प्रेरित किया है। मिथक कथाओं, यात्रा-वृत्तांतों, निजी अनुभवों और दर्ज इतिहास के माध्यम से वक्ताओं ने विचार किया कि ये पर्वत आज भी तीर्थयात्रा, सहनशीलता, निर्वासन और वापसी के प्रतीक क्यों बने हुए हैं। चर्चा में हिमालय के उस विरोधाभास पर भी प्रकाश डाला गया, जहाँ वह एक साथ पोषक भी है और कठोर भी—और कैसे यह द्वैत न केवल व्यक्तियों के जीवन को, बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं को आकार देता रहा है। इसके बाद ‘संजीवनी धरती – द हीलिंग अर्थ’ विषय पर एक सत्र आयोजित हुआ, जिसमें भारत के विविध भू-दृश्यों में निहित उपचारात्मक और पुनर्जीवनकारी ज्ञान पर केंद्रित चर्चा की गई। इस संवाद में अरुणाचल प्रदेश की कवयित्री, उपन्यासकार और पत्रकार मामांग दई, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर कार्य करने वाली मानवविज्ञानी एवं शोधकर्ता डॉ. सुनीता रेड्डी, तथा आयुर्वेद चिकित्सक, शिक्षाविद् और शोधकर्ता डॉ. हेमलता एन. पोट्टी शामिल रहीं। सत्र का संचालन लेखक, विद्वान और सार्वजनिक बुद्धिजीवी प्रो. पुष्पेश पंत ने किया। वक्ताओं ने स्वदेशी उपचार प्रणालियों, औषधीय वनस्पतियों और जंगलों व जैव-विविधता में रची-बसी क्षेत्रीय चिकित्सा परंपराओं पर प्रकाश डाला। सत्र के दौरान अग्रणी पर्यावरण फ़िल्मकार माइक पांडे की औषधीय पौधों पर आधारित लघु फ़िल्मों का प्रदर्शन भी किया गया, जिसने उन पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान-परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया, जो पीढ़ियों से समुदायों के जीवन और स्वास्थ्य को संबल देती रही हैं।

दोपहर के भोजन के बाद महोत्सव का फोकस नदियों पर केंद्रित हुआ, जिसकी शुरुआत सत्र ‘बिन पानी सब सून – स्ट्रीम्स ऑफ़ लाइफ’ से हुई। इस संवाद में मलयालम लेखक एवं सहायक वन संरक्षक जोशिल, फ़ोटोग्राफ़र और ग्राफ़िक डिज़ाइनर मिलन मौदगिल, हिंदी लेखक व पत्रकार अभय मिश्रा, तथा लेखिका, पटकथा लेखन और स्तंभकार वैशाली श्रॉफ ने भाग लिया। सत्र का संचालन शिक्षाविद एवं नीति शोधकर्ता डॉ. मेधा बिष्ट ने किया। वक्ताओं ने नदियों को केवल पारिस्थितिक जीवनरेखाओं के रूप में ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक साक्षी के रूप में भी देखा। चर्चा में विस्थापन, पर्यावरणीय क्षरण, स्मृति और क्षेत्रीय साहित्य तथा जीवित यथार्थ में नदियों की प्रतीकात्मक भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार किया. विषयात्मक यात्रा आगे बढ़ते हुए सत्र ‘बहता पानी निर्मल – सोंग्स ऑफ़ द रिवर’ तक पहुँची, जो कविता, संगीत और नृत्य के माध्यम से नदियों का उत्सव था। विद्वान, संगीतकार, गायक और गीतकार डॉ. मदन गोपाल सिंह ने ‘मेरे आँगन की असंख्य नदियाँ’ शीर्षक प्रस्तुति में गीत और शोध को एक साथ पिरोया। प्रसिद्ध मोहिनीयट्टम नृत्यांगना और कोरियोग्राफ़र जयप्रभा मेनन ने नदियों की लय और प्रवाह से प्रेरित अभिनय (अभिनय) प्रस्तुत किया, जिसमें जल की चंचलता और निरंतरता सजीव हो उठी। सत्र का समापन गायक-गीतकार और डॉ. भूपेन हज़ारिका के भतीजे मयुख हज़ारिका की प्रस्तुति से हुआ, जिन्होंने ‘बिस्तीर्णो पारोरे’—महान संगीतकार के सबसे प्रतिष्ठित गीतों में से एक—के अंशों का पाठ किया। इस प्रस्तुति में ब्रह्मपुत्र को एक मौन साक्षी और सामाजिक परिवर्तन के सशक्त रूपक के रूप में देखा गया।

सांध्य सत्रों में संवाद की दिशा मरुस्थल की ओर मुड़ी, जहाँ सत्र ‘रेगिस्तान में जीवन की लय – मेनी रिधम्स ऑफ़ डेजर्ट लाइफ’ आयोजित हुआ। इस चर्चा में ऊँट पालक समुदायों पर अपने कार्य के लिए जानी जाने वाली लेखिका और शोधकर्ता इल्से कोहलर-रोल्फ़ेसन, पत्रकार एवं अनुवादक अभिषेक श्रीवास्तव, तथा नृसंगीतशास्त्री और ‘बार्ड्स, बैलैड्स एंड बाउंड्रीज़’ की सह-लेखिका डॉ. शुभा चौधरी ने अपने विचार साझा किए। सत्र का संचालन लेखक, संपादक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता गिरिराज किराड़ू ने किया। चर्चा में मरुस्थलीय पारिस्थितिकी, पशुपालक समुदायों, मौखिक परंपराओं और संगीत विरासत पर प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने यह रेखांकित किया कि कठोर और चुनौतीपूर्ण पर्यावरण में भी रेगिस्तानी संस्कृतियों ने जीवन-निर्वाह, कथा-वाचन और कलात्मक अभिव्यक्ति की अत्यंत सशक्त और परिष्कृत प्रणालियाँ विकसित की हैं। कवि एवं पर्यावरणविद् अमरनाथ द्वारा प्रस्तुत ‘देवदार और देव वन्न’ शीर्षक से एक संक्षिप्त काव्य-पाठ ने कार्यक्रम को आत्ममंथन का एक गहन आयाम प्रदान किया, जिसमें वनों को पवित्र और जीवनदायी स्थलों के रूप में सम्मानपूर्वक स्मरण किया गया। दिन का समापन बारमेर बॉयज़ की सशक्त प्रस्तुति के साथ हुआ—यह मांगणियार परंपरा से जुड़े भूरा ख़ान, मगदा ख़ान और सवाई ख़ान की तिकड़ी है—जिनकी राजस्थानी लोक और सूफ़ी संगीत की भावपूर्ण गायकी ने थार मरुस्थल की धरती में रची-बसी सदियों पुरानी संगीतमय परंपराओं को जीवंत कर दिया।
अंतिम दिन की शुरुआत ‘अरण्य – लिसनिंग टू द इंडियन फारेस्ट’ शीर्षक से विवेक मेनन — प्रख्यात संरक्षणविद्, लेखक और वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़र — की एक सचित्र व्याख्यान प्रस्तुति से हुई। सत्र का परिचय देते हुए, स्पीकिंग टाइगर बुक्स के प्रकाशक रवि सिंह ने वनों को केवल पारिस्थितिक तंत्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिलेख के रूप में भी रेखांकित किया। विवेक मेनन ने वनों को जीवंत अस्तित्व के रूप में सुनने और समझने की आवश्यकता पर बल देते हुए संरक्षण को सजगता, सह-अस्तित्व और उत्तरदायित्व की एक सतत प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद ‘देव वन्न – सेक्रेड ग्रोवस’ विषय पर एक विचारोत्तेजक सत्र आयोजित हुआ, जिसमें कवयित्री और उपन्यासकार ममंग दई, नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी की स्कॉलर प्रो. रेखा एम. शांगप्लियांग तथा बिश्नोई समुदाय की सांस्कृतिक इतिहासकार एवं लेखिका डॉ. नीकी चतुर्वेदी ने, पारिस्थितिकीविद् और सेक्रेड ग्रोवस इन इंडिया के सह-लेखक प्रो. योगेश वी. गोखले के संयोजन में, विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में फैले पवित्र उपवनों की परंपरा पर विमर्श किया। इस चर्चा में रेखांकित किया गया कि किस प्रकार आस्था, परंपरा और सामुदायिक संरक्षण ने ऐतिहासिक रूप से जैव-विविधता की रक्षा की है। पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में संवाद ने मेघालय के खासी समुदाय पर भी प्रकाश डाला, जिनके द्वारा पीढ़ियों से संजोए गए लिविंग रूट ब्रिज (जीवित जड़ पुल) संस्कृति में निहित पारिस्थितिक ज्ञान का एक सशक्त उदाहरण हैं। ये जैव-अभियांत्रिक मार्ग न केवल वनों के महत्वपूर्ण रास्तों और जल प्रणालियों को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि किस प्रकार आदिवासी परंपराएँ नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँचाए बिना भू-दृश्यों, समुदायों और प्रजातियों के बीच सतत संपर्क बनाए रखती हैं।
दोपहर सत्र में आयोजित पुस्तक विमोचनों ने महोत्सव की मूल चिंताओं को सशक्त रूप से प्रतिबिंबित किया। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार पारो आनंद ने ‘अ गर्ल अ टाइगर एंड अ वैरी स्ट्रेंज स्टोरी’ का लोकार्पण किया—यह कथा सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता के भाव को उजागर करती है। लेखक और पत्रकार उमेश पंत ने ‘छानी खरिकों’ प्रस्तुत की, जो क्षेत्रीय स्मृतियों और भाषा से संवाद करती है। वहीं, पत्रकार एवं लेखिका अनुमेहा यादव ने ‘आवर राइस टेस्ट्स ऑफ़ स्प्रिंग’ का विमोचन किया, जिसमें कृषि विविधता, खाद्य प्रणालियों तथा आधुनिक खेती की पद्धतियों से संकटग्रस्त देशी धान की किस्मों के संरक्षण की अत्यावश्यकता पर गहन विचार किया गया। इसके पश्चात विमर्श समुन्द्र तट का केंद्र बनीं। इस सत्र में ऐतिहासिक समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत के आपसी जुड़ाव की पड़ताल की गई, जिन्होंने व्यापार, प्रवास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को आकार दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल द्वारा प्रस्तुत व्याख्यान में भारत के समुद्री प्रभाव और रेशम मार्ग के क्रमिक अवसान पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने यह रेखांकित किया कि किस प्रकार महासागरीय नेटवर्क विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक, वाणिज्यिक और बौद्धिक आदान-प्रदान के प्रमुख माध्यम बनकर उभरे। इसके बाद समुद्री संरक्षण विषयक सत्र आयोजित हुआ, जिसमें डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया में ओसंस एंड कोस्ट्स कंज़र्वेशन के प्रमुख डॉ. अनंत पांडे और मरीन स्पीशीज़ के लीड मुरली मनोहरकृष्ण ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की नाज़ुकता और सतत तटीय प्रथाओं की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने समुद्री आवासों के बीच संपर्क बनाए रखने हेतु तटीय गलियारों (कोस्टल कॉरिडोर्स) के निर्माण के महत्व को रेखांकित किया, ताकि प्रजातियाँ स्वाभाविक रूप से विचरण, आहार और प्रजनन कर सकें। संवाद के दौरान डुगोंग एवं सीग्रास संरक्षण परियोजना पर भी विशेष ध्यान दिया गया, जिसके माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि समुद्री घास के मैदानों का संरक्षण न केवल संकटग्रस्त डुगोंग के अस्तित्व के लिए आवश्यक है, बल्कि स्वस्थ तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने और समुद्र पर निर्भर आजीविकाओं को सहारा देने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस सत्र का संयोजन संरक्षण जीवविज्ञानी और लेखिका नेहा सिन्हा ने किया।
समापन सत्र ‘दृश्य दस्तावेज़ – विजुअल डाक्यूमेंट्स ऑफ़ आवर एनिव्रोंमेंट’एक भावपूर्ण ऑडियो-विज़ुअल संवाद के रूप में प्रस्तुत हुआ, जिसमें अग्रणी पर्यावरण फ़िल्मकार माइक पांडे और फ़ोटोग्राफ़र एवं विज़ुअल स्टोरीटेलर मिलन मौदगिल ने संरक्षण जीवविज्ञानी और लेखिका नेहा सिन्हा के संयोजन में सहभागिता की। मिलन मौदगिल ने माउंट कैलाश की एक प्रभावशाली फ़ोटोग्राफ़िक यात्रा प्रस्तुत की, जिसमें उसके विस्मयकारी भू-दृश्यों को सजीव करते हुए उसकी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्ता को केंद्र में रखा। उन्होंने नाज़ुक और पवित्र भूगोल को दस्तावेज़ करने में दृश्य कथाकारों की ज़िम्मेदारी पर भी गहन विचार साझा किए। पर्यावरण कार्यकर्ता और फ़िल्मकार के रूप में माइक पांडे की पचास वर्षों की यात्रा को चिह्नित करते हुए, इस सत्र में उन्होंने कीटों की शक्ति और बुद्धिमत्ता पर आधारित एक फ़िल्म बनाने की अपनी दीर्घकालिक इच्छा भी साझा की, और पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु अक्सर उपेक्षित भूमिका की ओर ध्यान आकर्षित किया। साथ ही उन्होंने भारतीय पर्यावरणीय कथाओं को वैश्विक मंच तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल देते हुए, पर्यावरण संरक्षण में दृश्य कथा-वाचन की परिवर्तनकारी भूमिका को पुनः रेखांकित किया। आईएचसी समन्वय 2026 का समापन डॉ. भूपेन हज़ारिका की 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एक विशेष श्रद्धांजलि समारोह के साथ हुआ, जिसे मयुख हज़ारिका की भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से साकार किया गया।गीतों, आत्मीय स्मृतियों और कम ज्ञात प्रसंगों के माध्यम से इस प्रस्तुति ने ब्रह्मपुत्र के कवि-संत कहे जाने वाले डॉ. भूपेन हज़ारिका के संगीत-दर्शन और मानवीय संवेदनशीलता की गहन झलक प्रस्तुत की। संवाद, कलात्मक प्रस्तुतियाँ, फ़िल्में और पुस्तकों के माध्यम से आईएचसी समन्वय 2026 ने प्रकृति की हमारी समझ को नई गहराई प्रदान करते हुए भाषा और संस्कृति की केंद्रीय भूमिका को पुनः स्थापित किया। महोत्सव का समापन भू-दृश्यों को सजगता से सुनने, परंपरागत ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण तथा पारिस्थितिकी को भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत के मूल में स्वीकार करने के सुदृढ़ संकल्प के साथ हुआ।
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