कार्यक्रम में इसके अतिरिक्त अनेक विद्वान और विशेषज्ञ भी भाग लेंगे, जिनमें भारतीय खाद्य संस्कृतियों के प्रख्यात अध्येता प्रो. पुष्पेश पंत, जल शासन और जलवायु नीति की विशेषज्ञ मेधा बिष्ट, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक एवं शोधकर्ता हेमलता एन. पोट्टी, वन-आधारित समाजों पर कार्य करने वाली समाजशास्त्री रेखा एम. शांगप्लियांग, तथा पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान के विशेषज्ञ योगेश वी. गोखले प्रमुख हैं। महोत्सव की समृद्धि को और बढ़ाते हुए संगीत और नृत्य की विशेष प्रस्तुतियाँ भी शामिल हैं। इनमें संगीत और कविता के सेतु के रूप में पहचाने जाने वाले गायक-विद्वान मदन गोपाल सिंह, मोहिनीअट्टम की अग्रणी कलाकार जया प्रभा मेनन, डॉ. भूपेन हज़ारिका की विरासत को आगे बढ़ाने वाले गायक-गीतकार मयुख हज़ारिका, मंगणियार लोकसंगीत के संवाहक बारमेर बॉयज़, तथा केरल की दो सौ वर्ष पुरानी अनुष्ठान परंपरा के संरक्षक पुलिकली कलाकार समूह की प्रस्तुतियाँ महोत्सव को और अधिक जीवंत बनाती हैं। यह संस्करण पुरस्कार-विजेता पर्यावरण फ़िल्मकार माइक पांडे की असाधारण रचनात्मक यात्रा के 50 वर्षों का उत्सव है। भारत में संरक्षण फ़िल्म निर्माण के अग्रदूत के रूप में, उनकी सशक्त दृश्य कथाओं ने पर्यावरणीय चेतना को गहराई दी है और वैश्विक स्तर पर वन्यजीव संरक्षण आंदोलनों को प्रेरित किया है।इस संस्करण का समापन माइक पांडे के साथ एक विशेष संवाद से होगा, जिसके पश्चात उनकी अग्रणी और प्रेरणादायी यात्रा को समर्पित एक विशिष्ट ऑडियो-विज़ुअल प्रस्तुति प्रस्तुत की जाएगी। आगामी दिनों में संवादों और प्रस्तुतियों की श्रृंखला के माध्यम से, आईएचसी समन्वय 2026 दर्शकों को संस्कृति, पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति हमारी साझा ज़िम्मेदारी पर प्रकाश डालेगा।
नई दिल्ली (रजनीश के झा )। इंडिया हैबिटैट सेंटर में आईएचसी समन्वय 2026 का शुभारंभ हुआ, जिसके साथ तीन दिवसीय इस महोत्सव की शुरुआत हुई। यह उत्सव 8 फ़रवरी 2026 तक चलेगा। उद्घाटन कार्यक्रम ने इस वर्ष के संस्करण की वैचारिक दिशा तय की, जिसका केंद्र भारत के प्राकृतिक परिदृश्यों और उसकी सांस्कृतिक व साहित्यिक परंपराओं के बीच के गहरे और सतत संबंध पर है। पर्वत, वन, नदियाँ, मरुस्थल और समुद्र यहाँ केवल भौगोलिक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि स्मृतियों, आस्थाओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के जीवंत भंडार हैं। सदियों से साहित्य, लोककथाएँ, संगीत और मौखिक परंपराएँ उस पारिस्थितिक चेतना को आगे बढ़ाती आई हैं, जो प्रत्यक्ष जीवन अनुभवों से उपजी हैं. मुख्य वक्तव्य प्रख्यात पर्यावरण विचारक एवं लेखिका सुनीता नारायण ने प्रस्तुत किया। उनका संबोधन “वाकिंग लाइटली ऑन द प्लेनेट : लर्निंग फ्रॉम इकोलॉजिकल ट्रेडिशन टू बिल्ड अ सस्टेनएबल फ्यूचर” विषय पर केंद्रित था। भारत की पारंपरिक पारिस्थितिक परंपराओं का संदर्भ लेते हुए उन्होंने संयम, प्रकृति के प्रति सम्मान और विकास के साथ जुड़ी नैतिक जिम्मेदारियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके संबोधन ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें अपने विरासत में मिले ज्ञान तंत्रों से दोबारा जुड़ने की तत्काल आवश्यकता है। दर्शकों को संबोधित करते हुए सुनीता नारायण ने कहा,“भारत की जल संरक्षण परंपराओं को समझने के लिए सबसे पहले उस भाषा को समझना आवश्यक है, जिसके माध्यम से यह ज्ञान गढ़ा गया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा। भारत की पारिस्थितिक समझ शब्दों, व्यवहारों और सामूहिक स्मृति में निहित है, और बढ़ते जल संकट के इस दौर में इन परंपराओं की पुनःसमीक्षा अत्यंत आवश्यक हो गई है।”
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