- उद्योग को प्रतिबंधों से बचाने वाले योद्धा, बुनकरों की आवाज और ‘कैलाश रग्स इंडस्ट्रीज’ के संस्थापक को नम आंखों से विदाई
अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने निर्यातकों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाया, नीतिगत सुधारों के लिए संघर्ष किया और बुनकर कल्याण को उद्योग की मूल आत्मा बताया। उनका मानना था कि कालीन केवल निर्यात की वस्तु नहीं, बल्कि लाखों हाथों की मेहनत और संस्कारों की पहचान है। उनके पुत्र अलोक बरनवाल के अनुसार, कैलाश नारायण बरनवाल ने जीवनभर उद्योग को परिवार की तरह जिया और बुनकरों को उसकी रीढ़ माना। आज उनके निधन पर शोक व्यक्त करने वालों का तांता लगा है—उद्योग संगठन, सामाजिक संस्थाएं और बुनकर सभी नम आंखों से उन्हें याद कर रहे हैं। कैलाश नारायण बरनवाल भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय कालीन उद्योग के इतिहास में उनका नाम संघर्ष, सम्मान और संवेदनशील नेतृत्व के प्रतीक के रूप में सदैव जीवित रहेगा। शोक संवेदना व्यक्त करने वालो में कालीन निर्यात संवर्धन परिषद के पूर्व चेयरमैन सिद्धनाथ सिंह, पूर्व प्रशासनिक सदस्य उमेश गुप्ता मुन्ना, योगेंद्र राय काका, संजय मेहरोत्रा, रवि पाटोदिया, एकमा के पूर्व अध्यक्ष हाजी शौकत अली अंसारी, एकमाध्यक्ष रजा खान, अहसन रऊफ खान, असलम महबूब अंसारी, ओपी गुप्ता, धरम प्रकाश गुप्ता, रोहित गुप्ता, प्रहलाददास गुप्ता, संजय गुप्ता. बृजेश गुप्ता, राजेंद्र मिश्रा, घनश्याम शुक्ला, ओमकारनाथ मिश्रा, पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा, बच्चा मिश्रा सीइपीसी चेयरमैन कैप्टन मुकेश गोम्बर, कुलदीप राज बॉटल, कुंवर शमीम अंसारी, पंकज बरनवाल, रुपेश बरनवाल, डॉ एके गुप्ता, श्यानारायण यादव, छविराज पटेल, सुदेशना बसु, भारतेन्दु द्विवेदी, रवि बरनवाल आदि प्रमुख रूप से शामिल है.

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें