शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में वास्तविक निवेश के बजाय बजट में निजीकरण को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है. सरकारी स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल विश्वविद्यालय और अस्पताल लगातार संसाधन-विहीन होते जा रहे हैं, लेकिन बजट में इनके लिए कोई निर्णायक हस्तक्षेप नहीं किया गया है. भाकपा-माले ने सवाल उठाया कि जब बिहार की बेटियाँ असुरक्षित हैं, छात्राएँ आत्महत्या को मजबूर हो रही हैं और यौन हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं, तब बजट में महिला सुरक्षा, छात्रावास, काउंसलिंग और सामाजिक न्याय के लिए कोई प्रभावी प्रावधान क्यों नहीं है?
किसानों के संदर्भ में पार्टी ने कहा कि सरकार कृषि संकट, बढ़ती लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य और सिंचाई जैसे बुनियादी सवालों पर पूरी तरह विफल रही है. किसानों को राहत देने के नाम पर बजट में पुरानी घोषणाओं की पुनरावृत्ति के अलावा कुछ भी नहीं है. भाकपा-माले ने यह भी आरोप लगाया कि बजट में बुलडोजर राज, विस्थापन और भूमि-हीनता के सवालों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है, जबकि हजारों गरीब परिवार उजाड़े जा रहे हैं. पार्टी ने कहा कि यह बजट विकास का नहीं, सत्ता बचाने का बजट है. भाकपा-माले जनता के सवालों को लेकर सड़क से सदन तक संघर्ष तेज करेगी और इस जनविरोधी बजट के खिलाफ व्यापक आंदोलन खड़ा करेगी.

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